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बस्ती का ‘महा-पाप’: तस्करों की बारात, बहरूपियों का राज… क्या यही है भाजपा का सुशासन?

हरैया में लोकतंत्र का चीरहरण: 'खादी' ने पहनाया तस्करों को सम्मान का ताज!

अजीत मिश्रा (खोजी)

🚨सत्ता की गोद में ‘सिंडिकेट’ और ‘बहरूपियों’ का नंगा नाच! बस्ती मंडल में ‘सिंडिकेट’ का कब्जा: बहरूपियों को शपथ और तस्करों को संरक्षण… शर्म करो हुक्मरानों!🚨

  • हरैया कांड: नशे की पुड़िया और दोहरी पहचान… खादी हुई शर्मसार!
  • तस्करों का राज्याभिषेक: क्या ‘बाबू साहब’ के इशारे पर हरैया में बिक रहा जहर?
  • पहचान चोरी, धंधा तस्करी: नगर पंचायत या अपराधियों की शरणस्थली?
  • बस्ती का ‘बहरूपिया’ सभासद: प्रशासन की नाक के नीचे लोकतंत्र से बड़ा खिलवाड़!
  • नेताओं की ‘रसोई’ चलाते हैं ये तस्कर? दीपक और रवि पर मेहरबानी का असली सच!
  • पार्टी के वफादारों को ‘ठेंगा’, गद्दारों और तस्करों को ‘कुर्सी’… बस्ती भाजपा में बगावत की आहट!
  • खादी के नीचे ‘गांजा और स्मैक’: हरैया को बर्बाद करने की साजिश बेनकाब!

बस्ती, १२ अप्रैल २०२६ , उत्तर प्रदेश।

हरैया/ बस्ती।। लोकतंत्र के मंदिर में जब ‘चोर-दरवाजे’ से अपराधियों और बहरूपियों का प्रवेश होने लगे, तो समझ लीजिए कि नैतिकता की अर्थी उठ चुकी है। बस्ती जिले की नगर पंचायत हरैया आज इसी पतन का साक्षात गवाह बनी है। भारतीय जनता पार्टी, जो खुद को ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ की पार्टी कहती है, उसके स्थानीय नेताओं ने हरैया नगर पंचायत को एक ऐसी प्रयोगशाला बना दिया है जहाँ केवल गांजा-स्मैक तस्करों और पहचान बदलकर जीने वाले जालसाजों को ही ‘सम्मान’ मिल रहा है।

🔔बिना शपथ लिए बाहर निकले ‘बहरुपिया’ सभासद

मामला किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। मनोनीत सभासद रवि गुप्ता उर्फ शनि कुमार का सच जब सामने आया, तो प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। एक व्यक्ति, दो नाम, दो अलग-अलग उम्र और संभवतः दो आधार कार्ड!

🎯रिकॉर्ड का खेल: वार्ड नंबर २ में नाम ‘रवि कुमार’ (उम्र १९ वर्ष) और वार्ड नंबर ७ में वही चेहरा ‘शनि कुमार’ (उम्र ३१ वर्ष) के नाम से दर्ज है।

🎯प्रशासनिक तमाचा: एसडीएम सत्येंद्र कुमार सिंह को जब इस ‘बहरुपिया’ खेल की भनक लगी, तो उन्होंने रवि गुप्ता को शपथ दिलाने से रोक दिया। यह न केवल उस व्यक्ति की धोखाधड़ी है, बल्कि उन नेताओं के मुंह पर करारा तमाचा है जिन्होंने बिना सत्यापन के एक जालसाज का नाम राजभवन तक भेज दिया।

🔔तस्करों के ‘आका’ बने बैठे हैं सफेदपोश नेता

हरैया में सिर्फ बहरुपिये ही सक्रिय नहीं हैं, बल्कि यहाँ सत्ता के संरक्षण में नशे का कारोबार फल-फूल रहा है। अखबार की रिपोर्टों ने सीधे तौर पर सवाल उठाया है कि आखिर गांजा और स्मैक तस्कर नेताओं के इतने चहेते क्यों बने हुए हैं?

