श्री शंकर झंकार नाट्यकला के मंच पर गूंजा श्रीकृष्ण-अर्जुन संग्राम, चित्रसेन गंधर्व की कथा ने दर्शकों को किया मंत्रमुग्ध

तीसरे दिन भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच धर्म, मित्रता, प्रतिज्ञा और कर्तव्य की अनूठी परीक्षा का हुआ जीवंत मंचन; कलाकारों के प्रभावशाली अभिनय पर देर रात तक गूंजती रहीं तालियां
महुली सोनभद्र(राकेश कुमार कन्नौजिया)_ विंढमगंज थाना क्षेत्र के महुली पूर्व महुअरिया में आयोजित 52वें श्री शंकर झंकार नाट्यकला परिषद के भव्य नाट्य मंचन के तीसरे दिन बुधवार की रात पौराणिक कथाओं पर आधारित प्रसिद्ध नाटक 'श्री कृष्ण अर्जुन संग्राम उर्फ चित्रसेन गंधर्व' का शानदार मंचन किया गया। मंच पर कलाकारों ने अपने सजीव अभिनय, प्रभावशाली संवाद और भावपूर्ण प्रस्तुति से द्वापर युग की एक रोचक धार्मिक कथा को जीवंत कर दिया। भगवान श्रीकृष्ण और उनके परम मित्र अर्जुन के बीच हुए धर्मसंकट तथा युद्ध के प्रसंग ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। नाटक में मित्रता, वचनबद्धता, शरणागत की रक्षा, नारी की निष्ठा और धर्मपालन जैसे महत्वपूर्ण संदेशों को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।
नाटक की कथा महर्षि गालव के प्रसंग से प्रारंभ होती है। एक दिन महर्षि गालव नदी के तट पर सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित कर रहे होते हैं। उसी समय आकाश मार्ग से गुजर रहे चित्रसेन गंधर्व की असावधानी के कारण अपवित्र वस्तु महर्षि की अंजलि में गिर जाती है। इससे महर्षि गालव अत्यंत क्रोधित हो जाते हैं। वे चित्रसेन को श्राप देना चाहते हैं, लेकिन अपने तपोबल के नष्ट होने की आशंका से ऐसा नहीं करते। इसके बाद वे भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचकर अपनी पीड़ा सुनाते हैं।
महर्षि की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण उन्हें आश्वासन देते हैं कि वे चौबीस घंटे के भीतर चित्रसेन गंधर्व का वध कर उनके अपमान का प्रतिशोध लेंगे। भगवान श्रीकृष्ण की इस कठोर प्रतिज्ञा से कथा में नया मोड़ आ जाता है।
इसी बीच देवर्षि नारद को भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिज्ञा की जानकारी हो जाती है। वे चित्रसेन गंधर्व के पास पहुंचकर उसे उसके जीवन पर मंडरा रहे संकट से अवगत कराते हैं। मृत्यु के भय से व्याकुल चित्रसेन तीनों लोकों में अपनी रक्षा के लिए शरण तलाशता है, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण के विरुद्ध जाने का साहस कोई नहीं जुटा पाता।
तब देवर्षि नारद अपनी लीला से एक ऐसा रास्ता निकालते हैं, जिससे पूरी कथा भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच संघर्ष की ओर बढ़ने लगती है। नारद जी अर्जुन की पत्नी एवं भगवान श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा को यमुना तट पर जाकर किसी असहाय व्यक्ति की सहायता करने से मिलने वाले पुण्य का महत्व बताते हैं।
आधी रात को सुभद्रा यमुना तट पर पहुंचती हैं, जहां उन्हें चित्रसेन गंधर्व अपने परिवार सहित विलाप करते हुए मिलता है। सुभद्रा जब उसके दुख का कारण पूछती हैं तो चित्रसेन उनसे पहले अभयदान देने का वचन लेता है। सुभद्रा उसकी रक्षा का वचन दे देती हैं। इसके बाद चित्रसेन उन्हें भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिज्ञा के बारे में बताता है।
यह सुनकर सुभद्रा धर्मसंकट में पड़ जाती हैं। वे अपने पति अर्जुन के पास पहुंचकर पूरी बात बताती हैं। अर्जुन अपनी पत्नी को आश्वस्त करते हुए कहते हैं कि जो व्यक्ति उनकी शरण में आ चुका है, उसकी रक्षा करना उनका क्षत्रिय धर्म है। वे चित्रसेन को अभयदान देते हुए उसकी रक्षा का संकल्प लेते हैं।
