एफसीआई में ‘मेहरबानी’ का खेल: एक चहेते मैनेजर को 7 केंद्र, बाकी तीन को महज 4!

अजीत मिश्रा (खोजी)
एफसीआई में भ्रष्टाचार का ‘विटामिन एम’ खेल: एक चहेते मैनेजर को 7 सेंटरों की मलाई, बाकी तीन को महज crumbs!
- ‘विटामिन एम’ का कमाल या मनमानी? एफसीआई में नियमों को ताक पर रखकर चहेते पर मेहरबान हुए अधिकारी
- गोरखपुर-बस्ती एफसीआई मंडल में अजब आवंटन: सात केंद्रों की जिम्मेदारी सिर्फ एक ही चहेते को क्यों?
- जब साहब हुए मेहरबान: एक मैनेजर को मिला केंद्रों का पूरा साम्राज्य, बाकी तीन देखते रह गए रास्ता!
- एफसीआई का अजब-गजब गणित: एक को सात, बाकी तीन को कुल चार!
- जितना बड़ा केंद्र का साम्राज्य, उतनी ही अधिक ‘मलाई’! एफसीआई के इस खेल पर उठ रहे बड़े सवाल
गोरखपुर/बस्ती: भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोरखपुर रीजनल ऑफिस में इन दिनों ‘मेहरबानी’ और ‘भाई-भतीजावाद’ का एक ऐसा नंगा नाच चल रहा है, जिसने महकमे की साख को तार-तार कर दिया है। हाल ही में जारी केंद्र आवंटन (Center Allocation) के एक आदेश ने यह साबित कर दिया है कि महकमे में नियम, कानून और पारदर्शिता सिर्फ कागजी जुमले बनकर रह गए हैं, जबकि असली खेल तो ‘चहेतों’ को उपकृत करने का खेला जा रहा है।
अंकगणित का अजब खेल: एक को सात, बाकी तीन को कुल चार!
मामला 7 अक्टूबर को जारी उस आदेश से जुड़ा है, जिसके तहत गोरखपुर और बस्ती मंडल के मैनेजर स्तर के चार अधिकारियों के बीच केंद्रों का वितरण किया गया था। इस आवंटन का गणित इतना बेतुका और पक्षपातपूर्ण है कि हर कोई अवाक है:
- बस्ती मंडल के चहेते मैनेजर राजीव रंजन को अकेले सात (7) केंद्रों की कमान सौंप दी गई।
- वहीं, दूसरी तरफ बाकी बचे तीन अन्य प्रबंधकों को आपस में मिलकर कुल मात्र चार केंद्र ही नसीब हुए।
आखिर इस असमान वितरण का आधार क्या था? क्या कार्यभार, अनुभव या प्रशासनिक जरूरत का आकलन किए बिना ही यह मनमाना फरमान जारी कर दिया गया?
चर्चाओं का बाजार गर्म: क्या सिर्फ ‘विटामिन एम’ के लिए है यह झालमेल?
विभागीय गलियारों और दबी जुबान से उठ रही आवाज़ों के मुताबिक, इस भारी-भरकम असमानता के पीछे केवल प्रशासनिक मजबूरी नहीं, बल्कि ‘विटामिन एम’ (मनी/धन) का मोटा खेल चल रहा है। चर्चा आम है कि:
“जितना बड़ा केंद्र का साम्राज्य, उतनी ही अधिक मलाई और उतना ही भारी ‘विटामिन एम’!”
जब एक ही स्तर के अधिकारियों के बीच कार्यक्षेत्र और जिम्मेदारियों में इतना जमीन-आसमान का फर्क हो, तो वित्तीय लेन-देन और अनुचित लाभ की आशंकाएं स्वतः ही मजबूत हो जाती हैं। लेकिन इन सवालों के जवाब देने के बजाय संबंधित अधिकारी चुप्पी साधे बैठे हैं।
एजीएम राजन कुमार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
इस पूरे प्रकरण की धुरी बने हैं एफसीआई गोरखपुर के एजीएम राजन कुमार, जिन पर अपने खास मैनेजर राजीव रंजन को विशेष तरजीह देने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। जब इस आदेश की सत्यता और पारदर्शिता जानने के लिए एजीएम सेकंड प्रवीण वर्मा से संपर्क किया गया, तो उन्होंने सारा ठीकरा एजीएम राजन कुमार के आदेश पर फोड़ दिया।
हैरानी की बात यह है कि जब मीडिया या संबंधितों ने इस पर पक्ष जानना चाहा, तो एजीएम साहब ने चुप्पी साध ली और खबर लिखे जाने तक कोई कॉल बैक या संतोषजनक जवाब नहीं आया। क्या किसी अधिकारी को अंधाधुंध अधिकार सौंपने से पहले किसी लिखित नीति या पारदर्शी समीक्षा की जरूरत नहीं समझी गई?
निष्कर्ष और जांच की मांग
एफसीआई जैसी केंद्रीय संस्था में यदि इस तरह ‘मेहरबानी’ और ‘चहेतावाद’ का खेल खुलेआम चलेगा, तो आम जनता और किसानों का विश्वास कैसे बचेगा? जरूरत इस बात की है कि उच्चाधिकारी इस मनमाने आवंटन का संज्ञान लें और इसकी निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच करवाएं, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
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