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“BDO की सरपरस्ती या सिस्टम की लाचारी? हर्रैया में सफाई कर्मी का दफ्तर की कुर्सी पर अवैध कब्जा।”

"झाड़ू छोड़ 'बड़ा बाबू' बना सफाई कर्मी: हर्रैया ब्लॉक में रसूख के आगे बौना हुआ सिस्टम!"

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। हर्रैया ब्लॉक: झाड़ू छोड़ ‘बड़ा बाबू’ बना सफाई कर्मी, साहबों की सरपरस्ती में नियमों की उड़ी धज्जियां।।

उत्तर प्रदेश।

बस्ती। सरकारी सिस्टम में रसूख और सांठगांठ का खेल देखना हो, तो जनपद के हर्रैया ब्लॉक चले आइए। यहाँ नियमों की किताब बंद कर ताखे पर रख दी गई है और व्यवस्था एक सफाई कर्मी के पैरों तले रौंदी जा रही है। ताज्जुब की बात यह है कि जिस हाथ में गांव की गलियों की गंदगी साफ करने के लिए झाड़ू होनी चाहिए थी, वह हाथ आज ब्लॉक मुख्यालय पर साहब बनकर फाइलों पर हुकूमत चला रहा है।

कुर्सी का मोह और रसूख का रुतबा

खबर खोजी है और तथ्य चौंकाने वाले हैं। सफाई कर्मी दिनेश श्रीवास्तव ने ज्वाइनिंग के बाद से ही हर्रैया ब्लॉक को अपना स्थायी ठिकाना बना लिया है। जनाब की तैनाती गांव की गलियों में झाड़ू लगाने के लिए हुई थी, लेकिन इनका ‘रुतबा’ ऐसा कि इन्होंने दफ्तर की कुर्सी पर कब्जा जमा लिया है। आलम यह है कि सफाई कर्मी अब खुद को किसी ‘बड़े बाबू’ से कम नहीं समझता। इतना ही नहीं, सरकारी आवास पर भी इनका अवैध कब्जा बरकरार है, जबकि नियमानुसार यह व्यवस्था उन कर्मचारियों के लिए है जो ड्यूटी के प्रति ईमानदार हों।

कागजों में चमक, जमीन पर गंदगी का साम्राज्य

ब्लॉक के रजिस्टर पर तो दस्तखत समय से हो जाते हैं, लेकिन उसके बाद जनाब कहाँ गायब रहते हैं, यह बड़ा सवाल है। ग्रामीण इलाकों का हाल बदहाल है; हर्रैया के गांवों में कूड़े के अंबार लगे हैं और नालियां चोक हैं। लेकिन कागजों में सफाई व्यवस्था को ‘चकाचक’ दिखाकर सरकारी धन की बंदरबांट की जा रही है। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि बिना काम किए हर महीने सरकारी खजाने से मोटी तनख्वाह डकारी जा रही है।

साहबों की ‘मौन’ सहमति पर उठते सवाल

सबसे बड़ा सवाल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर है। क्या खंड विकास अधिकारी (BDO) विनय द्विवेदी को इस खेल की भनक नहीं है? चर्चा तो यहाँ तक है कि साहब की सरपरस्ती के बिना एक सफाई कर्मी की मजाल नहीं कि वह ब्लॉक मुख्यालय पर अपनी कुर्सी हिला सके। वहीं, सहायक खंड विकास अधिकारी जयप्रकाश राय की चुप्पी भी संदेह के घेरे में है। आखिर अधिकारियों ने कार्रवाई के बजाय मौन क्यों साध रखा है?

सवाल गहरा है: आखिर कब तक रसूखदार सफाई कर्मियों के बोझ तले सिस्टम दबता रहेगा? क्या प्रशासन इस ‘कुर्सी प्रेम’ पर कोई कार्रवाई करेगा या फिर हर्रैया ब्लॉक में यूं ही नियमों की धज्जियां उड़ती रहेंगी?

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