
आगरा। साहित्यिक गोष्ठियों की श्रृंखला ‘किस्सा कहानी-4’ में शनिवार को नागरी प्रचारिणी सभा के पुस्तकालय कक्ष में कहानी और आलोचना का अनोखा संगम देखने को मिला। लखनऊ से पधारे वरिष्ठ हिंदी कथाकार देवेंद्र ने अपनी चर्चित कहानी ‘शहर कोतवाल की कविता’ का पाठ किया। कहानी के शुरुआती अंश- ‘अगले दिन सवेरे जब लोग पूरी तरह से घरों से बाहर निकले भी नहीं थे, कि बगैर अखबारों के ही सारे शहर में खबर फैल गई कि कोतवाल ने आत्महत्या कर ली है…- ने श्रोताओं को एकदम स्तब्ध कर दिया और पूरे हॉल में गहरा सन्नाटा छा गया।
कार्यक्रम का आयोजन सांस्कृतिक संस्था रंगलीला और कहानी की पत्रिका कथादेश ने संयुक्त रूप से किया था, जबकि एसिड हमलों की शिकार महिलाओं के संगठन शीरोज़ ने इसका आयोजन सहयोग दिया। कार्यक्रम की मेजबानी नागरी प्रचारिणी सभा, आगरा ने की।कहानी में सत्ता और व्यवस्था पर तीखी चोट कार्यक्रम में वरिष्ठ कथाकार शक्ति प्रकाश ने कहानी की समीक्षा करते हुए कहा कि यह कहानी दिखाती है कि जब सत्ता निरंकुश हो जाती है तो किस प्रकार वह अपनी ही जनता को पीड़ित करती है। उनके अनुसार यह कहानी महज व्यवस्था पर व्यंग्य नहीं, बल्कि इस बात की पड़ताल है कि कैसे मशीनी बन चुके लोग दूसरों को भी यांत्रिक नजरिए से देखने लगते हैं। कहानी की संरचना और पात्रों पर भी उठे सवाल मुख्य वक्ता वरिष्ठ लेखक और कथाकार राजगोपाल सिंह वर्मा ने कहा कि कहानी में कई स्थानों पर दृश्य कालखंड के अनुरूप नहीं लगते और कुछ प्रसंग अतिरंजित प्रतीत होते हैं। उन्होंने कहा कि कहानी में शहर का स्पष्ट उल्लेख नहीं है और कई पात्र अधूरे से महसूस होते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कहानी अंत में कई महत्वपूर्ण और ज्वलंत सवाल छोड़ जाती है। कविता से कहीं अधिक गहरी अनुभूति कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. रामवीर सिंह ने कहा कि यह महज नौ पंक्तियों की कविता भर नहीं, बल्कि एक ऐसी भावधारा है जो वर्षों बाद भी पाठकों को झकझोरती रहती है। कथा को ‘एक्सट्रीम’ तक ले जाते हैं देवेंद्र कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे ग्वालियर से आए वरिष्ठ कहानीकार महेश कटारे ने कहा कि कथाकार देवेंद्र अक्सर अपनी कहानियों को चरम तक ले जाते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कालजयी लेखक प्रेमचंद भी कई बार अपनी कहानियों में चीजों को चरम सीमा तक ले जाते हैं। उन्होंने प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘ईदगाह’ का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि क्या बारह साल का बच्चा बारह कोस पैदल चल सकता है। कहानी की भाषा और संरचना पर भी चर्चा वरिष्ठ कथाकार डॉ. मधु भारद्वाज ने कहा कि कहानी का ताना-बाना बेहद खूबसूरती से बुना गया है और इसमें परिवेश का सशक्त चित्रण है।
वरिष्ठ कवि रमेश पंडित ने कहा कि यदि कोई कहानी पाठक को समझ में आ जाए तो वह अपने उद्देश्य में सफल होती है, हालांकि इस कहानी में वर्तनी की कई त्रुटियां भी हैं।
प्रो. आरके भारती ने कहा कि साहित्यिक कृति की आलोचना करते समय व्यक्तिगत संबंधों को अलग रखना चाहिए और इस कहानी में कई जगह सुधार की गुंजाइश दिखाई देती है। कथादेश’ के संपादक रहे विशिष्ट अतिथि कार्यक्रम में कथादेश के संपादक और वरिष्ठ साहित्यकार हरि नारायण (नई दिल्ली) विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे।
‘हिंदी कहानी और देवेंद्र का रचना संसार’ विषय पर वरिष्ठ आलोचक प्रियंम अंकित ने विषय प्रवर्तन किया।अतिथियों का हुआ स्वागत कार्यक्रम में वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी अनिल शुक्ल ने अतिथियों का स्वागत किया।
राम भरत उपाध्याय, शीलू और सुरेंद्र यादव ने मंचासीन अतिथियों का अभिनंदन किया। कार्यक्रम के अंत में मनोज सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी रहे मौजूदइस अवसर पर मनीषा शुक्ला, डॉ. महेश धाकड़, रामनाथ शर्मा, डॉ. गिरजा शंकर शर्मा, नीरज जैन, आर्निका माहेश्वरी, ऋचा निगम, वंदना तिवारी, प्रो. हरि निर्मोही, राम कृपाल सिंह, भानु प्रताप सिंह, शलभ भारती, अभिनय प्रसाद, भारत सिंह, कमलदीप सिंह, शरद गुप्ता, अवधेश उपाध्याय, टोनी फास्टर, माही वी. कुमार, जितेंद्र दीक्षित, अनिल अरोरा सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।


