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“डिजिटल इंडिया में ‘अदृश्य’ मजदूर: रुधौली में मनरेगा के नाम पर महालूट!”

"साहब! फोटो में पुरुष और कागजों में नारी, ऐसी है मनरेगा की 'जादुई' तैयारी।"

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। जांच का ढोंग या भ्रष्टाचार को ढाल? मनरेगा के ‘डिजिटल खेल’ पर मौन क्यों प्रशासन।।

शुक्रवार 16 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती (रुधौली)।। सरकार ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए मनरेगा में NMMS (National Mobile Monitoring System) और GPS टैगिंग जैसी व्यवस्थाएं लागू कीं, ताकि ‘कागजी मजदूरों’ के जरिए होने वाली लूट को रोका जा सके। लेकिन रुधौली विकासखंड से जो खबरें आ रही हैं, वे तकनीक और पारदर्शिता के दावों के मुंह पर तमाचा हैं।

💫जांच हुई, पर क्या सिर्फ कागजों का पेट भरने के लिए?

रुधौली में मनरेगा घोटाले की हालिया जांच ने भ्रष्टाचार को खत्म करने के बजाय उस पर पर्देदारी करने का काम किया है। शिकायतकर्ताओं का सीधा आरोप था कि वर्ष 2025-26 की परियोजनाओं में फर्जी मस्टररोल के जरिए पैसा निकाला गया। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि जांच टीम ने मौके पर जाकर मजदूरों की व्यक्तिगत फोटो लेने, उनके आधार/जॉब कार्ड का मिलान करने और GPS साक्ष्य जुटाने की जहमत ही नहीं उठाई।

💫घोटाले के वो ‘अजीबो-गरीब’ नमूने:

इस पूरे मामले में जो तथ्य सामने आए हैं, वे किसी भी ईमानदार व्यवस्था को शर्मसार करने के लिए काफी हैं:

एक फोटो, चार योजनाएं: ग्राम पंचायत बिजलपुर में 2 से 7 दिसंबर के बीच चार अलग-अलग योजनाओं में एक ही फोटो का इस्तेमाल कर 83 मजदूरों की हाजिरी लगा दी गई।

नाम महिला का, फोटो पुरुष की: मास्टर रोल में नाम महिलाओं के दर्ज हैं, लेकिन पोर्टल पर अपलोड की गई फोटो पुरुषों की है। क्या प्रशासन को यह ‘तकनीकी गलती’ लगती है या यह एक सोची-समझी डकैती है?

फोटो में 9, मास्टर रोल में 36: ग्राम पंचायत तिगोड़िया में कागजों पर 36 मजदूर काम कर रहे हैं, लेकिन फोटो में सिर्फ 9-10 चेहरे दिखाई देते हैं। बाकी के 26 मजदूर क्या ‘मिस्टर इंडिया’ बनकर काम कर रहे थे?

💫बी़डीओ की भूमिका पर उठते सवाल

शिकायत में स्पष्ट रूप से NMMS और GPS सत्यापन की मांग की गई थी, फिर भी जांच टीम ने डिजिटल साक्ष्यों से दूरी क्यों बनाई? क्या यह जांच जानबूझकर कमजोर रखी गई ताकि बड़े अधिकारियों और बिचौलियों को बचाया जा सके? रुधौली के ग्राम पंचायत आंवारी और पिपरा कला में एक ही श्रमिक की फोटो दो अलग परियोजनाओं में दिखाकर डबल भुगतान का जो खेल खेला गया, वह बिना प्रशासनिक संरक्षण के संभव नहीं है।

निष्कर्ष: यह रोजगार योजना है या ‘फर्जी हाजिरी का महोत्सव’?

आज मनरेगा गरीबों को रोजगार देने वाली योजना के बजाय भ्रष्टाचारियों के लिए ‘दुधारू गाय’ बन गई है। यदि प्रशासन वास्तव में ईमानदार है, तो उसे इन तकनीकी और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर पुनः निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। अन्यथा, यह मान लिया जाएगा कि “सब मिले हुए हैं” और भ्रष्टाचार की यह फाइल भी फाइलों के ढेर में दफन कर दी जाएगी।

जनता पूछ रही है: साक्ष्य सामने हैं, फिर भी कार्रवाई से

परहेज क्यों?

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