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।। जांच या सरकारी पिकनिक? फाइलों में चमचमाती सफाई, जमीन पर बदहाली की दुहाई ।।

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। नीति आयोग का ‘बस्ती’ दौरा: जांच या सरकारी पिकनिक? फाइलों में चमचमाती सफाई, जमीन पर बदहाली की दुहाई ।।

बस्ती ।। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में नीति आयोग की टीम का हालिया दौरा व्यवस्था के गाल पर एक तमाचे जैसा साबित हो रहा है। केंद्र सरकार के बड़े अफसर जिले में आए तो थे विकास की हकीकत परखने, लेकिन स्थानीय अधिकारियों की ‘घेराबंदी’ और ‘सेटिंग’ के खेल ने इस पूरे दौरे को महज एक खानापूर्ति बनाकर रख दिया है।

एसी गाड़ियों से नहीं दिखा गांवों का कूड़ा

नीति आयोग के निदेशक जितेश शर्मा और उप सचिव सुभाष कुमार हर्रैया विकास खंड के गांवों में पहुंचे जरूर, लेकिन उनकी गाड़ियां उन्हीं रास्तों पर दौड़ीं जिन्हें स्थानीय प्रशासन ने पहले से ही ‘चकाचक’ कर रखा था। गांवों में सफाई व्यवस्था की हकीकत से टीम पूरी तरह अनजान रही।

ग्रामीणों का आरोप है कि कागजों में जो कचरा ढोने वाली गाड़ियां गांवों में फर्राटा भर रही हैं, वे हकीकत में कहीं नजर नहीं आतीं। कूड़ा प्रबंधन के नाम पर करोड़ों का बजट ठिकाने लगाया जा रहा है, लेकिन धरातल पर गंदगी का अंबार लगा है।

मीडिया से दूरी, ‘सेटिंग’ की मजबूरी?

इस दौरे की सबसे खास बात रही—मीडिया और आम जनता से दूरी। जब केंद्र के अधिकारी आते हैं, तो उम्मीद होती है कि वे जनसुनवाई करेंगे, लेकिन यहां तो नजारा ही कुछ और था। स्थानीय अधिकारियों ने पारदर्शिता की धज्जियां उड़ाते हुए सिर्फ अपने ‘खास’ और ‘सिखाए-पढ़ाए’ लोगों को ही टीम से मिलने दिया।

“साहब को अपनी पोल खुलने का इतना डर था कि उन्होंने किसी भी जागरूक ग्रामीण को टीम के करीब फटकने तक नहीं दिया। यह जांच नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कोशिश थी।” — एक स्थानीय ग्रामीण

बीडीओ साहब: न फोन उठता है, न जनता से सरोकार

हर्रैया विकास खंड के बीडीओ (खंड विकास अधिकारी) पर जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है। लोगों का कहना है कि बीडीओ साहब को आम आदमी से कोई मतलब नहीं है। वे कब आते हैं और कब जाते हैं, इसका किसी को पता नहीं चलता। हद तो तब हो गई जब ग्रामीणों ने बताया कि उनका सरकारी CUG फोन तक नहीं उठता। आखिर जब अधिकारी जनता के प्रति इतने लापरवाह हैं, तो नीति आयोग की टीम को जमीनी हकीकत कौन बताएगा?

सवालों के घेरे में नीति आयोग की साख

क्या दिल्ली से आए अफसरों को यह समझ नहीं आया कि उन्हें सिर्फ वही दिखाया जा रहा है जो स्थानीय प्रशासन दिखाना चाहता है?

क्या सफाई व्यवस्था सिर्फ फाइलों तक सीमित रहेगी?

क्यों जनता को आयोग की टीम से मिलने से रोका गया?

क्या केंद्र सरकार की योजनाओं का पैसा इसी तरह ‘कागजी विकास’ की भेंट चढ़ता रहेगा?

यह दौरा महज एक औपचारिक निरीक्षण बनकर रह गया है, जिसने नीति आयोग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर भी बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। अगर जांच इसी तरह बंद कमरों और चुनिंदा रास्तों तक सीमित रही, तो भ्रष्टाचार की जड़ें कभी खत्म नहीं होंगी।

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