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“झाड़ू से नाता टूटा, कुर्सी से नाता जुड़ा: हर्रैया ब्लॉक के ‘लाट साहब’ सफाईकर्मी की कहानी!”

​"सिस्टम की 'सफाई' कौन करेगा? 10 साल से ब्लॉक में कुंडली मारकर बैठा सफाईकर्मी बना 'बड़ा बाबू'।"

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। झाड़ू छूटी, ठाठ बढ़े: हर्रैया ब्लॉक में सफाईकर्मी बना ‘स्वयंभू’ साहब ।।

💫”कागजों पर ‘स्वच्छ भारत’, जमीन पर गंदगी का अंबार: रसूखदार सफाईकर्मी के आगे नतमस्तक प्रशासन।”

उत्तर प्रदेश।

बस्ती। सरकारी तंत्र में जुगाड़ की जड़ें कितनी गहरी हो सकती हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण हर्रैया विकास खंड में देखने को मिल रहा है। यहाँ कागजों पर तैनात एक सफाईकर्मी ने अपनी मूल जिम्मेदारी यानी ‘झाड़ू’ को तिलांजलि देकर खुद को ‘बड़ा बाबू’ घोषित कर दिया है। आलम यह है कि पिछले 10 साल से साहब ब्लॉक कार्यालय में अंगद के पैर की तरह जमे हुए हैं, और मजाल है कि कोई उन्हें गांवों की गंदगी साफ करने के लिए भेज सके।

💫व्यवस्था पर तमाचा: ‘सफाई’ कागजों पर, ‘रसूख’ दफ्तर में

दिनेश श्रीवास्तव नामक इस कर्मचारी की कार्यशैली आज चर्चा का विषय बनी हुई है। नियुक्ति तो हुई थी गांवों की गलियों और सार्वजनिक स्थलों को चकाचक करने के लिए, लेकिन साहब का दिल तो ब्लॉक कार्यालय की कुर्सियों में बस गया है। ग्रामीण गंदगी के अंबार के बीच रहने को मजबूर हैं, जबकि ‘स्वयंभू बड़े बाबू’ दफ्तर के कार्यों में दखल देकर अपना प्रभाव जमाने में व्यस्त हैं।

💫क्या है पूरा मामला?

🔥दशक भर का कब्जा: पिछले 10 वर्षों से एक ही जगह तैनाती ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या विभाग में इनके अलावा कोई और काबिल नहीं, या फिर ‘ऊपर’ तक पहुंच का लाभ मिल रहा है?

🔥सरकारी आवास पर ‘कब्जा’: सूत्रों की मानें तो साहब ने ब्लॉक परिसर के सरकारी आवास पर भी अपना अधिकार जमा लिया है, जबकि उनकी तैनाती ग्रामीण क्षेत्रों के लिए थी।

🔥हाजिरी लगाकर नदारद: ग्रामीणों का आरोप है कि ये महाशय सिर्फ उपस्थिति दर्ज कराने ब्लॉक आते हैं और फिर ‘मिस्टर इंडिया’ बन जाते हैं।

💫अधिकारियों की चुप्पी: सहमति या मजबूरी?

सबसे हैरान करने वाली बात प्रशासनिक अधिकारियों का मौन है। खंड विकास अधिकारी (BDO) का फोन रिसीव न होना और सहायक खंड विकास अधिकारी जयप्रकाश राय की चुप्पी इस संदेह को पुख्ता करती है कि कहीं न कहीं इस ‘सिस्टम की सफाई’ करने वाले को उच्च स्तर से संरक्षण प्राप्त है।

🚨एक बड़ा सवाल: जब गांवों में कूड़े का ढेर लगा है और जनता बीमारियों के डर में जी रही है, तब प्रशासन एक सफाईकर्मी को ‘बाबू’ बनने की छूट कैसे दे सकता है? क्या सरकार का ‘स्वच्छ भारत अभियान’ इसी तरह के रसूखदारों की भेंट चढ़ेगा?

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