
अजीत मिश्रा (खोजी)
सील और नोटिस के पीछे छिपी विभाग की “कुंभकर्णी” नींद
भानपुर की कार्रवाई: क्या यह सुधार है या सिर्फ रस्म अदायगी?
- जवाबदेही का अभाव: सीधे तौर पर उन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की मांग करना, जिनके क्षेत्र में ये अवैध केंद्र चल रहे थे।
- दलाली और भ्रष्टाचार: स्वास्थ्य विभाग के भीतर मौजूद उन नेटवर्क पर सीधा प्रहार करना जो छापेमारी की जानकारी लीक करते हैं।
- जनता का अविश्वास: यह रेखांकित करना कि कैसे आम आदमी अब सरकारी स्वास्थ्य तंत्र पर भरोसा खो चुका है।
हाल ही में भानपुर में स्वास्थ्य विभाग द्वारा एक पैथोलॉजी को सील करने और अस्पताल का लाइसेंस निरस्त करने की खबर सामने आई है। सुनने में यह प्रशासन की मुस्तैदी लगती है, लेकिन गहराई से देखें तो यह स्वास्थ्य विभाग की उस विफलता का प्रमाण है जो सालों से “आंखें मूंदकर” अवैध केंद्रों को फलने-फूलने का मौका देती है।
1. अवैध केंद्र आखिर खुले कैसे?
सवाल यह है कि बिना पंजीकरण के एक पैथोलॉजी सेंटर और बिना डॉक्टर के एक निजी अस्पताल महीनों तक कैसे चलता रहा? क्या विभाग को तब तक भनक नहीं लगती जब तक स्थिति हाथ से बाहर न निकल जाए? किसी भी केंद्र का संचालन रातों-रात शुरू नहीं होता। यह विभाग के स्थानीय जिम्मेदारों की नाक के नीचे होता है, जो अक्सर भ्रष्टाचार या अनदेखी की चादर ओढ़कर सोए रहते हैं।
2. मरीजों की जान से खिलवाड़ का जिम्मेदार कौन?
भानपुर में जो हुआ, वह केवल कागजी कार्रवाई नहीं है। यह उन अनगिनत मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ है जिन्होंने उस अस्पताल में इलाज कराया जहाँ डॉक्टर ही नहीं थे। उन गलत पैथोलॉजी रिपोर्टों का क्या, जिनके आधार पर लोगों ने दवाइयां खाई होंगी? क्या विभाग उन अधिकारियों पर कार्रवाई करेगा जिन्होंने इन सेंटरों को पनपने दिया?
3. छापामारी या खानापूर्ति?
अक्सर देखा जाता है कि विभाग एक दिन “सक्रिय” होता है, दो-चार सेंटरों को सील करता है, और फिर महीनों के लिए शांत हो जाता है। ऐसी कार्रवाई केवल जनता का गुस्सा शांत करने के लिए “हेडलाइन” बनाने का जरिया बनकर रह गई है। जब तक सिस्टम में बैठे भ्रष्ट तंत्र को साफ नहीं किया जाता, तब तक एक सेंटर सील होगा और उसकी जगह दो नए अवैध सेंटर खुल जाएंगे।
4. दलालों का नेटवर्क और विभाग की चुप्पी
खबरों के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग की टीम के पहुँचने से पहले ही कई अवैध सेंटर संचालक शटर गिराकर भाग निकले। यह साफ जाहिर करता है कि विभाग के भीतर ही “विभीषण” मौजूद हैं जो छापेमारी की सूचना लीक कर देते हैं। बिना मिलीभगत के इतना बड़ा गिरोह सक्रिय नहीं रह सकता।
संपादकीय: स्वास्थ्य विभाग की ‘जागृति’ या मात्र एक रस्म अदायगी?
