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अपराधों का खुलासा या विभाग का दिखावा? सवालों के घेरे में ‘नई मुहिम’

ढाई साल बाद भी नहीं खुला हत्याकांड, क्या 'इंसेंटिव' से मिलेगी कातिलों को सजा?

अजीत मिश्रा (खोजी)

खाकी की ‘नई मुहिम’ या जांच एजेंसियों की नाकामी का इकरारनामा?

बस्ती: जिले की पुलिस ने लंबित और जटिल मामलों को सुलझाने के लिए एक ‘नई मुहिम’ शुरू की है। इसके तहत इंस्पेक्टर और सब-इंस्पेक्टरों के बीच एक प्रतिस्पर्धा कराई जा रही है। एसपी डॉ. यशवीर सिंह का यह प्रयोग सुनने में भले ही ‘नवाचार’ (innovation) लगे, लेकिन यह सीधे तौर पर हमारी मौजूदा जांच प्रणाली की लचर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

🚨क्या यह पुलिस की साख पर सवाल है?

सवाल यह है कि एक इंस्पेक्टर या सब-इंस्पेक्टर का काम तो पहले से ही अपराधों का खुलासा करना है। फिर इसके लिए अलग से ‘प्रतिस्पर्धा’ और ‘इनाम’ की घोषणा क्यों करनी पड़ रही है? क्या पुलिस विभाग ने यह मान लिया है कि सामान्य परिस्थितियों में काम करने वाले अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं? यदि ‘इनाम’ का लालच देकर ही मामले सुलझेंगे, तो आम नागरिकों को न्याय दिलाने का जज्बा कहाँ गया?

🚨अधर में लटके मामले: न्याय का इंतजार कब खत्म होगा?

अखबार में जिस ‘कपिल जांभवत हत्याकांड’ का जिक्र है, वह पुलिस की ढिलाई का जीता-जागता प्रमाण है। ढाई साल बीत जाने के बाद भी हत्या का राज नहीं खुला। परिजन भटक रहे हैं, पुलिस ने ‘वोल्टेयर’ टेस्ट (संभवतः नार्को या पॉलीग्राफ की ओर संकेत) जैसे उपाय भी कर लिए, फिर भी नतीजा ‘शून्य’ है।

इसी तरह, मासूम की हत्या और दुष्कर्म का मामला भी लंबित है। 50 से अधिक लोगों का टेस्ट कराने के बावजूद अगर पुलिस अपराधियों तक नहीं पहुँच पा रही है, तो यह सिस्टम की भारी विफलता है।

🚨इनाम नहीं, कार्यक्षमता चाहिए

पुलिस प्रशासन का यह कदम यह तो बताता है कि विभाग अपनी इमेज सुधारने के लिए छटपटा रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि जब तक पुलिस की ‘फॉरेंसिक क्षमता’, ‘पड़ताल का तरीका’ और ‘जवाबदेही’ (accountability) में सुधार नहीं होगा, तब तक किसी भी तरह की प्रतिस्पर्धा मात्र खानापूर्ति बनकर रह जाएगी।

पीड़ित परिवार को इनाम नहीं, अपराधी को सजा चाहिए। अगर पुलिस को मामले सुलझाने के लिए ‘इंसेंटिव’ की जरूरत पड़ रही है, तो यह सुधार का नहीं, बल्कि चिंता का विषय है।

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