
अजीत मिश्रा (खोजी)
।। विकास का ढकोसला और मरते सरकारी तंत्र की बदहाली: जब ‘केरोसिन’ तक के लिए तरसना पड़े ।।
उत्तर प्रदेश।
बस्ती ।। एक तरफ हम ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्मार्ट सिटी’ के बड़े-बड़े दावों की गूँज सुनते हैं, तो दूसरी तरफ हकीकत बस्ती के उन मिट्टी के तेल के डिपो की तरह धूल फांक रही है, जो अब सिर्फ कागजों में या मलबे में तब्दील हो चुके हैं। रसोइ गैस की किल्लत बढ़ी, तो सरकार को अचानक याद आया कि जिले में मिट्टी का तेल भी कभी जरूरत हुआ करता था।
💫मर चुकी व्यवस्था, अब ‘आनन-फानन’ में खोजबीन
हैरत की बात यह है कि विभागीय जांच में पता चलता है कि एक दशक पहले तक जिले में नौ डिपो सक्रिय थे, लेकिन आज हालत यह है कि छह का तो नामोनिशान ही मिट चुका है। जो जमीन कभी सरकारी तंत्र की सेवा में थी, आज वह किसी और के काम आ रही है। क्या यह प्रशासनिक विफलता नहीं है कि एक दशक तक किसी को खबर तक नहीं हुई कि डिपो की मशीनें और टैंक कहाँ गए?
💫तीन डिपो का ‘सहारा’, और वो भी राम भरोसे
अब जिला पूर्ति अधिकारी ने शासन को तीन डिपो का विवरण भेजा है—मानो यही जिले की जीवनरेखा बन गए हों। शासन के आदेश हैं कि डिपो की सफाई कराकर उन्हें दुरुस्त कर लिया जाए। सवाल यह है कि यदि कल गैस का संकट और गहराया, तो क्या इन तीन डिपो के भरोसे पूरा जिला तेल की किल्लत से निपट पाएगा? या फिर यह भी महज एक खानापूर्ति है?
💫क्या यह सिर्फ कागजी कवायद है?
आज जब गैस सिलेंडर आम आदमी की पहुँच से दूर होता जा रहा है, तब सरकार को पुरानी व्यवस्थाओं को ‘जीवित’ करने की याद आई है। लेकिन जिस तंत्र ने छह डिपो को गायब होने दिया, वह इन तीन डिपो को कितनी मुस्तैदी से चला पाएगा, यह बड़ा यक्ष प्रश्न है।
क्या हमारी प्रशासनिक व्यवस्था सिर्फ संकट के समय ‘जागने’ के लिए बनी है? बस्ती जिले में मिट्टी के तेल के डिपो की मौजूदा दुर्दशा इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। रसोइ गैस की किल्लत बढ़ी तो प्रशासन को बरसों बाद यह याद आया कि जिले में केरोसिन वितरण का कोई ढांचा भी हुआ करता था।
💫जवाबदेही का अभाव, घोटालों की गंध
हैरत की बात यह है कि एक दशक के भीतर नौ में से छह डिपो गायब हो गए। वे डिपो कहाँ गए? उनकी मशीनें, टैंक और सरकारी संपत्तियाँ किसकी मिलीभगत से अन्य उपयोग में ले ली गईं? यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति की लूट है। छह डिपो का ‘नामोनिशान मिट जाना’ यह बताता है कि बीते दस सालों में जिला पूर्ति विभाग ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध रखी थी।
💫तीन डिपो का ‘दिखावा’ या भविष्य की विफलता का आगाज़?
अब जब स्थिति हाथ से निकल रही है, तो अधिकारी तीन डिपो को ‘दुरुस्त’ करने की बात कर रहे हैं। क्या मात्र तीन डिपो पूरे जिले की जरूरतें पूरी कर पाएंगे? यह उपाय नहीं, बल्कि एक ‘कागजी लीपापोती’ है ताकि शासन को रिपोर्ट भेजी जा सके कि ‘सब ठीक है’।
🚨प्रशासन से सवाल:
👉जिम्मेदारी तय हो: उन छह डिपो के गायब होने के लिए कौन से अधिकारी जिम्मेदार हैं?
👉भविष्य का क्या: क्या जनता को हमेशा गैस संकट के समय ही मिट्टी के तेल की याद आएगी?
👉सुरक्षा का सवाल: जो डिपो सालों से बंद पड़े थे, उनके टैंक और संयंत्रों को रातों-रात ‘दुरुस्त’ करना क्या सुरक्षा के दृष्टिकोण से सुरक्षित है?
बस्ती की जनता को ‘आनन-फानन’ में लिए गए फैसलों की नहीं, बल्कि एक सुदृढ़ और पारदर्शी व्यवस्था की जरूरत है। अगर जिम्मेदार अधिकारियों ने इस बदहाली का जवाब नहीं दिया, तो ये तीन डिपो भी जल्द ही उसी मलबे में तब्दील हो जाएंगे, जिसमें बाकी छह समा चुके हैं।
अंधेरे में धकेल दिए गए उन छह डिपो की जिम्मेदारी कौन लेगा? और क्या आम जनता को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए हमेशा इसी ‘आपातकालीन’ और ‘आनन-फानन’ वाली व्यवस्था का इंतज़ार करना पड़ेगा?
बस्ती की जनता अब समाधान चाहती है, महज धूल झाड़कर शुरू किए गए सरकारी डिपो का दिखावा नहीं।

















