
बस्ती का भानपुर: गैस सिलेंडर के लिए दर-दर भटकता आम आदमी, या एजेंसी की ‘तानाशाही’?
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती/भानपुर: रसोई का चूल्हा अब भानपुर में ‘सफेद हाथी’ साबित होने लगा है। जिस गैस सिलेंडर को आम आदमी की सुविधा के लिए लाया गया था, आज वही सिलेंडर भानपुर के ग्रामीणों के लिए ‘सोने की चिड़िया’ बन गया है, जो आसानी से हाथ नहीं आता। एजेंसी के चक्कर काटते ग्रामीण, लंबी कतारें और मुंह से एक ही रटा-रटाया जवाब— “गैस नहीं है, कल आना।”
सवाल व्यवस्था पर, या एजेंसी की मनमानी पर?
भानपुर की गैस एजेंसी का यह ‘कल’ कभी नहीं आता। ग्रामीण सुबह घर से निकलते हैं, घंटों धूप में लाइन में खड़े होते हैं, अपनी दिहाड़ी खराब करते हैं, लेकिन शाम को खाली हाथ मायूसी के साथ घर लौटते हैं। क्या यह केवल गैस की किल्लत है? या फिर कालाबाजारी का वह ‘अदृश्य जाल’, जिसके कारण सिलेंडर एजेंसी से सीधे ग्राहकों तक न पहुँचकर कहीं और ‘डायवर्ट’ हो रहे हैं?
ग्रामीणों का दर्द: चूल्हा जले तो कैसे?
गांव की गृहिणियों का कहना है कि अब या तो उन्हें लकड़ी के धुएं में खाना बनाना पड़ेगा, या फिर महंगे दाम पर बाजार से गैस खरीदनी पड़ेगी। एजेंसी की यह लापरवाही सीधे तौर पर गरीबों की जेब पर डाका डालने जैसा है। एजेंसी संचालक का वह ‘रूखा जवाब’ उन हजारों परिवारों के लिए अपमानजनक है जो अपनी ही गैस बुक करने के बाद भी दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
प्रशासन मौन क्यों?
हैरानी की बात यह है कि भानपुर में मची इस अफरा-तफरी से बेखबर स्थानीय प्रशासन आखिर क्या कर रहा है? क्या जिला आपूर्ति विभाग को इस गंभीर समस्या की भनक नहीं है? या फिर किसी ‘ऊपरी दबाव’ के कारण सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंदे बैठे हैं?
हमारी मांग:
तत्काल जांच: गैस एजेंसी के स्टॉक रजिस्टर की निष्पक्ष जांच हो।
पारदर्शिता: एजेंसी को नोटिस जारी कर यह बताया जाए कि सिलेंडर की आपूर्ति कहां हो रही है।
वैकल्पिक व्यवस्था: यदि एजेंसी आपूर्ति नहीं कर पा रही है, तो जनता को अन्य विकल्प उपलब्ध कराए जाएं।
भानपुर के लोग अब और इंतजार नहीं करेंगे। यदि समय रहते स्थिति नहीं सुधरी, तो यह ‘गैस का संकट’ किसी बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।
एजेंसी संचालक कान खोलकर सुन लें—भानपुर की जनता ‘कल-कल’ सुनकर अब थक चुकी है, उसे अब सिलेंडर चाहिए, बहाने नहीं!