“क्या इन सफेदपोशों का ‘चुनावी खर्चा’ इन्हीं नशे के सौदागरों की काली कमाई से चलता है? आखिर क्यों पुलिस इन तस्करों पर हाथ डालने से कतराती है और ‘बाबू साहब’ जैसे आकाओं के एक फोन पर फाइलें बंद कर दी जाती हैं?”

🏕️अपनों को दरकिनार, गद्दारों को प्यार?

हैरानी की बात यह है कि जिन लोगों ने २०१७ के चुनावों में भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी धर्मेंद्र कुमार के खिलाफ चुनाव लड़ा और उन्हें हरवाया, उन्हीं ‘गद्दारों’ को आज पार्टी के जिला स्तरीय नेता (जिलाध्यक्ष विवेकानंद मिश्र, पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी और वरुण सिंह) सिर पर बैठाकर सभासद मनोनीत करवा रहे हैं। समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और अपराधियों को संरक्षण देने का यह खेल मिशन २०२७ के लिए आत्मघाती साबित होने वाला है।

हरैया में गांजा और स्मैक की पुड़िया अब किराने की दुकान से ज्यादा आसानी से उपलब्ध है। रिपोर्टें चीख-चीख कर कह रही हैं कि ‘बाबू साहब’ जैसे आकाओं का वरदहस्त इन तस्करों पर है।

“जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो युवा पीढ़ी का बर्बाद होना तय है। जो नेता तस्करों के पैसों पर पल रहे हैं, वे समाज को क्या दिशा देंगे? महाकाल टी सेंटर हो या ढाबे, नशे का यह नंगा नाच बिना स्थानीय नेताओं और भ्रष्ट पुलिस की ‘मलाई’ के मुमकिन नहीं है।”

🔔पार्टी के ‘विभीषण’ और वफादारों की पीठ में खंजर

भाजपा के कुछ स्वयंभू ठेकेदारों (विवेकानंद मिश्र, हरीश द्विवेदी और वरुण सिंह) ने पार्टी की साख को गिरवी रख दिया है। २०१७ में जिस प्रत्याशी ने भाजपा को हराया, आज उसे ही ‘पुरस्कार’ में सभासद की कुर्सी दी जा रही है। यह उन कर्मठ कार्यकर्ताओं के मुंह पर थूकने जैसा है जिन्होंने दिन-रात पार्टी के लिए पसीना बहाया।

🔔सत्ता के गलियारों से तीखे सवाल:

⚓कलेक्टर साहब जवाब दें: एक अपराधी के पास दो आधार कार्ड और दो वोटर आईडी कैसे बने? क्या बस्ती का प्रशासन केवल आम जनता को प्रताड़ित करने के लिए है?

⚓पार्टी आलाकमान की चुप्पी: क्या ‘जीरो टॉलरेंस’ का नारा केवल चुनावी रैलियों के लिए है? हरैया में तस्करों को मनोनीत करना क्या भाजपा की नई नीति है?

⚓मीडिया पर हमला: जो पत्रकार सच दिखा रहे हैं, उन पर मुकदमे लिखवाए जा रहे हैं। याद रहे, कलम की स्याही जब लहू बनती है, तो बड़े-बड़े सिंहासन ढह जाते हैं।

🔥दीपक चौहान: खादी की आड़ में ‘काले कारोबार’ का चेहरा?

