चंद्रधारी सिंह संग्रहालय में सजी मिथिला की सांस्कृतिक संध्या
विद्यापति के गीतों और ‘पंचलाइट’ के मंचन से गुलजार हुआ दरभंगा का संग्रहालय
चंद्रधारी सिंह संग्रहालय में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में संगीत और अभिनय के जरिए उभरे मिथिला के लोकजीवन, साहित्यिक परंपरा और ग्रामीण समाज के विविध रंग
दरभंगा, 10 अक्टूबर। मिथिला की सांस्कृतिक पहचान को संगीत और रंगमंच के माध्यम से प्रस्तुत करने के उद्देश्य से शनिवार को दरभंगा स्थित चंद्रधारी सिंह संग्रहालय में विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। चंद्रधारी सिंह संग्रहालय और थिएटर यूनिट, दरभंगा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में कवि कोकिल विद्यापति के गीतों की संगीतमय प्रस्तुति के साथ प्रसिद्ध कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘पंचलाइट’ का नाट्य मंचन हुआ। दोनों प्रस्तुतियों ने मिथिला की साहित्यिक विरासत और ग्रामीण जीवन से जुड़े सांस्कृतिक पक्षों को एक ही मंच पर सामने रखा।
कार्यक्रम में दरभंगा के जिला पदाधिकारी श्री चन्दन कुमार मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। सहायक संग्रहालयाध्यक्ष श्री रवि कांत कुमार और प्रसिद्ध बाँसुरी वादक श्री वेद की उपस्थिति भी रही। आयोजन में संगीत और नाट्यकला से जुड़े कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं को अभिव्यक्ति दी।
सांस्कृतिक संध्या के पहले चरण में विद्यापति के गीतों को संगीतबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया। रिबेलियन बैंड के कलाकारों ने इस प्रस्तुति में भाग लिया, जबकि संगीत संयोजन एवं व्यवस्था का दायित्व अतुल नरेंद्र ने संभाला। गायन में अनिकेत शेखर और सुधांशु शेखर शामिल रहे। वाद्ययंत्रों पर शुभम गुप्ता ने बास गिटार, रोहित जायसवाल ने विद्युत गिटार, विशाल (ड्रिक्स) ने पियानो, हर्ष चौधरी ने तबला और शिवम शेखर ने ढोल वादन किया। कार्यक्रम का संचालन सागर सिंह ने किया। विद्यापति के गीतों के जरिए मिथिला की समृद्ध संगीत परंपरा और उसकी सांस्कृतिक संवेदना को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।
कार्यक्रम का दूसरा प्रमुख हिस्सा ‘पंचलाइट’ का नाट्य मंचन रहा। रंगकर्मी प्रकाश बंधु के निर्देशन में प्रस्तुत इस नाटक में ग्रामीण समाज के आपसी संबंधों, सामाजिक प्रतिष्ठा, प्रेम और मानवीय संवेदनाओं को केंद्र में रखा गया। फणीश्वर नाथ रेणु की रचनाओं में ग्रामीण जीवन का सहज चित्रण विशेष स्थान रखता है। ‘पंचलाइट’ भी अपने कथानक और पात्रों के माध्यम से गांव की सामूहिक मानसिकता तथा सामाजिक व्यवहार के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती है।
नाटक में जयश्री जयंती ने मुनिया और शुभम सिंह सत्यम ने गोधन की भूमिका निभाई। अन्य कलाकारों में ऋषभ देव सिंह सरपंच, शिवानी श्रीवास्तव मलकाईन, राहुल झा दीवान, कुमार अनुभव फेकन महतो, निष्ठा कुमारी गुलरी काकी, नीलू कुमारी कनेली और श्रवण यादव मंगरू महतो की भूमिका में शामिल रहे। सामूहिक गायन के लिए केशव कुमार, नीरज कुमार, सूरज साफी, मनीष यादव और अभिनव गुप्ता ने कोरस में भाग लिया। कलाकारों ने अपने अभिनय के माध्यम से कहानी के ग्रामीण परिवेश और लोकजीवन से जुड़े प्रसंगों को मंच पर उतारा।
इस आयोजन की खासियत यह रही कि इसमें साहित्य और संगीत को अलग-अलग विधाओं के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय एक व्यापक सांस्कृतिक अनुभव का हिस्सा बनाया गया। विद्यापति के गीत जहां मिथिला की काव्यात्मक और संगीत परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं रेणु की कहानी ग्रामीण समाज के जीवन, व्यवहार और संबंधों की तस्वीर सामने रखती है। इन दोनों प्रस्तुतियों के संयोजन से स्थानीय लोकसंस्कृति के विविध आयामों को समझने का अवसर मिला।
आयोजकों के अनुसार, कार्यक्रम का उद्देश्य मिथिला की सांस्कृतिक विरासत, लोकसंगीत, साहित्य और रंगमंच को साझा मंच उपलब्ध कराना तथा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है। यह आयोजन बिहार सरकार के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के अंतर्गत चंद्रधारी सिंह संग्रहालय, दरभंगा और थिएटर यूनिट, दरभंगा के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से क्षेत्र की पारंपरिक कलाओं और साहित्यिक रचनाओं को सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। दरभंगा में आयोजित इस सांस्कृतिक संध्या ने संगीत और रंगमंच के सहारे मिथिला की परंपरा को समकालीन सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया।
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