
हिंदी रंगमंच और क्षेत्रीय लोकधारा के संगम से जिन कुछ नामों ने पिछले दो दशकों में अपनी अलग पहचान बनाई है, उनमें निर्देशक सागर सिंह का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। सागर सिंह केवल एक अभिनेता या निर्देशक भर नहीं हैं, बल्कि वे उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं, जिसने रंगमंच को सामाजिक सरोकार, लोकसंस्कृति और आधुनिक संवेदनाओं के साथ जोड़कर एक जीवंत माध्यम बनाए रखने का सतत प्रयास किया है। उनका जीवन, संघर्ष और रचनात्मक यात्रा इस बात का प्रमाण है कि यदि कला के प्रति समर्पण हो, तो सीमित संसाधनों में भी व्यापक प्रभाव पैदा किया जा सकता है।
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सांस्कृतिक परिवेश में जन्म और पारिवारिक संस्कार
सागर सिंह का जन्म 29 जुलाई 1988 को उत्तर प्रदेश के कानपुर में हुआ। उनका परिवार स्वयं कला और बौद्धिकता से गहराई से जुड़ा रहा है। पिता रूद्रेश्वर सिंह पेशे से अधिवक्ता हैं, जिनसे सागर को तर्क, अनुशासन और सामाजिक समझ का संस्कार मिला। माता जी फाइन आर्ट की प्रशिक्षिका हैं, जिन्होंने रंग, रेखा और सौंदर्यबोध को बचपन से ही सागर के व्यक्तित्व में गूंथ दिया। तीन भाई-बहनों में यह सांस्कृतिक विरासत और भी स्पष्ट दिखाई देती है—बड़ी बहन शिवानी सिंह ओड़िसी नृत्यांगना हैं, जबकि छोटे भाई तबला के प्रशिक्षु। ऐसे परिवेश में पले-बढ़े सागर सिंह के लिए कला केवल रुचि नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन गई।
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शिक्षा और रंगमंच से पहला परिचय
प्रारंभिक शिक्षा कानपुर में प्राप्त करने के बाद सागर सिंह का परिवार दरभंगा आया। यहीं पब्लिक स्कूल, लालबाग और राज उच्च विद्यालय से उनकी स्कूली शिक्षा संपन्न हुई। दरभंगा ने सागर के जीवन को एक नई दिशा दी। यह वही शहर है, जहां मिथिला की सांस्कृतिक परंपरा, लोकनाट्य और शास्त्रीय कलाओं का गहरा प्रभाव रहा है। स्कूली दिनों से ही सागर का मंच से जुड़ाव शुरू हो गया। नाटकों में भागीदारी, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सक्रियता और मंच पर खड़े होकर संवाद कहने का अनुभव उनके भीतर आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति की क्षमता विकसित करता गया।
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विश्वविद्यालय जीवन और पुरस्कारों की यात्रा
स्नातक शिक्षा के दौरान सागर सिंह ने रंगमंच को गंभीरता से अपनाया। विश्वविद्यालय स्तर पर आयोजित युवा उत्सवों में वे बतौर अभिनेता और निर्देशक लगातार सक्रिय रहे। अभिनय की बारीकियों को समझना, निर्देशन की जिम्मेदारी संभालना और समूह को एक सूत्र में बांधकर मंच पर प्रस्तुति देना—इन सभी क्षेत्रों में उन्होंने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। यही कारण है कि उन्हें विश्वविद्यालय स्तर पर कई पुरस्कार प्राप्त हुए। ये पुरस्कार केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थे, बल्कि इस बात का संकेत थे कि सागर सिंह भविष्य में रंगमंच के क्षेत्र में एक मजबूत पहचान बनाने जा रहे हैं।
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मुख्यधारा रंगमंच में सक्रियता
सन 2005 में सागर सिंह ने मुख्यधारा रंगमंच से औपचारिक रूप से जुड़कर अपने पेशेवर सफर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने देशी, विदेशी और स्वरचित नाटकों में अभिनय और निर्देशन किया। उनके नाट्य-संग्रह में अंधायुग, गगन दमामा बाज्यो, बादशाहत का खात्मा, आषाढ़ का एक दिन, कबिरा खड़ा बाज़ार में, चरणदास चोर, जो घर जारै अपना, विद्यापति, ललका पाग, अर्द्धांगिनी, कोशी, प्यासा, धरा वसुंधरा, कंजूस, रश्मिरथी, स्वप्न, नबका सिलेबस, काठक लोक, ब्रह्मस्थान, कफ़न, बड़े भाई साहब जैसे नाटक शामिल हैं।
इन प्रस्तुतियों में सागर सिंह की विशेषता यह रही कि उन्होंने क्लासिक और समकालीन दोनों प्रकार के विषयों को समान संवेदनशीलता के साथ मंच पर उतारा।
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नुक्कड़ नाटक और सामाजिक सरोकार