भानपुर (बस्ती) में स्वास्थ्य विभाग द्वारा निजी अस्पतालों और पैथोलॉजी सेंटरों के खिलाफ की गई हालिया कार्रवाई ने एक बार फिर उस कड़वे सच को उजागर कर दिया है, जिसे विभाग अक्सर फाइलों की धूल में दबा देता है। एक पैथोलॉजी सेंटर का सील होना और एक अस्पताल का लाइसेंस निरस्त होना प्रशासन की नजर में ‘सफलता’ हो सकती है, लेकिन एक जागरूक नागरिक के लिए यह उस तंत्र की विफलता का कच्चा-चिट्ठा है, जो जनता की जान के साथ खिलवाड़ कर रहा था।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर इन ‘मौत के सौदागरों’ को इतना हौसला किसने दिया? एक अस्पताल बिना डॉक्टर के चल रहा था, और पैथोलॉजी बिना पंजीकरण के मरीजों की रिपोर्ट तैयार कर रही थी। क्या यह संभव है कि ये केंद्र रातों-रात उग आए हों? निश्चित रूप से नहीं। ये महीनों, शायद सालों से संचालित हो रहे थे, और विभाग की ‘मेहरबानी’ के बिना यह नामुमकिन था।
खबरों के मुताबिक, विभाग की टीम के पहुँचने से पहले ही कई संचालक शटर गिराकर रफूचक्कर हो गए। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि विभाग के भीतर ही ‘गद्दार’ बैठे हैं, जो छापेमारी की सूचना लीक कर सरकारी कार्रवाई का मजाक बना रहे हैं। यदि छापेमारी का उद्देश्य केवल खानापूर्ति करना होता, तो शायद यह एक सफल अभियान माना जाता। लेकिन यदि उद्देश्य व्यवस्था सुधारना है, तो यह कार्रवाई एक मज़ाक से कम नहीं है।
अवैध सेंटरों को सील करना घाव पर पट्टी बांधने जैसा है, जबकि संक्रमण जड़ों में फैला है। जनता यह पूछने का हक रखती है कि उन जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई हुई, जिनकी नाक के नीचे यह अवैध साम्राज्य पनप रहा था? क्या उन्हें केवल ‘स्थानांतरण’ या ‘चेतावनी’ देकर छोड़ दिया जाएगा?
सरकारी अस्पतालों की बदहाली और निजी सेंटरों की लूट-खसोट के बीच पिसता आम आदमी अब सिस्टम से भरोसा खो चुका है। स्वास्थ्य विभाग को यह समझना होगा कि ‘सील’ लगाने से स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर नहीं होतीं। जब तक भ्रष्ट अधिकारियों और अवैध संचालकों के इस गठजोड़ को पूरी तरह नेस्तनाबूद नहीं किया जाता, तब तक ऐसे छापे केवल ‘मीडिया मैनेजमेंट’ बनकर रह जाएंगे।
समय आ गया है कि दिखावटी कार्रवाइयों से ऊपर उठकर स्वास्थ्य विभाग अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करे। वरना, अगली बार जब कोई मरीज किसी फर्जी डॉक्टर की गलत रिपोर्ट के कारण दम तोड़ेगा, तो उसके गुनाहगारों में स्वास्थ्य विभाग का वह अधिकारी भी शामिल होगा, जिसने अपनी ड्यूटी के बजाय अपनी ‘जेब’ को प्राथमिकता दी।
निष्कर्ष:
स्वास्थ्य विभाग को केवल सेंटरों को सील करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपनी कार्यप्रणाली का भी ‘पोस्टमार्टम’ करना चाहिए। जनता को “अवैध” अस्पतालों के भरोसे छोड़ देना विभाग की सबसे बड़ी आपराधिक लापरवाही है। केवल कार्रवाई का ढोंग नहीं, बल्कि एक पारदर्शी और सख्त व्यवस्था की जरूरत है ताकि किसी गरीब को दोबारा “बिना डॉक्टर वाले अस्पताल” की चौखट पर न जाना पड़े।



















