“6 हजार में बिक रहा ‘मौत का परवाना’, बस्ती RTO कार्यालय बना फर्जीवाड़े का अड्डा” “बिना टेस्ट, बिना ट्रेनिंग बन रहे लाइसेंस: 6,000 दो और स्टीयरिंग संभालो!”

अजीत मिश्रा (खोजी)
खाकी और खादी की साठगांठ या व्यवस्था का मौन समर्थन? आरटीओ कार्यालयों में धड़ल्ले से बिक रहा है ‘मौत का परवाना’
“सड़कों पर हादसों की वजह या अफसरों का ‘बखरा’? RTO के भ्रष्टाचार पर कब टूटेगी चुप्पी?”
“कागज का एक पन्ना और 6 हजार की घूस… आखिर किसकी शह पर चल रहा है बस्ती में यह खेल?”
“RTO ऑफिस में नियमों की धज्जियां: कमर्शियल लाइसेंस के नाम पर खुलेआम हो रही उगाही”
“ट्रैफिक सेंस गायब, हादसे बेहिसाब: बस्ती RTO से जारी फर्जी प्रमाण पत्रों का खूनी नतीजा”
“जेब ढीली कीजिए, लाइसेंस घर ले जाइए! बस्ती RTO में दलालों की पौ-बारह”
“दलाली की बलि चढ़ी सड़क सुरक्षा: एक पन्ने का प्रमाण पत्र और मालामाल होते जिम्मेदार”
“खुलासा: फर्जी ट्रेनिंग सर्टिफिकेट से बन रहे लाइसेंस, क्या जांच में बेनकाब होंगे बड़े चेहरे?”
“बस्ती RTO का पुराना नाता: घूस दो, अयोग्य चालकों को भी थमा दो गाड़ियों की चाबी”
बस्ती: परिवहन विभाग (R.T.O.) और भ्रष्टाचार का रिश्ता अब किसी छुपे हुए राज़ की तरह नहीं, बल्कि एक खुले सच की शक्ल अख्तियार कर चुका है। बस्ती का एआरटीओ कार्यालय इन दिनों एक ऐसे नासूर में तब्दील हो चुका है, जहां नियमों, योग्यताओं और सड़क सुरक्षा की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। ताजा मामला कमर्शियल ड्राइविंग लाइसेंस (Commercial Driving License) से जुड़ा है, जहां महज 6,000 रुपए की एवض में ‘प्रशिक्षण प्रमाण पत्र’ (Training Certificate) खुलेआम बिक रहा है—यानी वाहन चलाना आता हो या नहीं, जेब ढीली कीजिए और लाइसेंस हासिल कर लीजिए।
एक पन्ने का कागज़ और सड़कों पर मौत का तांडव
नियमों के मुताबिक, भारी या व्यावसायिक वाहन चलाने के लिए विधिवत ड्राइविंग स्कूल से प्रशिक्षण लेना और सख्त टेस्ट पास करना अनिवार्य होता है। लेकिन धरातल की हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। नाम न छापने की शर्त पर एक भुक्तभोगी आवेदक ने जो पोल खोली, वह हैरान करने वाली है।
एजेंटों और दलालों के गठजोड़ से संचालित इस रैकेट में केवल 6,000 रुपए दीजिए और बिना किसी टेस्ट या ड्राइविंग ज्ञान के फर्जी प्रशिक्षण प्रमाण पत्र फाइल में नत्थी करवा लीजिए। सवाल यह उठता है कि क्या यह सिर्फ एक प्रशासनिक लापरवाही है, या फिर जानबूझकर रचा गया ऐसा चक्रव्यूह है, जिसके हर मोर्चे पर भ्रष्टाचार की इबारत लिखी है?
सड़क हादसों की असली जड़: ट्रैफिक सेंस की कमी और बिकता हुआ कानून
सड़कों पर आए दिन होने वाले बेहिसाब सड़क हादसे और लोगों में ट्रैफिक सेंस की भारी कमी कोई इत्तेफाक नहीं है। यह उसी बिके हुए ‘एक पन्ने के कागज’ का परिणाम है, जो बिना एक दिन भी स्टीयरिंग पकड़े लोगों को भारी-भरकम गाड़ियों का ड्राइवर बना देता है। जब अयोग्य और बिना ट्रेनिंग वाले चालक सड़कों पर उतरेंगे, तो खून-खराबा और जाम आम बात ही होगी।
यहां हैरानी इस बात पर नहीं है कि दलाल सक्रिय हैं— हैरानी इस बात पर है कि जिम्मेदार अधिकारी इस घिनौने खेल पर पूरी तरह चुप्पी साधे बैठे हैं। आखिर इस मौन के पीछे का सच क्या है?
- क्या अधिकारियों तक इस अवैध कमाई का ‘बखरा’ (हिस्सा) पहुंच रहा है?
- क्या विभाग के नुमाइंदे अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह बेखबर और नाकारा हो चुके हैं?
- या फिर इस मिलीभगत के दायरे में कोई और बड़ा सफेदपोश शामिल है?
अब चुप रहने का वक्त नहीं
जनता की गाढ़ी कमाई लूटने और सड़कों पर मासूमों की जिंदगियों से खिलवाड़ करने का यह खेल अब और नहीं चलना चाहिए। महकमे के जिम्मेदार अफसरों की यह खामोश सहभागिता उन्हें भी इस अपराध में बराबर का भागीदार बनाती है।
जरूरत इस बात की है कि शासन स्तर से एक उच्चस्तरीय जांच टीम गठित हो, जो इस फर्जीवाड़े की जड़ों तक पहुंचे। यदि समय रहते इन भ्रष्ट तंत्रों और दलालों के नेटवर्क पर शिकंजा नहीं कसा गया, तो आरटीओ कार्यालय का यह ‘भ्रष्टाचार’ न जाने कितने और बेकसूरों की जान ले लेगा। अब जांच और खुलासे का वक्त आ चुका है, ताकि पर्दा हटे और बेनकाब हों वे चेहरे, जो चंद रुपयों की खातिर आम जनता की जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं।
🔔 Vande Bharat News Alerts
नई प्रमुख खबरों की browser notification पाने के लिए Subscribe करें।







