
अजीत मिश्रा (खोजी)
गैस के नाम पर ‘अघोषित वसूली’, कब जागेगा प्रशासन?
उत्तर प्रदेश।
बस्ती में गैस वितरण के नाम पर चल रहा मनमाना खेल अब केवल एक ‘प्रबंधन की विफलता’ नहीं, बल्कि सीधे-सीधे जनता की जेब पर डाका है। हर्रैया की शांति इंडेन गैस एजेंसी से सामने आए मामले यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि जिले में कानून का डर खत्म हो चुका है और एजेंसियाँ मनमर्जी के ‘समांतर तंत्र’ चला रही हैं।
💫कृत्रिम संकट: एक सोची-समझी साजिश
जब गोदामों में गैस की उपलब्धता पर्याप्त है, तो बाजार में किल्लत क्यों है? उत्तर स्पष्ट है—किल्लत को ‘उत्पाद’ बनाकर बेचा जा रहा है। जनता को लाइन में खड़ा करना और उन्हें यह एहसास दिलाना कि गैस मिलना एक ‘कृत्रिम कृपा’ है, इसी का फायदा उठाकर अवैध वसूली का धंधा फला-फूला है। एजेंसी द्वारा 236 रुपये की जबरन रसीद काटना और गैस बीमा के नाम पर निजी खातों में पैसा मांगना, न केवल अनैतिक है, बल्कि पूरी तरह से गैर-कानूनी भी है।
💫प्रशासनिक सुस्ती का दंश
सबसे चिंताजनक पहलू जिला प्रशासन की वह ‘मूक सहमति’ है जो मौन रहकर इन एजेंसियों को संरक्षण दे रही है। दावा किया गया था कि ‘कंट्रोल रूम’ जनता की सहायता के लिए है, लेकिन यदि वहां से भी केवल पल्ला झाड़ने वाले जवाब मिल रहे हैं, तो सवाल यह उठता है कि वह कंट्रोल रूम किसके बचाव के लिए बनाया गया है? क्या प्रशासन को यह नहीं दिख रहा कि छोटू पाण्डेय जैसे लोग एजेंसी के नाम पर उपभोक्ताओं का शोषण कर रहे हैं?
💫जिम्मेदारी तय करने का समय
अखबार के माध्यम से हम जिला प्रशासन से कुछ स्पष्ट सवाल पूछना चाहते हैं:
👉क्या 236 रुपये की रसीद सरकारी मानक के अनुरूप है? यदि नहीं, तो अब तक एजेंसी पर एफआईआर क्यों नहीं हुई?
👉गैस एजेंसी का काम केवल वितरण करना है या निजी बीमा एजेंट बनकर वसूली करना?
👉निजी बैंक खातों में लिए जा रहे धन की जांच के लिए प्रशासन कब कदम उठाएगा?
😇ऑनलाइन वसूली और मिलीभगत
सूत्रों की मानें तो, गैस चूल्हा और सिलेंडर की जांच के नाम पर जमकर अवैध उगाही हो रही है। छोटू पाण्डेय नामक व्यक्ति खुद को एजेंसी का स्टाफ बताकर बेखौफ होकर वसूली कर रहा है। हद तो तब हो गई जब ‘गैस बीमा’ के नाम पर रुपये सीधे ममता पाण्डेय के निजी बैंक खाते में ऑनलाइन ट्रांसफर करवाए जा रहे हैं। बिना किसी आधिकारिक आदेश के निजी खातों में ली जा रही यह धनराशि आखिर किस बात का प्रमाण है?
😇प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
किल्लत से निपटने के लिए जिला प्रशासन ने जो ‘कंट्रोल रूम’ स्थापित किया था, वह भी उपभोक्ताओं की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा है। वहां से भी न तो संतोषजनक जवाब मिल रहा है और न ही कोई कार्रवाई होती दिख रही है। बस्ती में गैस एजेंसियों की यह खुली मनमानी साबित करती है कि प्रशासन का अंकुश पूरी तरह खत्म हो चुका है।
जनता परेशान है, सिलेंडर के लिए भटक रही है और अपनी ही गाढ़ी कमाई को एजेंसियों के सामने लुटाने को मजबूर है। सवाल यह है कि जनता के सब्र का बांध टूटने से पहले क्या प्रशासन जागेगा? क्या इस वसूली गैंग और उनके संरक्षकों पर कोई ठोस कानूनी कार्रवाई होगी, या यह खेल यूं ही जारी रहेगा?
बस्ती की जनता अब केवल आश्वासन नहीं चाहती। अगर प्रशासन आज भी ‘कार्रवाई का दिखावा’ करता रहा, तो यह साबित हो जाएगा कि जनता के शोषण में कहीं न कहीं कुछ जिम्मेदार अधिकारियों की भी मौन भागीदारी है।
समय आ गया है कि इस वसूली तंत्र को जड़ से उखाड़ा जाए। जनता की गाढ़ी कमाई, किसी की जेब का साधन नहीं बन सकती।














