बस्ती के कप्तानगंज स्थित मदरसा दारुल उलूम अहले सुन्नत फैजुन्नबी के प्रबंधक हाजी मुनीर अली (जिन्हें ‘छह दामाद वाले प्रबंधक’ कहा जाता है) का बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर

अजीत मिश्रा (खोजी)
शिक्षा के मंदिर में भ्रष्टाचार का काला खेल: छह ‘दामाद’ वाले प्रबंधक का नया ‘फर्जीवाड़ा’
- मान्यता से पहले का फर्जी अंक पत्र: शिक्षक मो. नसीम राजा वर्ष 2010 से फर्जी तरीके से नौकरी कर रहे हैं, जिनका अंक पत्र वर्ष 2004 का है जबकि मदरसे को मान्यता वर्ष 2008 में मिली थी.
- अमान्य मदरसे की डिग्री पर लाखों का वेतन: अब्दुल लतीफ एक ऐसे अमान्य मदरसे की डिग्री के आधार पर नौकरी कर रहे हैं और वर्ष 2010 से लगभग एक लाख रुपये प्रतिमाह वेतन पा रहे हैं, जिसकी कोई वैध मान्यता नहीं है.
- अधिकारियों की मिलीभगत और लीपापोती: तत्कालीन जिला अल्पसंख्यक अधिकारियों (धर्मदेव त्रिपाठी और प्रियंका अवस्थी) पर मोटी रकम लेकर बिना जांच-पड़ताल के इन फर्जी मामलों में आरोपियों को क्लीन चिट देने का गंभीर आरोप है.
बस्ती जिले के कप्तानगंज स्थित मदरसा दारुल उलूम अहले सुन्नत फैजुन्नबी के प्रबंधक हाजी मुनीर अली, जिन्हें क्षेत्र में ‘छह दामाद वाले प्रबंधक’ के रूप में जाना जाता है, एक बार फिर बड़े पैमाने पर चल रहे फर्जीवाड़े को लेकर चर्चा में हैं. समाज जिन प्रबंधकों से ईमानदारी की सबसे अधिक उम्मीद करता है, वे किस तरह शिक्षा के नाम पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं, यह पूरा प्रकरण उसकी पोल खोलता है. मदरसे में बिना डिग्रयों का सत्यापन कराए और मोटी रकम लेकर अपात्रों को नौकरी पर रखने का यह सिलसिला शिक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा दाग है।बस्ती जिले में शिक्षा के नाम पर चल रहे फर्जीवाड़े का एक और सनसनीखेज मामला सामने आया है। कप्तानगंज स्थित मदरसा दारुल उलूम अहले सुन्नत फैजुन्नबी के प्रबंधक हाजी मुनीर अली, जिन्हें ‘छह दामाद वाले प्रबंधक’ के रूप में जाना जाता है, की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। समाज जिन प्रबंधकों से ईमानदारी की उम्मीद करता है, वे ही किस तरह शिक्षा के नाम पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं, यह इस पूरे प्रकरण से उजागर होता है।
पहला मामला: मो. नसीम राजा का फर्जी अंक पत्र और नियुक्ति
- पिल्खाई (बस्ती) के रहने वाले मो. नसीम राजा (पुत्र जामिन अली) वर्ष 2010 से लगातार फर्जी तरीके से शिक्षक के रूप में नौकरी कर रहे हैं.
- उनके द्वारा प्रस्तुत अंक पत्र वर्ष 2004 का है, जबकि जिस मदरसे से यह अंक पत्र जारी हुआ था, उसकी मान्यता वर्ष 2008 में मिली थी.
- जब इस विसंगति और फर्जी योग्यता के पुख्ता साक्ष्य गुलाम हुसैन (पुत्र अकबर अली) द्वारा तत्कालीन जिला अल्पसंख्यक अधिकारी धर्मदेव त्रिपाठी के समक्ष रखे गए, तो उन्होंने बिना किसी निष्पक्ष जांच-पड़ताल के, कथित तौर पर मोटी रकम लेकर गलत को सही साबित कर दिया.
दूसरा मामला: अब्दुल लतीफ की फर्जी डिग्री और भारी-भरकम वेतन
- कप्तानगंज निवासी अब्दुल लतीफ (पुत्र हसमतुल्लाह) जिस ‘दारुल उलूम मोहम्मदिया अहले सुन्नत फैजे गौसिया बैरागल डुबौलिया’ मदरसे की डिग्री के आधार पर शिक्षक बने हैं, उसकी आज की तारीख में कोई मान्यता ही नहीं है.
- इसके बावजूद, प्रबंधक हाजी मुनीर अली द्वारा उन्हें वर्ष 2010 से लगभग एक लाख रुपये प्रतिमाह का भारी वेतन दिया जा रहा है.
- यदि हाजी मुनीर के स्थान पर कोई अन्य ईमानदार प्रबंधक होता, तो वह ऐसे दोनों फर्जी शिक्षकों को तुरंत बाहर का रास्ता दिखा देता, लेकिन प्रबंधक खुद कथित तौर पर अनैतिक कार्यों में लिप्त हैं, इसलिए उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसकी डिग्री असली है और किसकी नकली.
अधिकारियों की मिलीभगत और लीपापोती
- इस पूरे फर्जीवाड़े को फलने-फूलने में शिक्षा विभाग के अधिकारियों की भी संलिप्तता रही है.
- तत्कालीन जिला अल्पसंख्यक अधिकारी धर्मदेव त्रिपाठी और उसके बाद जिला अल्पसंख्यक अधिकारी प्रियंका अवस्थी के पास जब गुलाम हुसैन द्वारा शिकायत दर्ज कराई गई, तो उन्होंने भी पैसों के बल पर आरोपियों को क्लीन चिट दे दी.
- इस बात की कोई परवाह नहीं की गई कि जिस मदरसे का अंक पत्र प्रस्तुत किया जा रहा है, उसकी कोई वैध मान्यता है भी या नहीं.
- यह पूरा मामला जब रजिस्ट्रार कार्यालय तक पहुँचा, तो वहाँ भी कथित तौर पर पैसा भारी पड़ा और न्याय की बजाय मामले को दबाने का प्रयास किया गया.
निष्कर्ष: यह खबर इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि किस प्रकार कुछ दबंग प्रबंधकों और भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारियों की साठगांठ से शिक्षा संस्थानों को भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया गया है, जहाँ नियमों को ताक पर रखकर अयोग्य लोगों को पाला जा रहा है.
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