
अजीत मिश्रा (खोजी)
सरकारी नौकरी का ‘बहुरूपिया’ खेल: भ्रष्टाचार की सीमा या सिस्टम की लाचारी?
बस्ती: सरकारी नौकरी पाने का सपना हर कोई देखता है, लेकिन बस्ती में एक आंगनबाड़ी कार्यकत्री ने ‘नाम बदलकर’ न केवल नौकरी हथिया ली, बल्कि लंबे समय तक दोहरी जिम्मेदारियों का आनंद भी लिया। यह मामला महज एक फर्जीवाड़े का नहीं, बल्कि हमारी प्रशासनिक सतर्कता पर लगे उस बदनुमा दाग का है, जो यह बताता है कि सरकारी रिकॉर्ड में धोखाधड़ी करना कितना आसान है।
🚨दो नावों की सवारी, और सिस्टम बेखबर
आरोप है कि मालाती देवी ने अपनी बहन उर्मिला के शैक्षिक प्रमाण पत्रों का इस्तेमाल कर आंगनबाड़ी की नौकरी हासिल की। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि साल 2000 से 2005 के बीच, वे एक तरफ ‘ग्राम प्रधान’ के पद पर काबिज थीं, तो दूसरी तरफ ‘आंगनबाड़ी’ का मानदेय भी उठा रही थीं। क्या विभाग सो रहा था? या फिर यह एक सोची-समझी मिलीभगत थी?
🚨नोटिस का खेल और टालमटोल की राजनीति
जब शिकायतकर्ता ने सबूतों के साथ पर्दाफाश किया, तो विभाग ने कागजी खानापूर्ति के लिए 12 अगस्त 2025 को नोटिस जारी किया। जवाब में क्या मिला? खामोशी और इस्तीफे की धमकी! आरोपी का यह रवैया दिखाता है कि कानून का डर न के बराबर है। जब तक मामला खुला नहीं था, तब तक सब ठीक चल रहा था। अब जब खुलासा हुआ है, तो कार्रवाई के नाम पर ‘मंथन’ चल रहा है।
जवाबदेही का अभाव
🚨सवाल यह उठता है कि:
😇एक व्यक्ति एक साथ दो सरकारी पदों पर कैसे बना रहा?
😇नौकरी के लिए नाम बदलने के दौरान क्या दस्तावेजों का वेरिफिकेशन नहीं हुआ था?
😇शिकायत के महीनों बाद भी ‘अंतिम निर्णय’ क्यों नहीं लिया जा सका?
यह मामला इस बात का प्रमाण है कि सरकारी तंत्र में ‘धोखाधड़ी’ के लिए जगह तो है, लेकिन ‘न्याय’ के लिए फाइलों का अंतहीन चक्कर है। इस प्रकरण ने महिला एवं बाल विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं।
खोजी निष्कर्ष: यदि इस मामले में दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं होती, तो यह केवल एक नौकरी का फर्जीवाड़ा नहीं, बल्कि ईमानदार उम्मीदवारों के सपनों की हत्या होगी। जनता देख रही है कि प्रशासन इस ‘बहुरूपिया’ खेल पर पर्दा डालता है या कार्रवाई कर नजीर पेश करता है।













