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बस्ती में ‘सूख गई टोंटियाँ’: कागजों पर बह रहा पानी, धरातल पर धूल और कबाड़।

जल जीवन मिशन या 'नल से छल': करोड़ों डकार गए, प्यासी रह गई जनता!

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। जल जीवन मिशन : करोड़ों डकार गए, पर प्यासी रह गई जनता ।।

🚨विकास का ‘सफेद हाथी’: टंकियां बनीं पशुओं का तबेला, पाइपलाइन बिछने से पहले ही दम तोड़ गई।

🚨भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा ‘हर घर जल’: अधिकारियों की फाइलें लबालब, ग्रामीणों के घड़े खाली।

🚨140 गांवों में ‘पानी’ का दावा, पर हकीकत में बूंद-बूंद को तरस रहे 18 हजार लोग!

उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक ‘जल जीवन मिशन’ आज भ्रष्टाचार, लापरवाही और विभागीय सुस्ती की भेंट चढ़ चुकी है। कागजों पर तो ‘हर घर नल’ पहुँच गया, लेकिन हकीकत यह है कि आज भी ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। बस्ती जिले की यह रिपोर्ट केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और सरकारी धन की खुली लूट का प्रमाण है।

💫कागजों पर हरियाली, धरातल पर सूखा

आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2022 में जिले के 2567 गांवों को शुद्ध पेयजल देने के लिए 855 परियोजनाओं को मंजूरी मिली थी। विभाग का दावा है कि 140 गांवों में जल पहुँचने का ‘प्रमाणीकरण’ हो चुका है। लेकिन धरातल पर सच्चाई इसके उलट है। जिन नलों से पानी बहना चाहिए था, वहां से या तो टोंटियाँ गायब हो गई हैं या पाइपलाइन बिछने से पहले ही दम तोड़ चुकी है। अधिकारियों की फाइलें भरी हैं, मगर ग्रामीणों के घड़े खाली हैं।

💫भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी योजना: कहाँ गया बजट?

रिपोर्ट के अनुसार, 661 परियोजनाओं का कार्य शुरू हुआ, लेकिन बजट की कमी और विभागीय खींचतान के कारण 194 ही ‘चालू’ हालत में बताई जा रही हैं। सवाल यह उठता है कि जब करोड़ों का बजट स्वीकृत हुआ, तो वह गया कहाँ?

⭐अधूरे प्रोजेक्ट: महदेवा, धिसखोर, बीठल, और खड़ौहा जैसे गांवों में 18 हजार की आबादी आज भी शुद्ध पेयजल से वंचित है।

⭐कबाड़ बनती संपत्तियां: करोड़ों की लागत से बने ओवरहेड टैंक (पानी की टंकियां) आज शोभा की वस्तु बन गई हैं। कई जगहों पर तो इन परिसरों का उपयोग पशुओं के चारे और अवैध कब्जों के लिए हो रहा है।

💫प्रशासन का ‘मजाक’ और ग्रामीणों का दर्द

ग्रामीणों का दर्द साफ झलकता है। कहीं पाइपलाइन बिछाकर रास्ते बंद कर दिए गए हैं, तो कहीं ट्रायल के दौरान ही पाइप फट गए। विडंबना देखिए कि विभाग ‘बजट के अभाव’ का रोना रो रहा है, जबकि जो काम हुए हैं वे इतनी घटिया गुणवत्ता के हैं कि उद्घाटन से पहले ही ध्वस्त हो गए।

बनकटी के खड़ौहा निवासी रमेश चंद्र उपाध्याय और बनकटी के वीरेंद्र पांडेय का कहना कि “सरकारी धन की बर्बादी हो रही है और हमें दूषित पानी पीना पड़ रहा है”—यह पूरे सिस्टम के गाल पर एक तमाचा है।

⭐जल जीवन मिशन का उद्देश्य ‘नल से जल’ था, लेकिन बस्ती में यह ‘नल से छल’ बनकर रह गया है।

⭐जवाबदेही का अभाव: क्या उन ठेकेदारों और अधिकारियों पर कार्रवाई होगी जिन्होंने घटिया पाइप डाले?

⭐निरीक्षण में चूक: जब टंकियां कबाड़ बन रही थीं, तब जिले के आला अधिकारी क्या कर रहे थे?

⭐धन का अपव्यय: जनता के टैक्स का पैसा विकास के नाम पर भ्रष्टाचार की नालियों में बहाया जा रहा है।

जल जीवन मिशन का प्राथमिक उद्देश्य हर घर नल से जल पहुंचाना था।

मिशन के तहत 2567 राजस्व गांवों में स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति के लिए 855 परियोजनाओं की मंजूरी दी गई थी, जिनमें से 194 ही पूरी हुई हैं।

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, 661 परियोजनाएं चालू की गई हैं, और 140 गांवों में जल पहुँचने की प्रमाणिकता विभाग ने दे दी है।

इसके बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में कई ऐसे स्थान हैं जहां नल से जल नहीं आ रहा है, या पानी पीने योग्य नहीं है।

विभाग ने बताया कि 18,000 आबादी वाले बन्कटी ब्लॉक में महदेवा, धिसखाैर, बीठल, खाड़ीहा और बोकनार में पाइपलाइन खराब हो चुकी है। इन गांवों में पानी की आपूर्ति अभी तक नहीं हो पाई है।

ग्रामीणों ने बताया कि पंचायत परिसर में स्थापित पानी की टँकी अब पशुओं के लिए चारागाह बन गई है।

📢अधिकारी का बयान:

जल निगम के अधिशासी अभियंता, योगेंद्र प्रसाद ने बताया कि जल जीवन मिशन की परियोजनाएं बजेट की कमी के कारण लंबित हैं।

जल जीवन मिशन सरकार का एक महत्वाकांक्षी प्रयास है, लेकिन इसकी सफलता को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे हैं। सरकारी फंड का दुरुपयोग और विभागीय कुप्रबंधन इस मिशन को विफल बना सकता है। अगर सरकार जल्द ही इस मुद्दे पर आवश्यक कदम नहीं उठाती, तो हर घर नल से जल पहुंचने का सपना दूर की कौड़ी बना रहेगा।

यदि दो साल बाद भी स्थिति यही रही, तो यह योजना केवल इतिहास के पन्नों में एक ‘सफेद हाथी’ बनकर दर्ज होगी। प्रशासन को फाइलों से बाहर निकलकर प्यासे गांवों की खाक छाननी चाहिए, वरना प्यासी जनता का आक्रोश आने वाले समय में सरकार के लिए महंगा साबित हो सकता है।

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