बस्ती:: क्यों’ छिपाई जाती, ‘डूडा’ और नगर पंचायत ‘भानपुर’ के ‘योजनाओं’ की ‘जानकारी’?

अजीत मिश्रा (खोजी)
भानपुर में विकास कार्यों का खेल: क्यों छिपाई जाती है ‘डूडा’ और ‘नगर पंचायत’ की योजनाओं की जानकारी?
- सीआईबी (CIB) की अनदेखी: निर्माण स्थल पर ‘सिटीजन इंफॉर्मेशन बोर्ड’ (CIB) न लगाने या उसके नाम पर 10 हजार रुपये खारिज किए जाने से जनता शिकायत नहीं कर पाती है.
- जिम्मेदारियों का टालमटोल: सड़क डूडा बनाती है या नगर पंचायत, यह स्पष्ट न होने के कारण दोनों विभाग अपनी जिम्मेदारी एक-दूसरे पर टालते रहते हैं.
- शिकायतों का अंतहीन चक्कर: गुणवत्ता को लेकर की गई शिकायतें नगर पंचायत से पीडब्ल्यूडी और डूडा के बीच चक्कर काटती रहती हैं, जिससे शिकायतकर्ता परेशान होकर बैठ जाता है.
- फर्जी भुगतान और बंदरबांट: नौगढ़वा की सड़क पाँच महीने में ही टूट गई, जिससे बिना भौतिक सत्यापन के करोड़ों रुपये के फर्जी भुगतान और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका पर बड़े सवाल खड़े होते हैं.
बस्ती। बस्ती जिले के नगर पंचायत भानपुर क्षेत्र में विकास कार्यों को लेकर एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाला सवाल खड़ा हो गया है। यहाँ आम जनता के लिए सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उनके ही क्षेत्र में बनने वाली सड़कों और नालियों जैसी बुनियादी परियोजनाओं का सच किसी पहेली से कम नहीं है। जनता को यह तक पता नहीं होता कि उनके मोहल्ले में निर्माण कार्य कराने वाली संस्था कौन सी है, उसका ठेकेदार कौन है और यह परियोजना कितनी लागत से तैयार हो रही है।
पारदर्शिता के नाम पर केवल खानापूर्ति और पल्ला झाड़ना
नियमों के मुताबिक, यदि निर्माण स्थल पर ‘सिटीजन इंफॉर्मेशन बोर्ड’ (CIB) लगा दिया जाए, तो जनता को यह पता चल सके कि कार्य किस संस्था द्वारा कराया जा रहा है और वे गुणवत्ताहीन काम के खिलाफ शिकायत कर सकें। लेकिन भानपुर में सीआईबी के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाती है या इसे सिरे से खारिज कर दिया जाता है।
जब क्षेत्र में कोई सड़क या नाली बनती है, तो नगर पंचायत के लोग सोचते हैं कि इसे ‘डूडा’ बनवा रहा है, और डूडा समझता है कि इसे नगर पंचायत ने बनवाया है। इस तरह दोनों विभाग अपनी जिम्मेदारियों से मुकरते नजर आते हैं और फाइलों को एक-दूसरे पर टालने का खेल चलता रहता है। एनओसी नगर पंचायत देती है, भुगतान डूडा करता है, और इस कागजी गोलमाल के बीच जनता अंधेरे में रहती है।
शिकायतों को भटकाने का प्रशासनिक चक्रव्यूह
यदि कोई जागरूक नागरिक सड़क की गुणवत्ता या भ्रष्टाचार की शिकायत नगर पंचायत भानपुर में करता है, तो वहाँ के जिम्मेदार यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि यह सड़क उनके द्वारा नहीं बनवाई गई है। इसके बाद शिकायत पत्र को लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) और डूडा जैसे विभागों के चक्कर काटने के लिए भेज दिया जाता है। इस लंबी और पेचीदा प्रक्रिया में महीनों बीत जाते हैं और अंततः शिकायतकर्ता थक-हारकर बैठ जाता है। यही प्रशासनिक उदासीनता भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है।
बिना भौतिक सत्यापन के फर्जी भुगतान और जवाबदेही का सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या बिना भौतिक सत्यापन (Physical Verification) के ही करोड़ों रुपये का भुगतान कर दिया जाता है? नौगढ़वा की सड़क का उदाहरण सबके सामने है, जो बनने के महज पाँच महीने के भीतर ही टूट गई। यदि प्रशासनिक अधिकारियों ने समय रहते भौतिक सत्यापन किया होता, तो इस प्रकार का फर्जी भुगतान और भ्रष्टाचार संभव नहीं था।
नगर पंचायत भानपुर के प्रशासक ‘सीआरओ’ हैं, जबकि डूडा के परियोजना अधिकारी (पीओ) ‘एसडीएम राजेश यादव’ हैं। जब इन बड़े प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में योजनाओं के नाम पर सरकारी धन की बंदरबांट हो रही है, तो क्या इसकी सीधी जिम्मेदारी इन अधिकारियों की नहीं बनती?
जनता का सीधा सवाल है—जब योजनाओं की जमीनी हकीकत जानने के लिए अधिकारी भौतिक सत्यापन नहीं करते और फाइलों के दम पर फर्जी भुगतान हो जाते हैं, तो फिर करोड़ों रुपये के विकास कार्यों की जिम्मेदारी संभालने वाले इन प्रशासनिक अधिकारियों को क्यों नकटघरे में खड़ा किया जाए?
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