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।। चौथा स्तंभ या उगाही का खंभा? हिस्ट्रीशीटरों ने बनाया था ब्लैकमेलिंग का नेटवर्क।

कैमरा डराने के लिए नहीं, जेल जाने के लिए था: बाराबंकी पुलिस ने फर्जी पत्रकारों को पहुंचाया सलाखों के पीछे।

अजीत मिश्रा (खोजी)

माइक के पीछे छिपे ‘ब्लैकमेलर’: पत्रकारिता या उगाही का नया चेहरा?

बुधवार 21 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बाराबंकी।। किसी ने सच ही कहा है कि जब कलम और कैमरे का इस्तेमाल सरोकार के लिए नहीं, बल्कि स्वार्थ के लिए होने लगे, तो वह तंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाता है। बाराबंकी के थाना सफदरगंज पुलिस ने हाल ही में जिस ‘यूट्यूबिया गिरोह’ का पर्दाफाश किया है, वह समाज के उस काले सच को उजागर करता है जहाँ चंद अपराधी गले में प्रेस कार्ड और हाथ में माइक लेकर ‘अर्नब’ बनने का स्वांग रच रहे थे।

💫खबर का धंधा या धंधे की खबर?

इन फर्जी पत्रकारों का काम खबरें दिखाना नहीं, बल्कि खबरों को ‘दबाना’ था। विशाल गुप्ता और मनीष उर्फ सम्राट जैसे हिस्ट्रीशीटरों ने जिस तरह से पत्रकारिता को अपनी ढाल बनाया, वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा प्रहार है। इनका नेटवर्क बाराबंकी से लेकर गोंडा, लखनऊ और अयोध्या तक फैला हुआ था। इनका मुख्य हथियार था— ‘बदनामी का डर’। इनका सीधा सा गणित था: खबर चलेगी तो इज्जत जाएगी, और नहीं चलानी है तो जेब ढीली करो।

💫हिस्ट्रीशीटरों की नई पनाहगाह: यूट्यूब

सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि अपराधी अब अपनी पहचान छुपाने के लिए पुलिस के डंडे से बचने के लिए कैमरे का सहारा ले रहे हैं। जिनके नाम थाने के रजिस्टरों में दर्ज होने चाहिए थे, वे माइक लेकर दूसरों से सवाल पूछ रहे थे। सफदरगंज पुलिस की इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि महज़ एक यूट्यूब चैनल बना लेने और ‘प्रेस’ लिखवा लेने से कोई कानून से ऊपर नहीं हो जाता।

💫फर्जी प्रेस कार्ड और डराता कैमरा

आजकल गलियों में ऐसे ‘स्वयंभू’ पत्रकारों की बाढ़ आ गई है जिनके पास न तो कोई नैतिकता है और न ही पत्रकारिता का बुनियादी ज्ञान। ये लोग भ्रष्टाचार को बेनकाब करने नहीं, बल्कि उसमें अपना हिस्सा माँगने निकलते हैं। पुलिस द्वारा कार और मोबाइल जब्त करना तो महज एक प्रक्रिया है, लेकिन असली जब्ती उस विश्वास की हुई है जो आम जनता मीडिया पर करती है।

💫चेतावनी का वक्त

सफदरगंज पुलिस की यह कार्रवाई केवल चार गिरफ्तारियां नहीं हैं, बल्कि उन तमाम फर्जी प्रेस कार्ड धारकों के लिए ‘अल्टीमेटम’ है जो पत्रकारिता की आड़ में वसूली का शोरूम चला रहे हैं। शासन और प्रशासन को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि माइक थामने वाला हर हाथ सच का साथी हो, न कि ब्लैकमेलिंग का प्यादा।

बाराबंकी पुलिस की इस ‘फ्रेमिंग’ ने साबित कर दिया है कि अपराधी चाहे कैमरा लेकर आए या कट्टा, कानून के हाथ उसकी गिरेबान तक पहुँच ही जाते हैं। अब उम्मीद है कि जेल की दीवारों के बीच इन ‘यूट्यूबर्स’ को पत्रकारिता के असली एथिक्स समझ आएंगे।

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