
अजीत मिश्रा (खोजी)
जाम के सहारे ‘जश्न’ मनाता राजस्व: विकास की राह या मदहोशी का सफर?
रविवार 18 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।
उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था अब पेट्रोल के धुएं से नहीं, बल्कि शराब की बोतलों से रफ्तार पकड़ रही है। हालिया आंकड़ों ने जो तस्वीर पेश की है, वह जितनी चौंकाने वाली है, उतनी ही चिंताजनक भी। जब एक साल के भीतर शराब से मिलने वाले वैट (VAT) में 62.32 प्रतिशत की भारी उछाल आती है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि हम ‘सभ्य प्रदेश’ की ओर बढ़ रहे हैं या ‘नशे की राजधानी’ की ओर?
⭐पेट्रोल-डीजल पस्त, सुरा का ‘मस्त’ प्रदर्शन
आंकड़ों का खेल देखिए—जहाँ आधुनिक दुनिया ईंधन (पेट्रोल-डीजल) को प्रगति का पहिया मानती है, वहीं उत्तर प्रदेश में यह पहिया शराब के आगे डगमगा रहा है। जहाँ पेट्रोल से राजस्व वृद्धि महज 8.98% रही और डीजल की रफ्तार 0.98% पर आकर हांफने लगी, वहीं शराब ने 62.32% की ‘सुपरसोनिक’ छलांग लगाई है।
क्या यह विडंबना नहीं है कि आम आदमी की जेब परिवहन और ईंधन की कीमतों से कटी, लेकिन उसकी सबसे ज्यादा ‘उदारता’ ठेकों की खिड़की पर दिखाई दी? 14.70 करोड़ से बढ़कर सीधे 23.86 करोड़ का सफर यह बताने के लिए काफी है कि प्रदेश में ‘डिमांड’ किस चीज की सबसे ज्यादा है।
⭐राजस्व का ‘नशा’ और विकास का चश्मा
सरकारें अक्सर आबकारी विभाग को राजस्व का ‘मजबूत चालक’ मानकर पीठ थपथपाती हैं। लेकिन क्या इस ‘मजबूत चालक’ के पीछे टूटे हुए घर, स्वास्थ्य की गिरती स्थिति और युवाओं में बढ़ती नशे की लत का हिसाब किया गया है?
जब आबकारी विभाग कुल कर राजस्व में 50.79% की हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा खिलाड़ी बन जाता है, तो यह समझना मुश्किल नहीं रहता कि बजट की नीतियां किस ‘नशे’ में बनाई जा रही हैं। यह कैसा विकास मॉडल है जहाँ राज्य की तिजोरी भरने के लिए नागरिक का ‘लिवर’ दांव पर लगा हो?
⭐नैतिकता और आंकड़ों के बीच का संघर्ष
एक तरफ प्रदेश को ‘नशामुक्त’ बनाने के वादे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ शराब की बिक्री से मिलने वाला हर रुपया सरकारी खजाने की शान बढ़ाता है। पेट्रोल-डीजल और प्राकृतिक गैस की धीमी रफ्तार यह इशारा कर रही है कि उद्योग-धंधों और परिवहन की तुलना में ‘जाम छलकाना’ ज्यादा आसान और लोकप्रिय हो गया है।
⭐ चेतावनी की घंटी
राजस्व के आंकड़ों में शराब का ‘नंबर वन’ होना कोई गौरव की बात नहीं, बल्कि एक सामाजिक चेतावनी है। यदि राज्य की उन्नति का सबसे बड़ा आधार शराब बन जाए, तो उस उन्नति की नींव कितनी खोखली होगी, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। सरकार को सोचना होगा कि क्या वह ‘राजस्व के लालच’ में एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रही है जो काम करने के बजाय बोतलों में अपना भविष्य ढूंढ रही है?
वक़्त आ गया है कि हम विकास की परिभाषा केवल ‘कर संग्रह’ (Tax Collection) से नहीं, बल्कि ‘जन कल्याण’ से नापें।
















