
बरेली: थाने में हत्या प्रयास की शिकायत लेकर पहुंचे डॉक्टर, पत्रकारों को बाइट देने से कोतवाल का इंकार — कहा “थाने की भी प्राइवेसी होती है”, मीडिया की भूमिका और पुलिस प्रशासनिक अधिकारों के बीच टकराव पर उठा सवाल
बरेली। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में एक वरिष्ठ चिकित्सक और उनकी पत्नी के बीच हुए गंभीर घरेलू विवाद और कथित हत्या प्रयास के मामले ने अचानक मीडिया और पुलिस प्रशासन के बीच अधिकार, प्रोटोकॉल और पारदर्शिता को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। यह मामला तब चर्चा में आ गया जब 61 वर्षीय डॉक्टर अपनी 57 वर्षीय पत्नी पर हत्या की कोशिश का आरोप लगाते हुए सुभाषनगर थाने पहुंचे और घटना की शिकायत दर्ज कराई। डॉक्टर का आरोप है कि घरेलू विवाद इतना बढ़ गया कि पत्नी ने उनकी जान लेने का प्रयास किया, जिस पर वे घबराकर पुलिस के पास पहुंचे। मामला संवेदनशील था और सूचना मिलते ही स्थानीय पत्रकार भी थाने पहुँच गए ताकि पीड़ित डॉक्टर का पक्ष सीधे जनता तक पहुंचा सकें और इस महत्वपूर्ण घटना पर विस्तृत रिपोर्ट कर सकें। हालांकि मीडिया को उस समय बड़ी हैरानी हुई जब सुभाषनगर थाने में तैनात कोतवाल जितेंद्र कुमार ने पत्रकारों को डॉक्टर का बयान रिकॉर्ड करने से रोक दिया। कोतवाल ने पत्रकारों से स्पष्ट शब्दों में कहा—“तुम पत्रकार थाने में बाइट लोगे? थाने की क्या कोई प्राइवेसी नहीं है? जिस अधिकारी की बाइट लेनी हो, ले लो, लेकिन यहां किसी दूसरे की बाइट नहीं होगी।” इस बयान का वीडियो सामने आने के बाद यह मामला अब पुलिस और मीडिया अधिकारों पर बड़े विमर्श में बदल गया है। पत्रकारों का कहना है कि मामला जनहित का है और वरिष्ठ नागरिक होने के नाते डॉक्टर अपनी बात समाज तक पहुँचाना चाहते थे, क्योंकि आरोप हत्या प्रयास जैसा गंभीर था। वहीं कोतवाल का तर्क है कि थाने का माहौल संवेदनशील होता है, केस डायरी, बयान, साक्ष्य और पूछताछ का काम होता है, ऐसे में थाने को ‘मीडिया इंटरव्यू ज़ोन’ नहीं बनाया जा सकता। पुलिस का यह भी कहना है कि पीड़ित या गवाह का बयान पुलिस स्टेशन परिसर में मीडिया के सामने कराया जाना कानूनन उचित नहीं माना जाता, क्योंकि इससे जांच प्रभावित हो सकती है, साथ ही थाने में आने वाली अन्य शिकायतों की गोपनीयता भी टूट सकती है। इस घटना के बाद पुलिस और प्रेस के संबंधों को लेकर फिर से वही पुरानी बहस सामने आ गई है — क्या थानों में मीडिया प्रवेश और बयान रिकॉर्डिंग के लिए स्पष्ट कानून और दिशानिर्देश होने चाहिए? क्या पीड़ित व्यक्ति को मीडिया से बात करने का अधिकार मिलना चाहिए यदि वह स्वयं बोलना चाहता है? क्या पुलिस थाने की गोपनीयता और प्रक्रिया का हवाला देकर बाइट रोके तो यह ‘अवरोध’ माना जाए या यह व्यवस्था और सुरक्षा के लिहाज से आवश्यक है? वरिष्ठ सामाजिक विश्लेषकों का कहना है कि लोकतंत्र में पुलिस और मीडिया दोनों की भूमिकाएं महत्वपूर्ण हैं — पुलिस कानून व्यवस्था और केस जांच सुनिश्चित करती है, जबकि पत्रकार समाज तक पारदर्शिता और सूचना पहुँचाने का काम करते हैं। यदि दोनों के बीच संतुलन न रहे, तो न तो जनादेश मजबूत रहेगा, न ही संस्थाओं में विश्वास। पीड़ित डॉक्टर की शिकायत दर्ज कर ली गई है, पुलिस मामले की जांच कर रही है और मेडिको-लीगल प्रक्रियाएँ भी प्रारम्भ कर दी गई हैं। सूत्रों के अनुसार घरेलू विवाद लंबे समय से चल रहा था, जिसके चलते तनाव चरम पर पहुँच गया। अब अगला कदम यह होगा कि पुलिस महिला पक्ष से भी पूछताछ करेगी और सबूतों के आधार पर उचित धाराओं में कार्रवाई आगे बढ़ाई जाएगी। उधर पत्रकार जगत में यह मुद्दा चर्चा में है कि क्या पुलिस को मीडिया पर इस प्रकार का रोक लगाने का अधिकार है या फिर थानों एवं सार्वजनिक क्षेत्रों में बाइट और कवरेज को लेकर सरकार द्वारा स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी होने चाहिए। कई वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि मीडिया का काम जनता की आवाज और पीड़ित की व्यथा को सामने लाना है, और यदि कोई पीड़ित स्वयं बयान देना चाहता है तो उसे रोकना खुले संवाद की भावना के विपरीत है। वहीं पूर्व पुलिस अधिकारी का कहना है कि थाने में मीडिया इंटरैक्शन तभी होना चाहिए जब पुलिस स्वीकृत स्थान और समय निर्धारित करे, ताकि जांच और सुरक्षा प्रभावित न हो। यह घटना केवल एक घरेलू केस की रिपोर्टिंग नहीं, बल्कि इस बात का भी प्रतीक है कि प्रशासन और मीडिया को किस तरह बेहतर समन्वय बनाते हुए काम करना चाहिए। लोकतंत्र में पुलिस की संवेदनशीलता और मीडिया की स्वतंत्रता दोनों जरूरी हैं — लेकिन यह स्वतंत्रता बिना नियमों के नहीं हो सकती और यह नियम पारदर्शिता को बाधित नहीं करने चाहिए। यह मामला आने वाले समय में थानों में मीडिया कवरेज के SOP और पत्रकारों की एंट्री प्रोटोकॉल बनाने की मांग को तेज कर सकता है। फिलहाल डॉक्टर सुरक्षित हैं, शिकायत दर्ज हो चुकी है, पुलिस जांच में जुटी है और पत्रकार संगठन इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा की मांग कर रहे हैं, ताकि किसी भी पक्ष का अधिकार प्रभावित न हो। मामले की आगे की सुनवाई, जांच रिपोर्ट और पुलिस प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया आने के बाद तस्वीर और साफ हो जाएगी, लेकिन इतना निश्चित है कि यह घटना पुलिस-मीडिया संबंधों, थानों की कार्यप्रणाली और लोकतंत्र में सूचना अधिकार की चर्चा को और गहरा कर चुकी है।
✍️ रिपोर्ट — एलिक सिंह
संपादक — वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़
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