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पुलिस और अपराधियों का ‘खूनी सिंडिकेट’: सूचना दी तो मौत पक्की, कोतवाल की नाक के नीचे चल रहा खेल!

शिकायतकर्ता की जान खतरे में, अपराधी पुलिस की गोद में—क्या यही है कोतवाल दिनेश चंद्र का इंसाफ?

अजीत मिश्रा (खोजी)

खाकी के रक्षक या ‘काले धंधों’ के संरक्षक? कोतवाल दिनेश चंद्र के राज में बस्ती बना का अपराध का गढ़!

​बस्ती। पुलिस की वर्दी पहनकर जब कोई अधिकारी कानून की धज्जियां उड़ाने वालों का हमसफ़र बन जाए, तो समाज का पतन निश्चित है। बस्ती कोतवाली की कमान संभाल रहे कोतवाल दिनेश चंद्र के कार्यकाल में ‘अपराध मुक्त बस्ती’ का नारा अब सिर्फ कागजों पर सिमट कर रह गया है। रौता चौकी क्षेत्र में गांजा, स्मैक, जुआ और देह व्यापार का जो नंगा नाच चल रहा है, उसकी पटकथा कहीं और नहीं बल्कि कोतवाली की फाइलों के नीचे ही लिखी जा रही है।

सूचना दी तो मिलेगी मौत!

इस पूरे खेल में सबसे भयावह पहलू यह है कि प्रशासन अब अपराधियों के लिए ‘कवच’ का काम कर रहा है। यदि कोई जागरूक नागरिक या मुखबिर इन अवैध गतिविधियों की सूचना देने की हिम्मत करता है, तो उसकी गोपनीयता सुरक्षित रखने के बजाय, उसे सीधे मौत के मुहाने पर धकेल दिया जाता है। पीड़ितों का आरोप है कि सूचना लीक होने के बाद उन्हें प्रशासन और अपराधियों, दोनों की तरफ से हत्या की धमकियां मिल रही हैं।

सवाल यह उठता है: क्या बस्ती पुलिस अब अपराधियों की ‘बी-टीम’ बन चुकी है? क्या कप्तान साहब को अपने मातहतों के इस ‘कमीशन तंत्र’ की भनक नहीं है?

नशे की गिरफ्त में युवा, जिस्मफरोशी का जाल

रौता चौकी क्षेत्र के मोहल्लों में स्मैक और गांजे की बिक्री ने युवाओं का भविष्य अंधकार में डाल दिया है। गली-कूचों में चलते जुए के अड्डों और देह व्यापार की शिकायतों पर पुलिस की चुप्पी यह बताने के लिए काफी है कि ‘ऊपर तक’ हिस्सा पहुँच रहा है। पुलिस की कार्यशैली अब ‘अपराध मुक्त समाज’ नहीं, बल्कि ‘शिकायतकर्ता मुक्त समाज’ बनाने की ओर अग्रसर दिख रही है।

जिम्मेदारों की चुप्पी पर सवाल

जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो जनता गुहार किससे लगाए? एक तरफ सूबे के मुखिया ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर बस्ती के रौता में खाकी और अपराधी एक ही थाली में छेद कर रहे हैं। क्या उच्चाधिकारी इस गठजोड़ को तोड़ेंगे, या फिर किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार किया जा रहा है?

​कोतवाल साहब की ‘मौन स्वीकृति’ का क्या है मोल?

​एक पूरी चौकी के नाक के नीचे सरेआम नशा बेचा जा रहा है और देह व्यापार की मंडियां सज रही हैं—क्या यह संभव है कि कोतवाल दिनेश चंद्र को इसकी भनक न हो? चर्चाएं तो यहाँ तक हैं कि यह सब ‘अंधाधुंध वसूली’ और ‘मंथली’ के खेल का हिस्सा है। कोतवाल साहब ने शायद अपनी आँखों पर वर्दी की पट्टी नहीं, बल्कि ‘स्वार्थ की पट्टी’ बांध ली है, जिसके कारण उन्हें जनता की कराह और अपराधियों का तांडव दिखाई नहीं दे रहा।

​सूचना देने वाला ‘टारगेट’ पर, अपराधी ‘मेहमान’!

​दिनेश चंद्र के राज में बस्ती पुलिस की कार्यशैली ने नया इतिहास रचा है। यहाँ अपराधी से ज्यादा खतरा पुलिस को सूचना देने वाले को है। आरोप है कि जैसे ही कोई मुखबिर इन अवैध धंधों की जानकारी देता है, उसकी डिटेल तुरंत अपराधियों तक पहुंचा दी जाती है। प्रशासन और गुंडों के बीच का यह ‘सिंडिकेट’ इतना मजबूत हो गया है कि अब शिकायतकर्ताओं को खुलेआम हत्या की धमकियां मिल रही हैं।

​सवाल यह है: क्या कोतवाल दिनेश चंद्र ने अपराधियों को ‘अभयदान’ दे रखा है? क्या सूचना लीक करना पुलिसिया प्रोटोकॉल का नया हिस्सा है?

 

​जनता की सुरक्षा या अपराधियों का बीमा?

​रौता की गलियां स्मैक और गांजे के धुएं में खो रही हैं, युवा नस्लें बर्बाद हो रही हैं, लेकिन कोतवाल साहब और उनके खास चौकी प्रभारी की ‘शह’ ने अपराधियों के हौसले बुलंद कर रखे हैं। वर्दी का डर अब अपराधियों को नहीं, बल्कि उस शरीफ आदमी को लगता है जो पुलिस के पास मदद की उम्मीद लेकर जाता है।

​कप्तान साहब, कब उतरेगी कोतवाल की यह दबंगई?

​दिनेश चंद्र की कार्यप्रणाली उत्तर प्रदेश सरकार की साख पर बट्टा लगा रही है। जब कोतवाल ही अपराधियों का ‘गॉडफादर’ बन जाए, तो सुरक्षा की उम्मीद बेमानी है। क्या बस्ती के उच्चाधिकारी इस गठजोड़ की जांच कराएंगे या फिर कोतवाल की ‘खास सेवा’ के आगे नतमस्तक होकर जनता को यूं ही मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा?

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