बस्ती की हर्रैया तहसील में भूमिधरी जमीन पर जबरन अवैध कब्जे का प्रयास, विरोध करने पर मारपीट और गाली-गलौज.

अजीत मिश्रा (खोजी)
खाकी और कानून के पहरे के बीच बस्ती में दबंगों का खुला तांडव: हर्रैया तहसील में किसानों की जमीनों पर मंडराता अवैध कब्जे का खतरा!
- ग्राम सिक्टा निवासी वीरेन्द्र कुमार शुक्ला की जमीन (गाटा संख्या 207ख) को हड़पने की कोशिश में जुटे दबंग.
- एसडीएम हर्रैया के सख्त निर्देशों के बावजूद दबंगों के हौसले बुलंद, वाल्टरगंज पुलिस और राजस्व निरीक्षक को सौंपी गई जांच.
बस्ती (हर्रैया): उत्तर प्रदेश के जनपद बस्ती के अंतर्गत हर्रैया तहसील क्षेत्र इन दिनों प्रशासनिक उदासीनता और दबंगों के बेलगाम हौसलों का अखाड़ा बनता जा रहा है। कानून व्यवस्था और सुशासन के बड़े-बड़े दावों के बीच धरातल की सच्चाई कुछ और ही दर्दनाक दास्तान बयां करती है। ताजा मामला हर्रैया तहसील क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम सिक्टा (पोस्ट- गणेशपुर) का है, जहाँ एक पीड़ित किसान अपनी ही वैध जमीन को बचाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है, जबकि खाकी और प्रशासन कागजी निर्देशों के दायरे में सिमटे नजर आ रहे हैं।
सामने आए शिकायती दस्तावेजों के अनुसार, ग्राम सिक्टा निवासी वीरेन्द्र कुमार शुक्ला (पुत्र श्री परमात्मा प्रसाद शुक्ला) की भूमिधरी जमीन—गाटा संख्या 207ख—जो कि उनके पिता के नाम विधिवत खतौनी में दर्ज है, उस पर स्थानीय कुछ दबंग तत्वों की बुरी नजर पड़ चुकी है। आरोप है कि सीताराम यादव पुत्र बनारसी यादव तथा उनके पुत्रों—राममणि यादव, राजमणि यादव और श्याममणि यादव द्वारा इस जमीन पर जबरन अवैध कब्जा करने का कुत्सित और लगातार प्रयास किया जा रहा है। हद तो तब हो जाती है जब प्रार्थी द्वारा अपने वैध अधिकार का विरोध करने पर ये दबंग सरेआम गाली-गलौज, मारपीट और जान से मारने पर उतारू हो जाते हैं।
क्या कागजी आदेशों तक ही सिमट कर रह गई है प्रशासनिक सख्ती?
इस गंभीर और संवेदनशील मामले में पीड़ित किसान ने न्याय की आस में उपजिलाधिकारी (एसडीएम) हर्रैया के समक्ष गुहार लगाई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीएम हर्रैया द्वारा एसएचओ वाल्टरगंज और राजस्व निरीक्षक (RI) को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि “मौके की जांच कर शांति व्यवस्था बनाए रखी जाए और प्रार्थी की भूमि पर किसी भी प्रकार का अवैध कब्जा न होने दिया जाए।”
परंतु सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह उठता है कि इस तरह के स्पष्ट प्रशासनिक आदेशों के बावजूद धरातल पर दबंगों के हौसले पस्त क्यों नहीं होते? क्या स्थानीय पुलिस और प्रशासन के अधिकारी किसी बड़े हादसे या अनहोनी का इंतजार कर रहे हैं? क्या बस्ती जिले में आम नागरिकों, किसानों और भूमिधरों के अधिकारों की रक्षा केवल फाइलों के फीतों और कागजी आदेशों तक ही सीमित रह गई है?
व्यवस्था के माथे पर कलंक और सुलगता जन-आक्रोश
क्षेत्र के आम नागरिकों और किसानों में इस बात को लेकर भारी रोष व्याप्त है कि यदि समय रहते इन भू-माफियाओं और दबंग प्रवृत्ति के लोगों पर कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं की गई, तो यह स्थिति किसी भी दिन बड़े खूनी संघर्ष का रूप ले सकती है। प्रदेश सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों को स्थानीय स्तर पर कुछ लापरवाह और सुस्त अधिकारी किस तरह पलीता लगा रहे, यह इसका जीता-जागता उदाहरण है।
अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन के उच्च अधिकारी इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए दबंगों पर शिकंजा कसेंगे और पीड़ित किसान को न्याय व सुरक्षा दिलाएंगे, या फिर कागजी आदेशों का यह सिलसिला यूं ही किसी गरीब की उम्मीदों का गला घोंटता रहेगा? बस्ती प्रशासन की कार्यशैली पर यह एक सुलगता हुआ और बड़ा सवालिया निशान है।
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