
रामनगरी अयोध्या: सेवा के मंदिर में ’30 लाख का खेल’, या खाकी-कोट की मिलीभगत?
अजीत मिश्रा (खोजी), अयोध्या
मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम की पावन नगरी अयोध्या। यहाँ की हवाओं में नैतिकता और न्याय की गूंज होनी चाहिए थी, लेकिन जिला महिला चिकित्सालय के गलियारों से जो खबरें आ रही हैं, वे किसी ‘अंधेर नगरी’ से कम नहीं हैं। सवाल महज 30 लाख रुपये की ठगी का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जो ‘भरोसे’ को कुचलकर सरकारी रसूख की ढाल के पीछे छिप गई है।
🔥30 लाख का ‘विश्वासघात’
आरोप जिला महिला चिकित्सालय की नर्स विमला देवी पर हैं। मामला छोटा-मोटा नहीं है—30 लाख रुपये की ठगी! पीड़ितों का आरोप है कि नर्स ने मकान बनाने और शादी जैसे पारिवारिक आयोजनों का झांसा देकर लंबे समय तक उनसे रकम ऐंठी। जब भरोसे की बात आई, तो उसने चेक थमाया, लेकिन बैंक की चौखट पर पहुँचते ही वह चेक सिर्फ कागज का एक टुकड़ा बनकर रह गया। यह धोखाधड़ी नहीं, तो और क्या है?
😇जांच या ‘फर्जीवाड़े’ का ताना-बाना?
पीड़ित ने न्याय की उम्मीद में IGRS (जनसुनवाई पोर्टल) का दरवाजा खटखटाया। लेकिन, अयोध्या का प्रशासनिक सिस्टम शायद अपनी ही चाल में उलझ गया है। आरोप है कि बिना निष्पक्ष जांच के, ऊपर से दबाव में ‘फर्जी आख्या’ लगाकर फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। आखिर क्यों? क्या सरकारी कर्मचारी होने का मतलब यह है कि उन पर लगे गंभीर आर्थिक अपराधों की जांच भी नहीं होगी?
रामनगरी में ‘30 लाख की नर्सिंग’: भरोसे की आड़ में ठगी या सिस्टम की चुप्पी?
जिला महिला चिकित्सालय की नर्स विमला देवी पर लाखों की ठगी का आरोप।
शिकायत के बाद भी प्रशासन की चुप्पी।
• रामनगरी में इलाज का मंदिर, लेकिन आरोपों में घिरी 30 लाख की नर्सिंग।
• जिला महिला चिकित्सालय की नर्स विमला देवी पर भरोसे के नाम पर लाखों की ठगी का आरोप।
• शादी और मकान बनाने के नाम पर सालों तक उधार का खेल चलता रहा।
• भरोसे की रसीद बना हस्ताक्षरित चेक, लेकिन बैंक पहुंचते ही निकला बाउंस का सच।
• पीड़ित ने खटखटाया आईजीआरएस का दरवाजा, उम्मीद थी न्याय की।
• आरोप है कि जांच की जगह फर्जी आख्या लगाकर फाइल बंद कर दी गई।
• सवाल यह कि सरकारी कर्मचारी पर आरोप लगे तो जांच से डर किसे लग रहा है?
• क्या अस्पताल का सिस्टम अपने ही स्टाफ की ढाल बन गया है?
• रामनगरी में उठता बड़ा सवाल—क्या सुशासन के दावे कागजों तक सीमित हैं?
• अगर 30 लाख का आरोप भी जांच नहीं जगा पा रहा, तो सिस्टम आखिर किसके लिए जागेगा?
😇सीएमएस का बयान: क्या यह ‘सुशासन’ है?
इस पूरे मामले पर जिला महिला चिकित्सालय की सीएमएस, डॉ. बिभा कुमारी का तर्क चौंकाने वाला है। वे कहती हैं, “गोपनीयता के कारण कुछ नहीं बता सकते… किसी के व्यक्तिगत मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकते।” डॉ. साहिबा से सवाल पूछना जरूरी है:
👉जब मामला एक सरकारी कर्मी द्वारा आम नागरिक को लाखों का चूना लगाने का हो, तो क्या वह ‘व्यक्तिगत मामला’ रह जाता है?
👉क्या ‘अस्पताल और अयोध्या की छवि’ उन लोगों के आंसुओं से बड़ी है, जिन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई खो दी?
👉क्या प्रशासन का काम सिर्फ फाइलें बंद करना है या न्याय सुनिश्चित करना?
😇सिस्टम की चुप्पी, सबसे बड़ा गुनाह
जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो आम आदमी किसके पास जाए? अयोध्या में सुशासन के दावे बुलंद हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अस्पताल का सिस्टम अपने ही भ्रष्ट स्टाफ की सुरक्षा कवच बन चुका है। 30 लाख का गबन अगर ‘व्यक्तिगत’ है, तो फिर सार्वजनिक जवाबदेही किसके प्रति है?
👉बड़ा सवाल: अगर इस मामले में जल्द निष्पक्ष जांच नहीं हुई और दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो क्या हम यह मान लें कि अयोध्या का स्वास्थ्य विभाग अब अपराधों का ‘अघोषित सुरक्षित ठिकाना’ बन चुका है?
प्रशासन को यह समझना होगा कि ‘छवि’ फाइलों को छिपाने से नहीं, बल्कि भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने से बेहतर होती है। अयोध्या की जनता अब जवाब चाहती है।
💫क्या कहता है कानून? सरकारी रसूख की ढाल में ‘फर्जी आख्या’ का खेल
⭐सरकारी कर्मचारी के खिलाफ वित्तीय धोखाधड़ी की शिकायत मिलने पर विभाग हाथ नहीं झाड़ सकता। कानून और सेवा नियमावली के तहत ऐसी स्थिति में निम्नलिखित कदम अनिवार्य होते हैं:
⭐अनुशासनात्मक कार्यवाही (Disciplinary Action): यदि किसी कर्मचारी पर धोखाधड़ी का आरोप है, तो ‘उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली’ के तहत विभाग को अनिवार्य रूप से प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) करानी होती है। इसे ‘व्यक्तिगत मामला’ बताकर दरकिनार नहीं किया जा सकता।
⭐भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act): यदि सरकारी पद का दुरुपयोग कर किसी से अनुचित लाभ (Illegitimate Gain) लिया गया है, तो यह स्पष्ट रूप से भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।
😇उत्तरदायित्व का सिद्धांत:
प्रशासनिक जवाबदेही का सिद्धांत कहता है कि यदि कोई कर्मचारी पद की गरिमा के विरुद्ध आचरण करता है, तो विभागाध्यक्ष (सीएमएस) को मामले की गंभीरता को देखते हुए उसे निलंबित करने या जांच समिति गठित करने का अधिकार है। फाइल बंद कर देना या ‘फर्जी आख्या’ लगाना स्वयं में एक दंडनीय अपराध है।
“सीएमएस साहिबा का यह कहना कि ‘यह व्यक्तिगत मामला है’, न केवल पद की गरिमा के खिलाफ है, बल्कि यह सीधे तौर पर एक आरोपित को संरक्षण देने जैसा है। सरकारी सेवा नियमावली के तहत वित्तीय अपराध किसी भी हाल में ‘व्यक्तिगत’ नहीं होते। यदि 30 लाख की ठगी के आरोपों पर अस्पताल प्रशासन मूकदर्शक बना रहेगा, तो क्या जनता यह न मान ले कि अस्पताल के अंदर भ्रष्टाचार की ‘नर्सिंग’ प्रशासन की देखरेख में ही हो रही है?”