सागर सिंह का योगदान केवल प्रेक्षागृह तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने सैकड़ों नुक्कड़ नाटकों का निर्देशन और प्रदर्शन किया, जिनका उद्देश्य सामाजिक जागरूकता फैलाना था। गीत एवं नाटक प्रभाग और विभिन्न संस्थाओं के लिए किए गए ये नुक्कड़ नाटक समाज के हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बने। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक कुरीतियों जैसे विषयों पर आधारित इन प्रस्तुतियों ने रंगमंच को जन-जन से जोड़ने का काम किया।
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रेडियो, टेलीविजन और डिजिटल माध्यम
वर्ष 2007 से 2017 तक सागर सिंह ने आकाशवाणी, दरभंगा के विविध कार्यक्रमों में उद्घोषक और कंपियर के रूप में अपनी आवाज दी। रेडियो के माध्यम से उन्होंने श्रोताओं तक साहित्य, संस्कृति और समसामयिक विषयों को प्रभावी ढंग से पहुंचाया। इसके अतिरिक्त वे मिथिला रेडियो डॉट कॉम में दो वर्षों तक बतौर प्रोग्राम कंट्रोलर कार्यरत रहे।
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टेलीविजन के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। डीडी पटना, डीडी मुजफ्फरपुर, ईटीवी बिहार, सौभाग्य मिथिला जैसे चैनलों के लिए उन्होंने अभिनेता और निर्देशक के रूप में कार्य किया।
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सिनेमा और वेब सीरीज में योगदान
रंगमंच के साथ-साथ सागर सिंह ने सिनेमा में भी अपनी पहचान बनाई। वर्ष 2016 में उनकी हिंदी फिल्म ‘फाइनल मैच’ बड़े पर्दे पर आई, जिसमें उन्होंने अभिनय किया। इसके बाद 2022 में पोखर के दुनू पार और झंझारपुर, तथा 2023 में मैथिली वेब सीरीज ‘नून रोटी’ में अभिनेता और प्रोडक्शन से जुड़े रूप में उनका कार्य सामने आया। इन प्रोजेक्ट्स में उन्होंने क्षेत्रीय भाषा और स्थानीय कहानियों को प्राथमिकता दी, जो उनकी सांस्कृतिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
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रंगमंच के शिक्षक और आयोजक
सागर सिंह केवल कलाकार ही नहीं, बल्कि एक समर्पित शिक्षक भी हैं। 2007 से अब तक वे रंगमंच में सैकड़ों युवाओं को प्रशिक्षित कर चुके हैं, जिनमें से कई आज फिल्म और टेलीविजन में सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं।
वर्ष 2017 से अगस्त 2021 तक उन्होंने किलकारी दरभंगा (शिक्षा विभाग) में नाट्य प्रशिक्षक के रूप में सेवा दी। वर्तमान में वे मधेपुर टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज में सहायक शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं और साथ ही आकाशवाणी दरभंगा के लिए अपनी आवाज दे रहे हैं।
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सम्मान और उपलब्धियां
सागर सिंह को उनके योगदान के लिए कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। 2018 में मिथिला रत्न और 2023 में जननायक युवा रंगकर्मी सम्मान जैसे पुरस्कार उनके कार्य की सामाजिक स्वीकृति का प्रमाण हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने नुक्कड़ महोत्सव 2006, त्रिदिवसीय रंग महोत्सव (त्रिरंगम 2007), रंगपेठिया 2016, अष्टदल 2018, 2019, 2022, झिलमिल झिझिया 2018, 2019, 2021, 2022 जैसे महोत्सवों का सफल आयोजन कर दरभंगा के रंगमंच को नई ऊर्जा प्रदान की।
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द स्पॉटलाईट थिएटर और भविष्य की दिशा
द स्पॉटलाईट थिएटर के माध्यम से सागर सिंह ने दरभंगा के रंगमंच को एक नया आयाम दिया है। यह संस्था न केवल नाट्य प्रस्तुतियों का मंच है, बल्कि युवाओं के लिए प्रशिक्षण और रचनात्मक प्रयोगशाला भी है। सागर सिंह आज भी अनवरत सक्रिय हैं और रंगमंच को जन-संवाद का माध्यम बनाए रखने के लिए सतत प्रयासरत हैं।
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निर्देशक सागर सिंह की यात्रा यह सिद्ध करती है कि रंगमंच केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाला सशक्त माध्यम है। अभिनय, निर्देशन, शिक्षण और आयोजन—हर क्षेत्र में उनका योगदान उन्हें समकालीन रंगमंच का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनाता है। मिथिला और बिहार के सांस्कृतिक परिदृश्य में सागर सिंह का नाम आने वाले वर्षों में और अधिक प्रभावशाली रूप में उभरता रहेगा, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।




















