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नवरात्रि की आध्यात्मिक अर्थ सहित व्याख्या यथार्थ गीता में

पत्रकार ब्यूरो चीफ प्रैस रिपोर्टर राजीव सिकरवार वन्दे भारत लाइफ टीवी न्यूज चैनल आगरा उत्तर प्रदेश

नवरात्रि की आध्यात्मिक अर्थ सहित व्याख्या यथार्थ गीता से।।

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जब नव इंद्रियां संयमित हो जाती हैं, तो यें दुर्ग अर्थात एक किले की तरह हो जाती हैं। तभी नव दुर्गे अर्थात् इनमें दैवीय संपद प्रवाहित हो जाती है, यही नव देवी हैं।

और जब ईश्वरीय प्रकाश अर्थात ज्ञान की जागृति हो जाती है, तो नव रात्रि अर्थात नवीन रात्रि हो जाती है।

दुर्गा का स्वभाव है कि शत्रुओं का नाश करती है। यह दुर्गा प्रेम का प्रतीक ,श्रद्धा का प्रतीक है। अब प्रेम श्रद्धा कहां होती है, किस दिशा में ले जाती है, क्या प्राप्त कराती हैं, इसका स्वरूप नव दुर्गा के रूप में है। हर मनुष्य मोह रूपी रात्रि में है। जब हृदय में ईश्वर को पाने की इच्छा जागृत होती है वहां से नवरात्रि आरंभ होता है। पार्वती का जन्म हिमाचल के यहां मैना के द्वारा हुआ। हिमाचल कहते हैं हृदय को, मैना अर्थात मैं (अहंकार) ना हो। ऐसी स्थिति में प्रेम की जागृति होती है।

इसलिए दुर्गा, पार्वती का एक नाम शैलपुत्री कहा गया है उसी दिन से श्वेत बैल धर्म का प्रतीक है। साधक धर्म आचरण में लग जाता है, जब प्रेम जागृत होता है। दूसरा नाम है – ब्रह्मचारिणी जिससे ब्रह्म की प्राप्ति होता है। उस कर्म काआचरण होने लगता है। आचरण जब होने लगता है तब तीसरा नाम चंद्रघंटा, भजन से संयुक्त मन ही चंद्रमा है। ऐसे मन मैं ईश्वरी नाद का संचार होने लगता है इसलिए इसे चंद्रघंटा कहते हैं। उस ईश्वरी नाद के अनुशासन में चल के भजन होने लगता है तो मन कुशलतापूर्वक ईश्वर में स्थिति प्राप्त करने लगता है। इसलिए चौथा नाम कूष्मांडा है।

जब कुशलतापूर्वक मन भगवान में लगने लगता है तो स्कंदमाता। स्कंध कहते हैं कार्तिकेय को, सांसारिक कर्म है उसका त्याग होने लगता है इसलिए दुर्गा का एक नाम है स्कंदमाता। जब संसारी कर्मों का त्याग होने लगता है तो ईश्वरी कर्तव्य की जननी कहलाती है, इसलिए इनका छठा नाम है कात्यायनी। कर्तव्य का घर, कर्तव्य की जननी, भक्त का परम कर्तव्य है देवी संपति, उसका आश्रय हो जाती है इसलिए कात्यायनी कहलाती है।

जब दैविक संपत्ति आ जाता है तो कालरात्रि। काल के लिए यह रात्रि के समान है। रात्रि में मनुष्य को दिखता नहीं है उसी तरह अब काल ऐसे साधक को विचलित नहीं कर पाता। कबीर कहते हैं कि काल की अखियां फूटी, सतगुरु अजब पिलाई बूटी।

आठवां नाम है महा गौरी। गो कहते हैं मन सहित इंद्रियों को। इसको जो काटने वाली है, संयत करने वाली है, इंद्रियों का दमन करने वाली होने से इसको महागौरी कहते हैं। जब इंद्रियां भली प्रकार संयमित हो जाती हैं उनका नाम है सिद्धिदात्री। परम शांति, परमात्मा उसका सिद्ध करा देती है इसलिए सिद्धिदात्री कहलाती है। यही नवरात्रि का आध्यात्मिक रहस्य है।

