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।। बस्ती का स्वास्थ्य विभाग: सेटिंग का खेल और मरीजों की जान पर बनी रेल।।

।। डिग्री गायब, पंजीकरण लापता... फिर भी धड़ल्ले से चल रहा 'मौत का धंधा'।।

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। सफेदपोश ‘यमराज’: जब रक्षक ही बन जाएं भक्षक ।।

उत्तर प्रदेश

बस्ती। कहने को तो डॉक्टर को धरती पर भगवान का रूप माना जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में यह परिभाषा लहूलुहान हो रही है। यहाँ ‘भगवान’ की कुर्सी पर वे लोग बैठे हैं जिनके पास न तो डॉक्टरी की डिग्री है और न ही इलाज का अनुभव। स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे चल रहा यह गोरखधंधा अब केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं रहा, बल्कि मासूम मरीजों की जिंदगी के साथ सरेआम ‘कत्लेआम’ बन चुका है।

​मिलीभगत का ‘नर्सिंग होम’ कल्चर

​हैरत की बात यह है कि जो स्वास्थ्य कर्मी कल तक अस्पतालों में पर्चियां काटते थे या वार्ड बॉय का काम करते थे, वे आज खुद का नर्सिंग होम खोलकर ‘स्पेशलिस्ट डॉक्टर’ बन बैठे हैं। सफेद कोट और गले में स्टेथोस्कोप लटकाकर ये झोलाछाप केवल पर्चे नहीं लिख रहे, बल्कि मरीजों की मौत का वारंट साइन कर रहे हैं।

मुख्य चौंकाने वाले तथ्य:

  • अवैध संचालन: जिले के पोर्टल पर 325 आवेदन आए, जिनमें से 75 अस्पतालों के पास मानक ही नहीं थे। बावजूद इसके, ये धड़ल्ले से चल रहे हैं।
  • बिना डिग्री के विशेषज्ञ: कोई चर्म रोग विशेषज्ञ बन गया है तो कोई बिना डिग्री के सर्जरी और अल्ट्रासाउंड तक कर रहा है।
  • कागजी कार्रवाई का खेल: विभाग जांच के नाम पर केवल ‘नोटिस’ जारी करता है और स्पष्टीकरण मांगकर फाइल ठंडे बस्ते में डाल देता है।

​मौत के बाद भी नहीं जागता प्रशासन

​अखबार की रिपोर्ट गवाह है कि रोडवेज़ स्थित अस्पताल से लेकर पैकोलिया और मालवीय रोड तक, दर्जनों ऐसी घटनाएं हुईं जहाँ इलाज में लापरवाही के कारण बच्चों और बुजुर्गों ने दम तोड़ दिया। लेकिन अफसोस! किसी भी मामले में कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई। अस्पताल सील होते हैं और कुछ ही हफ्तों बाद ‘सेटिंग-गेटिंग’ के खेल से दोबारा खुल जाते हैं।

​”पंजीकरण के बिना कोई अस्पताल नहीं चल सकता, इसकी जांच कराई जाएगी।”

डॉ. राजीव निगम, सीएमओ (बस्ती)

 

​विभागीय अधिकारियों के ये रटे-रटाए बयान अब जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा काम करते हैं। जब जिले के आला अधिकारी खुद स्वीकार कर रहे हैं कि अनियमिताएं उजागर हो चुकी हैं, तो फिर उन ‘हत्यारे’ झोलाछापों की गिरफ्तारी क्यों नहीं होती?

​कमीशनखोरी की ‘मंडी’

​यह केवल इलाज का मामला नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध है। दलालों और बिचौलियों का एक पूरा जाल बिछा है जो सीधे-साधे ग्रामीणों को इन ‘मौत के अड्डों’ तक खींच लाते हैं। पैथोलॉजी जांच, एक्स-रे और दवाओं के नाम पर मोटा कमीशन वसूला जाता है।

​जनता के सवाल और विभाग की चुप्पी

  1. ​क्या विभाग किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है?
  2. ​75 रिजेक्टेड अस्पताल आखिर किसके संरक्षण में चल रहे हैं?
  3. ​क्या केवल ‘स्पष्टीकरण’ मांगना ही विभाग की जिम्मेदारी है?

निष्कर्ष:

बस्ती का स्वास्थ्य ढांचा वेंटिलेटर पर है। अगर समय रहते इन फर्जी डॉक्टरों और भ्रष्ट अधिकारियों के गठजोड़ को नहीं तोड़ा गया, तो वह दिन दूर नहीं जब अस्पताल ‘इलाज के केंद्र’ नहीं बल्कि ‘कब्रगाह’ बनकर रह जाएंगे। सरकार को चाहिए कि वह केवल कागजी नोटिस नहीं, बल्कि इन फर्जी अस्पतालों पर ‘बुलडोजर’ चलाए और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करे।

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