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अजीत मिश्रा (खोजी) ।।‌ बस्ती का विशेष ‘विरासत जल’: 20 महीने पुरानी गंदगी के साथ, अब हर नल में इतिहास बहेगा!”

सावधान! नगर पालिका की नई योजना: बिना टैंक साफ किए जनता की इम्युनिटी बढ़ाओ।"

।। स्वच्छ जल का ‘अमृत’: 20 महीने पुरानी गंदगी, और हम कहते हैं ‘डिजिटल इंडिया’।।

💫 “कागजों पर चमचमाते टैंक, हकीकत में बीमारियों का बैंक: प्रशासन की सफाई का अनोखा खेल।”

💫 “पाइप लाइन में लीकेज नहीं, भ्रष्टाचार का रिसाव है: कबूतरों और गंदगी के भरोसे बस्ती का स्वास्थ्य।”

💫 “नगर पालिका का बजट ‘क्लीन’, पर पानी में है भारी ‘सीन’: 50 साल पुरानी पाइपों से मिल रहा है ‘अमृत’।”

रविवार 04 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। अगर आप बस्ती शहर में रहते हैं और नल खोलते ही आपको ऐसा पानी मिले जिसका रंग चाय जैसा और स्वाद किसी पुरानी गुफा जैसा हो, तो घबराइए मत। यह नगर पालिका का विशेष ‘विरासत जल’ है, जिसे पिछले 20 महीनों से बड़े प्यार और जतन के साथ ओवरहेड टैंकों में सहेज कर रखा गया है।

शहर के लोग शायद इस गलतफहमी में थे कि पानी के टैंक साफ किए जाते हैं। लेकिन प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि सफाई तो केवल कागजों पर होती है, और कागज पानी में भीगकर गल जाते हैं, इसलिए टैंकों के अंदर की स्थिति ‘जैसी है, वैसी ही’ बनी हुई है।

प्रशासन का अनूठा ‘टाइम मैनेजमेंट’

नगर पालिका का दावा है कि उन्होंने अप्रैल 2024 में टैंक साफ कराए थे और अब अगला नंबर सीधा 2025 या 2026 में आएगा। जनता सोच रही थी कि सफाई हर महीने या तीन महीने में होती है, पर प्रशासन तो शायद ‘महाकुंभ’ के कैलेंडर पर चल रहा है—एक बार सफाई करा दी, अब सालों तक छुट्टी!

कागजी सफाई का ‘जादू’

इलाके के जागरूक नागरिकों का कहना है कि सफाईकर्मी टैंक के पास आते हैं, शायद उसे बाहर से प्यार से निहारते हैं, रजिस्टर में एक सुंदर सी तारीख डालते हैं और चले जाते हैं। इसे कहते हैं ‘कांटैक्टलेस क्लीनिंग’—बिना पानी छुए, बिना गंदगी हटाए, सिर्फ कलम चलाकर शहर को स्वच्छ कर देना। यह तकनीक शायद अभी केवल बस्ती में ही उपलब्ध है।

नल से ‘नील’ नहीं, ‘मिट्टी’ बरसती है

डॉक्टरों का कहना है कि गंदा पानी पीने से पेट की बीमारियां हो सकती हैं। लेकिन शहर के लोग अब ‘इम्यूनिटी’ के अगले स्तर पर पहुंच चुके हैं। 50 साल पुरानी जंग लगी पाइपलाइनों और नालियों के बगल से गुजरते नलों से जो पानी आता है, उसमें अब केवल पानी नहीं, बल्कि:

ऐतिहासिक पाइपों की जंग का स्वाद है।

कागजी वादों की मिठास है।

और कभी-कभी तो मरे हुए कबूतरों का ‘अर्क’ भी मिल जाता है।

निष्कर्ष: प्यासे रहें या ‘साहसी’ बनें?

अधिकारियों का कहना है कि बजट नहीं है या लैब खराब है। जनता का कहना है कि अगर टैंकों की यही हालत रही, तो अगले चुनाव तक उन टैंकों के अंदर एक नया ‘इकोसिस्टम’ विकसित हो जाएगा जहाँ दुर्लभ प्रजाति के शैवाल और जीव पाए जाएंगे।

तब तक, बस्ती के लोग नल के पानी को ‘गंगाजल’ समझकर सिर पर छिड़कें, क्योंकि पीने के लिए तो शायद यह प्रशासन की नजर में ‘अति-पवित्र’ हो चुका है।

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