
अजीत मिश्रा (खोजी)
सिस्टम की ‘मनगढ़ंत’ थ्योरी बनाम पिता का दर्द: दारोगा अजय गौड़ की मौत महज हादसा या सोची-समझी साजिश?
बस्ती/देवरिया: जब कानून के रखवाले ही सवालों के घेरे में हों, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? परशुरामपुर थाने में तैनात दारोगा अजय कुमार गौड़ की सरयू नदी में मिली लाश ने खाकी के भीतर चल रही किसी गहरी साजिश की ओर इशारा कर दिया है। पुलिस इसे महज ‘डूबने से हुई मौत’ बताकर फाइल बंद करने की तैयारी में है, लेकिन मृतक के पिता रामचंद्र गौड़ ने सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र भेजकर इस पूरी जांच को पुलिस की ‘मनगढ़ंत कहानी’ करार दिया है।
वर्दी पर ‘अपनों’ ने ही फेरा पानी?
पिता का आरोप सीधा और बेहद गंभीर है—पुलिस विभाग जांच नहीं कर रहा, बल्कि अपनी सुविधानुसार एक कहानी रच रहा है ताकि असली दोषियों को बचाया जा सके। ५ फरवरी की शाम ड्यूटी के दौरान रहस्यमयी तरीके से लापता हुए अजय का शव तीन दिन बाद ८ फरवरी को सरयू नदी में मिला। पुलिस इसे दुर्घटना बता रही है, लेकिन मृतक के शरीर पर मिले चोट के निशान कुछ और ही गवाही दे रहे हैं।
मेडिकल रिपोर्ट में ‘झोल’ या जानबूझकर की गई हेराफेरी?
पिता रामचंद्र गौड़ ने पोस्टमार्टम और डायटम रिपोर्ट के बीच के विरोधाभासों को आधार बनाकर पुलिसिया दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं:
चोट के निशान: मृतक के गले, नाक, होंठ और ठोड़ी पर गंभीर चोट के निशान थे। यहाँ तक कि एक हाथ टूटा हुआ भी प्रतीत हो रहा था। क्या पानी में गिरने से हाथ टूट सकता है और चेहरे पर ऐसे घाव आ सकते हैं?
फेफड़ों की हकीकत: शुरुआती पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, मृतक के फेफड़ों में न तो नदी का पानी मिला और न ही रेत का कोई अंश। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, डूबने वाले व्यक्ति के फेफड़ों में पानी का होना अनिवार्य है।
डायटम रिपोर्ट पर सवाल: जब फेफड़ों में पानी नहीं था, तो बाद में आई डायटम रिपोर्ट में मौत का कारण ‘डूबना’ कैसे बता दिया गया?
शव की स्थिति: चार दिन तक पानी में रहने के बाद भी शव की त्वचा खराब नहीं हुई थी। यह चिकित्सकीय विज्ञान के सामान्य नियमों के खिलाफ है और संदेह पैदा करता है कि शव को बाद में नदी में डाला गया।
मुख्यमंत्री से ‘निष्पक्ष’ न्याय की गुहार
रामचंद्र गौड़ ने मुख्यमंत्री को भेजे रजिस्टर्ड पत्र में मांग की है कि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। उनका आरोप है कि पुलिस के उच्चाधिकारी इस मामले में भ्रामक तथ्य पेश कर रहे हैं और साक्ष्यों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
“यह जांच रिपोर्ट नहीं, बल्कि असली कातिलों को बचाने का एक कवच है।” – रामचंद्र गौड़ (मृतक के पिता)
मुख्य सवाल जो जवाब मांगते हैं:
ऑन-ड्यूटी एक पुलिस अफसर अचानक कैसे गायब हो गया?
अगर मौत डूबने से हुई, तो फेफड़ों में पानी और रेत क्यों नहीं थी?
शरीर पर मिले चोट के निशानों को जांच में शामिल क्यों नहीं किया जा रहा?
सरयू की लहरों ने अजय गौड़ का शरीर तो लौटा दिया, लेकिन सच अब भी वर्दी के रसूख और कागजी दांव-पेंचों के नीचे दबा हुआ है। क्या मुख्यमंत्री इस मामले में दखल देकर एक बेबस पिता को इंसाफ दिलाएंगे, या यह केस भी ‘दुर्घटना’ की फाइलों में धूल फांकेगा?
प्रतिक्रिया: जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में हों!
“कानून अंधा होता है, यह सुना था, लेकिन कानून का रखवाला ही सच से आँखें फेर ले, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।”
दारोगा अजय कुमार गौड़ की संदिग्ध मौत पर जिस तरह की ‘थ्योरी’ पुलिस विभाग पेश कर रहा है, वह न केवल हास्यास्पद है बल्कि एक शहीद पुलिसकर्मी के परिवार के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।
सवाल व्यवस्था की नीयत पर है:
वैज्ञानिक विरोधाभास: एक तरफ मेडिकल साइंस कहता है कि डूबने वाले के फेफड़ों में पानी और रेत होनी चाहिए, दूसरी तरफ पुलिस की फाइल कहती है कि फेफड़े साफ थे लेकिन मौत ‘डूबने’ से हुई। क्या अब पुलिस विभाग विज्ञान के नियमों को भी अपनी सुविधा के अनुसार बदल देगा?
चोट के निशानों की अनदेखी: मृतक के चेहरे और शरीर पर मिले घाव चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यह साधारण ‘डूबना’ नहीं है। फिर भी, आला अधिकारियों का इन साक्ष्यों को ‘नजरअंदाज’ करना यह साफ संकेत देता है कि किसी ‘बड़े रसूखदार’ को बचाने की कोशिश की जा रही है।
विभाग की चुप्पी: अपने ही एक साथी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत पर विभाग का यह ‘रक्षात्मक’ रवैया शर्मनाक है। क्या वर्दी का धर्म केवल रसूखदारों की फाइलों को सुरक्षित रखना रह गया है?
निष्कर्ष:
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर यह मामला एक सीधा प्रहार है। एक पिता का रजिस्टर्ड पत्र सिर्फ कागज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि उस सिस्टम की साख पर सवाल है जो अपनों की ही जान की कीमत नहीं समझता। अगर एक दारोगा का परिवार न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है, तो आम जनता की सुरक्षा का क्या?
इस मामले में ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ होना ही चाहिए। जाँच की लीपापोती करने वाले अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो, वरना जनता का खाकी पर से बचा-कुचा भरोसा भी उठ जाएगा।
