जब देवर्षि नारद भगवान श्रीकृष्ण को बताते हैं कि चित्रसेन को अर्जुन ने अपनी शरण में ले लिया है, तब भगवान श्रीकृष्ण स्वयं असमंजस में पड़ जाते हैं। एक ओर महर्षि गालव को दिया गया उनका वचन है तो दूसरी ओर उनके परम प्रिय मित्र अर्जुन का संकल्प। भगवान श्रीकृष्ण नारद जी को अर्जुन के पास समझाने के लिए भेजते हैं, लेकिन अर्जुन अपने निर्णय पर अडिग रहते हैं। उनका कहना होता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने ही उन्हें क्षत्रिय धर्म और शरणागत की रक्षा का पाठ पढ़ाया है, इसलिए वे अपने वचन से पीछे नहीं हट सकते।
अंततः भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच भीषण संग्राम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। दोनों ओर से अद्भुत पराक्रम और दिव्य शक्तियों का प्रदर्शन होता है। भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच युद्ध का यह प्रसंग पूरी कथा का सबसे रोमांचक और भावपूर्ण हिस्सा बन जाता है।
इधर महर्षि गालव भी चित्रसेन को दंड न मिलने से क्रोधित हो उठते हैं। वे अपने तपोबल से सभी को भस्म करने की बात कहते हैं। ऐसी विकट परिस्थिति में सुभद्रा अपनी भक्ति और निष्ठा की शक्ति का परिचय देती हैं। वे संकल्प करती हैं कि यदि उनकी भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और अर्जुन के प्रति निष्ठा सच्ची है तो महर्षि के हाथ का जल धरती पर नहीं गिरेगा। उनके संकल्प से महर्षि गालव की शक्ति निष्फल हो जाती है।
सुभद्रा की निष्ठा और समर्पण देखकर महर्षि गालव का क्रोध शांत हो जाता है। अंततः भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच युद्ध समाप्त होता है। चित्रसेन को जीवनदान मिलता है और सभी के बीच पुनः सौहार्द स्थापित हो जाता है। इस प्रकार नाटक का समापन धर्म, सत्य, मित्रता, वचनपालन और शरणागत की रक्षा के संदेश के साथ होता है। कथा दर्शाती है कि धर्म के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के लिए अपने वचन और कर्तव्य का पालन सर्वोपरि होता है।
नाटक में विभिन्न पात्रों का अभिनय करने वाले कलाकारों ने अपनी शानदार प्रस्तुति से कथा को प्रभावशाली बनाया। गंधर्व राजा की भूमिका राजेश कुमार शर्मा, चित्रा रानी की भूमिका जोगिंदर सिंह, गालव ऋषि की भूमिका उदय कुमार शर्मा, शिष्य (चेला) की भूमिका समशाद आलम, बलराम की भूमिका राजू शर्मा, भगवान श्रीकृष्ण की भूमिका अंकित कुमार शर्मा, अर्जुन की भूमिका डा अब्दुल कलाम, देवर्षि नारद की भूमिका महेंद्र प्रसाद पूरी, द्रौपदी की भूमिका विक्की कुमार शर्मा, कर्ण की भूमिका जसवंत कुमार शर्मा, भीम की भूमिका ओम प्रकाश, शंकर की भूमिका विकास कुमार शर्मा तथा कृतवर्मा की भूमिका राजू शर्मा ने निभाई। कलाकारों ने अपने पात्रों के अनुरूप वेशभूषा, संवाद अदायगी और भावपूर्ण अभिनय से दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी।
इस अवसर पर श्री शंकर झंकार नाट्यकला परिषद के अध्यक्ष एवं ग्राम प्रधान महुली अरविंद जायसवाल, उपाध्यक्ष सेकरार अहमद, दीपक कुमार कन्नौजिया, विनोद कन्नौजिया, डॉ. अब्दुल कलाम, अवधेश कुमार शर्मा, डायरेक्टर राजेश शर्मा, उप डायरेक्टर जसवंत शर्मा तथा लालमणि शर्मा सहित परिषद के अन्य पदाधिकारी एवं सैकड़ों की संख्या में क्षेत्रीय दर्शक उपस्थित रहे।
नाटक के विभिन्न दृश्यों में कलाकारों ने अपने अभिनय से दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी। विशेषकर श्रीकृष्ण-अर्जुन संग्राम, नारद की लीला, सुभद्रा के वचन और महर्षि गालव के क्रोध से जुड़े प्रसंगों पर दर्शकों ने तालियों के साथ कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। देर रात तक दर्शक मंचन का आनंद लेते रहे।
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