परमपूज्य गुरुदेव के श्रीमुख से प्रवाहित अमृत की धारा भारतीय दर्शन का वास्तविक बोध कराती है। इस आध्यात्मिक ज्ञान के लिए उनके श्रीचरणों में कोटि कोटि नमन।

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आध्यात्मिक विकास और परम शांति के लिए यथार्थ गीता अवश्य पढ़े ……

गीता मानव मात्र का धर्मशास्त्र है।महर्षि वेदव्यास श्रीकृष्णकालीन महर्षि वेदव्यास से पूर्व कोई भी शास्त्र पुस्तक के रूप में उपलब्ध नहीं था । श्रुतज्ञान की इस परम्परा को तोड़ते हुए उन्होंने चार वेद , ब्रह्मसूत्र , महाभारत , भागवत एवं गीताजैसे ग्रन्थों में पूर्वसंचित भौतिक एवं आध्यात्मिक ज्ञानराशि को संकलित कर अन्त में स्वयं ही निर्णय दिया कि

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः ।

या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता । । ( म . भा . ,

भीष्मपर्व अ०४३ / १ )

गीता भली प्रकार मनन करके हृदय में धारण करने योग्य है , जो पद्मनाभ भगवान के श्रीमुख से निःसृत वाणी है ; फिर अन्य शास्त्रों के संग्रह की क्या आवश्यकता ? मानव – सृष्टि के आदि में भगवान् श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निःसृत अविनाशी योग अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता, जिसकी विस्तृत व्याख्या वेद और उपनिषद् हैं, विस्मृति आ जाने पर उसी आदिशास्त्र को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रति पुनः प्रकाशित किया , जिसकी यथावत् व्याख्या ‘ यथार्थ गीता ‘ है ।

“यथार्थ गीता” श्रीमद्भगवद्गीता का एक विशेष भाष्य है, जिसे भारत के महान संत परम पूज्य स्वामी श्री अडगड़ानंद जी महाराज जी ने लिखा है। यह गीता का एक ऐसा संस्करण है, जो इसकी मूल आध्यात्मिकता और तत्वज्ञान को सरल भाषा में प्रस्तुत करता है।*

यह भगवद्गीता का एकमात्र प्रामाणिक संस्करण है. यह पुस्तक सभी भाषाओं में उपलब्ध है।

यथार्थ गीता की खास बातें:

यह पुस्तक पृथ्वी पर रहने वाले हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिए।

इसमें धर्म-सिद्धांत, यज्ञ, कर्म, ज्ञानयोग, निष्काम कर्मयोग, वर्णसंकर, गीतोक्त युद्धस्थल, गीतोक्त युद्ध, सनातन-धर्म (हिन्दू-धर्म) वगैरह की व्याख्या की गई है.

इसमें सामाजिक बिखराव के उन्मूलन और धार्मिक भ्रांतियां दूर करने में मदद मिलती है।

इसमें सदियों से चली आ रही कई धार्मिक गुत्थियों का समाधान है.

परम पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज को उनके इस भाष्य के लिए कई सम्मान मिले हैं।

विश्व धर्म संसद ने उन्हें महाकुम्भ के अवसर पर विश्वगुरु की उपाधि से विभूषित किया था।

हरिद्वार में महाकुम्भ के अवसर पर धर्मसंसद ने उन्हें भारत गौरव से सम्मानित किया था.

हरिद्वार के समस्त शक्रचार्यो महामंद्लेश्वारों, ब्राह्मण महासभा और 44 देशों के धर्मशील विद्वानों की उपस्थिति में उन्हें विश्वगौरव सम्मान से सम्मानित किया गया था।

“यथार्थ गीता” की विशेषताएँ

सारगर्भित व्याख्या – इसमें श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों का यथार्थ और व्यावहारिक अर्थ स्पष्ट किया गया है।

आध्यत्मिकता पर जोर – यह सांसारिक कर्मकांड से ऊपर उठकर आत्मज्ञान और मोक्ष की ओर मार्गदर्शन करती है।

