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बस्ती का ‘कमीशन-कांड’: जिला महिला अस्पताल बना प्राइवेट नर्सिंग होम का ‘सप्लाई सेंटर’

सफेदपोश लुटेरे: रात 10 बजे के बाद अस्पताल में सजती है 'मौत के सौदागरों' की मंडी

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। बस्ती: जिला महिला अस्पताल या ‘दलालों’ का अड्डा? गरीबों की मजबूरी पर पलते ‘मौत के सौदागर’।।

🚨खून चूसती व्यवस्था: आशा और एएनएम के ‘मकड़जाल’ में दम तोड़ती बस्ती की स्वास्थ्य सेवाएं।

🚨मरीज या ‘मुनाफा’? गांधी नगर और डारीडीहा के प्राइवेट अस्पतालों के ‘कमीशन एजेंट’ बने सरकारी कर्मी।

🚨रेफरल का खेल: सरकारी अस्पताल की दहलीज से प्राइवेट क्लीनिकों तक ‘फिक्स’ है सौदा।

🚨गरीबों की मजबूरी, दलालों की चांदी; बस्ती स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार का ‘सिंडिकेट’ सक्रिय।

🚨खाकी खामोश, हाकिम बेखबर: अस्पताल परिसर में रात भर चलता है दलाली का खुला खेल।

🚨सावधान! यहाँ इलाज नहीं, ‘सौदा’ होता है: बस्ती महिला अस्पताल के डरावने सच।

🚨आशा बहुएं या ‘आफत’ बहुएं? प्रसूताओं को डराकर निजी अस्पतालों में झोंकने का काला कारोबार।

🚨बस्ती की स्वास्थ्य व्यवस्था ‘वेंटिलेटर’ पर, दलाली के दम पर फल-फूल रहे निजी नर्सिंग होम।

उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। जनपद की स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों वेंटिलेटर पर है, लेकिन यह बीमारी किसी वायरस से नहीं बल्कि विभाग के भीतर फैले ‘भ्रष्टाचार के मकड़जाल’ से उपजी है। जिला महिला चिकित्सालय, जो गरीब गर्भवती महिलाओं के लिए उम्मीद का केंद्र होना चाहिए था, अब निजी अस्पतालों की ‘मंडी’ बन चुका है। यहाँ आशा बहुएं और कुछ एएनएम (ANM) स्वास्थ्य कर्मी की भूमिका कम और प्राइवेट अस्पतालों की ‘कमीशन एजेंट’ की भूमिका अधिक निभा रही हैं।

रात 10 बजते ही सक्रिय होता है ‘सिंडिकेट’

जैसे-जैसे सूरज ढलता है, जिला अस्पताल के गलियारों में ‘मौत के सौदागरों’ की हलचल बढ़ जाती है। सूत्रों की मानें तो रात 10 बजे के बाद अस्पताल परिसर में निजी एम्बुलेंस चालकों और बाहरी दलालों का जमावड़ा लग जाता है। ये दलाल अकेले काम नहीं करते, बल्कि इन्हें अंदर से संरक्षण प्राप्त है। आशा बहुएं, जो ग्रामीण क्षेत्रों की रीढ़ मानी जाती हैं, वे मासूम ग्रामीणों को डराकर—”यहाँ डॉक्टर नहीं है” या “केस बिगड़ जाएगा”—का झांसा देकर चुपके से प्राइवेट नर्सिंग होम में शिफ्ट करा देती हैं।

कमीशन का खेल, गरीबों का खून

एक-एक मरीज को प्राइवेट अस्पताल पहुंचाने के बदले इन आशा बहुओं और बिचौलियों को मोटा कमीशन मिलता है। सरकारी सुविधाओं के नाम पर ठगा गया गरीब किसान अपनी जमीन-जेवर गिरवी रखकर उन प्राइवेट अस्पतालों का बिल भरता है, जहाँ उसे यही आशा बहुएं ‘बेहतर इलाज’ के नाम पर ले जाती हैं। यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि सीधे-सीधे गरीबों का आर्थिक शोषण और उनके जीवन के साथ खिलवाड़ है।

“सवाल यह है कि आखिर ये ‘सफेदपोश’ दलाल किसके संरक्षण में फल-फूल रहे हैं? क्या अस्पताल प्रशासन को इस संगठित लूट की भनक नहीं है, या फिर इस बहती गंगा में ऊपर से नीचे तक सब हाथ धो रहे हैं?”