सभासद मनोनयन की सूची में दीपक चौहान का नाम आना इस बात का सबूत है कि अब राजनीति में योग्यता की नहीं, बल्कि ‘नशे की सप्लाई’ और ‘काले धन’ की अहमियत है।

⚓तस्करी का कलंक: क्षेत्र में चर्चा आम है कि दीपक चौहान का नाता गांजा और स्मैक जैसे जानलेवा जहर के कारोबार से जुड़ा रहा है। ऐसे व्यक्ति को ‘माननीय’ बनाकर शासन ने हरैया की युवा पीढ़ी के भविष्य पर सीधा प्रहार किया है।

⚓नेताओं की ‘रसोई’ का खर्च: क्या दीपक चौहान जैसे लोग इसलिए नेताओं के खास हैं क्योंकि वे नेताओं की ‘विलासिता’ और चुनावी फंड का इंतजाम करते हैं? जिस शख्स पर समाज को नशे की दलदल में धकेलने के आरोप हों, उसे सदन में बैठाना हरैया की जनता का अपमान है।

🚨रवि गुप्ता और दीपक चौहान: ‘ठग्स ऑफ हरैया’ का सिंडिकेट🚨

जहाँ एक तरफ रवि गुप्ता उर्फ शनि कुमार ने ‘बहरूपिया’ बनकर प्रशासनिक तंत्र की धज्जियां उड़ाईं, वहीं दीपक चौहान जैसे नामों ने यह सिद्ध कर दिया कि भाजपा के स्थानीय नेताओं के पास अब ‘चरित्रवान’ कार्यकर्ताओं का अकाल पड़ गया है।

“एक तरफ दो-दो आधार कार्ड वाला जालसाज और दूसरी तरफ नशे के व्यापार का संदिग्ध—यही है हरैया नगर पंचायत के लिए भाजपा का ‘नवरत्न’ चयन? इन नियुक्तियों ने साबित कर दिया है कि स्थानीय आकाओं को केवल ‘जी-हजूर’ करने वाले अपराधी पसंद हैं।”

🔔सत्ता के ‘संरक्षण’ में मरता लोकतंत्र

विवेकानंद मिश्र और पूर्व सांसद जैसे कद्दावर नाम जब दीपक चौहान और रवि गुप्ता जैसे लोगों के लिए पैरवी करते हैं, तो सवाल उठना लाजिमी है। क्या इन नेताओं को नहीं पता था कि ये लोग कौन हैं? या फिर जानबूझकर हरैया को ‘नशे का हब’ बनाने की खुली छूट दी गई है?

✍️बस्ती की जनता के ज्वलंत प्रश्न:

🔥मुख्यमंत्री जी ध्यान दें: क्या यूपी की ‘क्लीन इमेज’ को बस्ती के ये चंद नेता पलीता नहीं लगा रहे? क्या तस्करों के खिलाफ भी बुलडोजर चलेगा या उन्हें ‘सभासद’ बनाकर वीआईपी सुरक्षा दी जाएगी?

🔥पुलिस की भूमिका: दीपक चौहान और उसके साथियों के नेटवर्क पर स्थानीय पुलिस मौन क्यों है? क्या ‘बाबू साहब’ का खौफ वर्दी पर भारी पड़ रहा है?

✍️प्रमुख सवाल जो बस्ती की जनता पूछ रही है:

१. सत्यापन में चूक या जानबूझकर अंधापन? प्रशासन और खुफिया विभाग ने रवि गुप्ता के ‘डबल रोल’ की जांच क्यों नहीं की?

२. अधिकारियों की मिलीभगत: महाकाल टी सेंटर और अन्य ठिकानों पर खुलेआम बिक रहे नशे पर पुलिस मौन क्यों है?

३. नैतिकता कहाँ है? क्या भाजपा का स्थानीय नेतृत्व इतना लाचार हो गया है कि उसे नगर पंचायत के लिए ‘विशेषज्ञों’ की जगह ‘नशे के सौदागर’ और ‘बहरूपिये’ ही मिल रहे हैं?

नगर पंचायत हरैया के इतिहास में यह घटना ‘काले अक्षरों’ में दर्ज होगी। यदि शासन ने इन भ्रष्ट नेताओं और उनके पालतू अपराधियों पर कठोर कार्रवाई नहीं की, तो जनता का लोकतंत्र से भरोसा उठना तय है। बस्ती की धरती अब इन ‘बहरूपियों’ के नकाब उतरने का इंतज़ार कर रही है।

– ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती मंडल

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