
अजीत मिश्रा (खोजी)
🔔सिस्टम की ‘कागजी हत्या’: संत कबीर नगर में जिंदा मां-बहन को सेक्रेटरी ने कागजों में मारा!🔔
- जिंदा हैं मां और बहन, पर सरकारी रजिस्टर में ‘मुर्दा’! भ्रष्ट तंत्र की संवेदनहीनता पर उठा तूफान।
- पत्रकार की मां-बहन का ‘कागजी मर्डर’: सेक्रेटरी अफजल पर गिरी गाज, वेतन रोका, अब होगी बर्खास्तगी?
- बस्ती मंडल में सिस्टम शर्मसार: जब अधिकारी ही बन गए ‘यमराज’, जीवित परिवार को कागजों में मिटाया!
- बस्ती मंडल | ब्यूरो रिपोर्ट
संत कबीर नगर जनपद के संथा विकास खंड से एक ऐसी खबर आई है जिसने मानवीय संवेदनाओं और सरकारी कार्यप्रणाली को शर्मसार कर दिया है। यहाँ के बरईपार ग्राम पंचायत में तैनात सेक्रेटरी मोहम्मद अफजल ने अपनी ‘कलम की ताकत’ का ऐसा दुरुपयोग किया कि एक जीवित मां और उनकी बेटी को सरकारी रिकॉर्ड (परिवार रजिस्टर) में ‘मृत’ घोषित कर दिया। कहते हैं कि ‘सरकारी कलम’ में इतनी ताकत होती है कि वह किसी का भाग्य बदल सकती है, लेकिन बस्ती मंडल के संत कबीर नगर जनपद में इसी कलम ने संवेदनहीनता की सारी हदें पार कर दीं। संथा विकास खंड के ग्राम पंचायत बरईपार में तैनात सेक्रेटरी मोहम्मद अफजल ने जो ‘कारनामा’ किया है, उसने प्रशासन की विश्वसनीयता पर कालिख पोत दी है। एक जीवित मां और बहन को सरकारी दस्तावेजों (परिवार रजिस्टर) में ‘मृत’ घोषित कर देना महज एक लिपिकीय त्रुटि नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और हठधर्मिता की पराकाष्ठा है।
🔔भ्रष्टाचार का ‘खूनी’ खेल?
सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी रिकॉर्ड में किसी को मार देना इतना आसान है? पीड़ित पत्रकार राहुल त्रिपाठी जब अपने ही परिवार के हक के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे, तब उन्हें टालमटोल और धमकियां मिल रही थीं। जब उच्च अधिकारियों के हस्तक्षेप पर ‘नकल’ जारी हुई, तो सच सामने आया—सिस्टम ने उनकी जीवित मां और बहन का अस्तित्व ही कागजों से मिटा दिया था।
⭐क्या यह किसी बड़ी साजिश का हिस्सा था? क्या किसी की संपत्ति या अधिकार हड़पने के लिए यह ‘कागजी हत्या’ की गई? यह जांच का विषय है।
🔔डीपीआरओ का डंडा: क्या वेतन रोकना काफी है?
जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO) ने त्वरित संज्ञान लेते हुए सेक्रेटरी का वेतन रोक दिया है और एडीओ पंचायत से जवाब तलब किया है। लेकिन क्या केवल वेतन रोकना ऐसे ‘आदमखोर’ सिस्टम के लिए पर्याप्त सजा है?
⭐जवाबदेही किसकी? अगर एक पत्रकार के साथ ऐसा हो सकता है, तो आम जनता का क्या हाल होगा?
⭐मानसिक प्रताड़ना: एक बेटे और भाई के लिए इससे बड़ा आघात क्या होगा कि उसे अपनी जीवित मां-बहन को ‘जिंदा’ साबित करने के लिए सिस्टम से लड़ना पड़े?
- यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक आतंकवाद है।
- सत्ता के नशे में चूर ‘कलम के सिपाही’
पीड़ित पत्रकार राहुल त्रिपाठी पिछले कई दिनों से परिवार रजिस्टर की नकल के लिए सेक्रेटरी के दफ्तर की खाक छान रहे थे। आरोप है कि सेक्रेटरी ने न केवल उन्हें टालमटोल किया, बल्कि धमकियां भी दीं। जब मामला उच्च अधिकारियों तक पहुँचा और दबाव में नकल जारी की गई, तो जो सच सामने आया उसने सबके होश उड़ा दिए। सेक्रेटरी ने पत्रकार की जीवित मां और बहन को कागजों पर ‘मुर्दा’ दिखा दिया था।
🔔सवाल यह है कि: क्या यह किसी गहरी साजिश का हिस्सा है? क्या किसी की संपत्ति हड़पने या चुनावी लाभ के लिए जीवित लोगों का ‘कागजी कत्ल’ किया जा रहा है?
⭐डीपीआरओ का एक्शन: क्या वेतन रोकना काफी है?
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO) ने सेक्रेटरी मोहम्मद अफजल का वेतन तत्काल प्रभाव से रोक दिया है और एडीओ पंचायत से तीन दिन के भीतर जवाब मांगा है। लेकिन जनता पूछ रही है—क्या केवल वेतन रोकना इंसाफ है? * ऐसे अधिकारी जो जीवित इंसान को मृत घोषित कर दें, उन्हें एक पल भी कुर्सी पर रहने का हक नहीं है।
- क्या प्रशासन उन मानसिक यंत्रणाओं का हिसाब देगा जो उस परिवार ने झेली हैं?
- निलंबन की चेतावनी तो दी गई है, लेकिन क्या ऐसे ‘लापरवाह तंत्र’ पर स्थायी लगाम लगेगी?
बस्ती मंडल के प्रशासनिक गलियारों में बैठे उन तमाम ‘साहबों’ के लिए यह एक कड़ा संदेश है—जनता के अधिकारों के साथ खिलवाड़ बंद करें। अगर एक पत्रकार को अपने परिवार को जीवित साबित करने के लिए मुख्यमंत्री तक गुहार लगानी पड़े, तो आम आदमी की हालत क्या होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
सावधान रहें! भ्रष्टाचार की इस दीमक को अब जड़ से उखाड़ने का वक्त आ गया है। इस मामले में जब तक बर्खास्तगी और कड़ी कानूनी कार्रवाई नहीं होती, तब तक प्रशासन की ‘स्वच्छ छवि’ का दावा खोखला ही रहेगा।





