कार्रवाई की दरकार: कब थमेगा यह खेल?

आए दिन इन आशा बहुओं और एएनएम के कारनामे अखबारों की सुर्खियां बनते हैं, लेकिन जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जाती है। जब तक स्वास्थ्य विभाग इन ‘चिह्नित’ दलालों और कमीशनखोर कर्मियों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं करता, तब तक बस्ती की गरीब जनता यूँ ही लुटती रहेगी। जिला प्रशासन को चाहिए कि:

अस्पताल परिसर में रात के समय सीसीटीवी और औचक निरीक्षण बढ़ाए जाएं।

निजी अस्पतालों के साथ साठगांठ करने वाली आशा बहुओं की सेवा तत्काल समाप्त की जाए।

संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त एएनएम और पैरामेडिकल स्टाफ पर एफआईआर दर्ज हो।

केस बिगड़ने का खौफ: रेफरल का काला खेल

जैसे ही कोई गरीब परिवार प्रसूता को लेकर जिला अस्पताल पहुँचता है, आशा बहुओं का जाल बिछना शुरू हो जाता है। सूत्र बताते हैं कि ये महिलाकर्मी मरीजों के तीमारदारों के कान में जहर घोलती हैं—”साहब, यहाँ डॉक्टर नहीं है” या “बच्चा फंस गया है, यहाँ ले जाओगे तो जच्चा-बच्चा दोनों की जान को खतरा है।” खौफ का यह कारोबार रात 10 बजे के बाद अपनी चरम सीमा पर होता है। जब सरकारी डॉक्टर उपलब्ध नहीं होते, तब ये ‘मौत के सौदागर’ सक्रिय होकर एम्बुलेंस के जरिए मरीजों को उन निजी नर्सिंग होम में शिफ्ट करा देते हैं, जहाँ से इनका मोटा कमीशन पहले से तय होता है।

हालिया घटनाओं ने खोली पोल

अक्सर अखबारों में ऐसी खबरें आती हैं जहाँ आशा बहुएं एम्बुलेंस रुकवाकर मरीज को बीच रास्ते से ही प्राइवेट अस्पताल ले जाती हैं। हाल ही में उजागर हुए कुछ मामलों में देखा गया है कि:

प्राइवेट एम्बुलेंस का दखल: सरकारी अस्पताल के बाहर खड़ी प्राइवेट एम्बुलेंस और अस्पताल के अंदर मौजूद दलालों के बीच सीधा संपर्क होता है।

कमीशन का गणित: सूत्रों की मानें तो एक मरीज को निजी अस्पताल पहुँचाने के बदले इन बिचौलियों को 5,000 से 10,000 रुपये तक का कमीशन मिलता है। यह पैसा सीधे गरीब की जेब से वसूले गए ‘इलाज’ के बिल से निकाला जाता है।

प्रशासन की चुप्पी: शह या लापरवाही?

बड़ा सवाल यह है कि जिला महिला चिकित्सालय के गेट पर और भीतर सीसीटीवी लगे होने के बावजूद इन बाहरी तत्वों और संदिग्ध आशा बहुओं पर लगाम क्यों नहीं लग रही? क्या स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों को इस संगठित लूट की जानकारी नहीं है? या फिर इस काली कमाई का हिस्सा ‘ऊपर’ तक पहुँच रहा है?

“गरीब किसान अपनी फसल बेचकर या कर्ज लेकर अस्पताल आता है, लेकिन यहाँ उसे इलाज के बजाय लूट का शिकार बनाया जाता है। यह भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि मानवता की हत्या है।”

अब ‘सफाई’ की जरूरत है

बस्ती की जनता अब केवल आश्वासन नहीं, ठोस कार्रवाई चाहती है।

उन आशा बहुओं और एएनएम की सूची सार्वजनिक की जाए जिनके खिलाफ बार-बार शिकायतें मिल रही हैं।

रात के समय अस्पताल में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगे।

कमीशनखोरी में शामिल पाए जाने वाले निजी अस्पतालों के लाइसेंस तत्काल निरस्त हों।

बस्ती के सीएमओ (CMO) और जिलाधिकारी को इस ‘मकड़जाल’ को तोड़ना ही होगा, वरना जिला अस्पताल सिर्फ रेफरल और कमीशन का पर्याय बनकर रह जाएगा।

बस्ती की जनता अब जवाब मांग रही है। इन ‘मौत के सौदागरों’ पर लगाम कब लगेगी? क्या शासन-प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?

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