सरल भाषा – इसे साधारण व्यक्ति भी आसानी से समझ सकता है।

गुरु-शिष्य परंपरा – इसमें गीता को किसी विशेष सम्प्रदाय के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि निष्पक्ष और तटस्थ रूप में प्रस्तुत किया गया है।

स्वानुभूत ज्ञान – यह पुस्तक लेखक के गहन ध्यान और साधना का प्रतिफल है, जिसमें उन्होंने आत्मानुभूति के आधार पर गीता का विवेचन किया है।

 

यथार्थ गीता का संदेश

मनुष्य को आत्म-ज्ञान प्राप्त करके अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना चाहिए।

कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का समन्वय करके मोक्ष की ओर बढ़ना चाहिए।

निष्काम कर्म करते हुए जीवन जीना ही गीता का मुख्य संदेश है।

यह पुस्तक उन लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी है, जो गीता को उसके मूल आध्यात्मिक स्वरूप में समझना चाहते हैं और जीवन में आत्मज्ञान की ओर बढ़ना चाहते हैं।

यह पुस्तक, सामाजिक बिखराव को दूर करने और धार्मिक भ्रांतियां दूर करने में मदद करती है।

इसमें धर्म-सिद्धांत, यज्ञ, कर्म, गीतोक्त वर्ण-व्यवस्था, ज्ञानयोग, निष्काम कर्मयोग, गीतोक्त युद्ध, सनातन-धर्म, भगवान कर्ता हैं या अकर्ता? जैसी कई बातों की व्याख्या की गई है।

यह पुस्तक सभी के लिए है, चाहे उनकी जाति, पंथ, नस्ल, धर्म, संप्रदाय कुछ भी हो।

यह पुस्तक सभी समय और स्थान के लिए है। यह पुस्तक, पृथ्वी पर किसी भी मनुष्य के लिए इस जीवन और जन्म के कारण को स्वयं समझने के लिए एक अवश्य पढ़ी जाने वाली पुस्तक है

गीता स्वयं पूर्णशास्त्र है, जिसे स्वयं श्रीकृष्ण ने बताया है, उस विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से बरतता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही प्राप्त होता है।

वैदिक ऋषि (अनादिकाल-नारायण सूक्त)

कण-कण में व्याप्त ब्रह्म ही सत्य है। उसे विदित करने के अतिरिक्त मुक्ति का कोई अन्य उपाय नहीं है।

गीता’ के अनुसार-

धर्म क्या है?

पालन कैसे करें?

सत्य क्या है?

भजन किसका करें?

सत्य क्या है? धर्म क्या है?

कर्म क्या है? पाप क्या है?

पुण्य क्या है? पूज्य कौन है?

मंत्र क्या है? ध्यान क्या है?

*इत्यादि समस्त शंकाओं/ आदि अनेक प्रश्नों के समाधान के लिये ‘गीता’ की स्वभाषा की प्रत्यक्षानुभूत व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ अनुशीलनीय है।

साधना में यदि श्री सदगुरु भगवान जी की आज्ञा का पालन है, ईमानदारी, पूर्ण श्रद्धा, पूर्ण भक्ति, पूर्ण विश्वास व प्रेम का समावेश है तो मुक्त करने की गारंटी श्री सदगुरु भगवान देते हैं । *अपने जीवन में राग – द्वेष, ईर्ष्या , लोभ, मोह, अहंकार, काम क्रोध को स्थान नहीं देना ! इसके स्थान पर प्रेम, सद्भावना, विश्वास, श्रद्धा व भक्ति श्री सदगुरु भगवान जी का ध्यान के साथ सुमिरण का समावेश शिष्य को अपने अंदर करना चाहिए।

अधिक जानकारी के लिए यथार्थ गीता पढ़े

निवेदक: ठाकुर कुंवर राजेश सिंह बिसेन

वाराणसी

सौजन्य से :यथार्थ गीता

यथार्थ गीता अवश्य पढ़ें

और देव दुर्लभ मानव तन को सफल बनाएँ।।

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पत्रकार ब्यूरो चीफ प्रैस रिपोर्टर राजीव सिकरवार वन्दे भारत लाइफ टीवी न्यूज चैनल आगरा उत्तर प्रदेश

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