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बस्ती का कलंक: नेताजी की ‘खादी’ की ओट में चल रहा ‘गंदा धंधा’, मौन है प्रशासन!

होटल या अय्याशी का अड्डा? सीओ की रिपोर्ट में 'पाप' कबूल, फिर भी फाइल दबाए बैठे एडीएम साहब!

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती: ‘खादी’ के साये में फल-फूल रहा ‘देह व्यापार’, कुंभकर्णी नींद सो रहा प्रशासन!

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • प्रशासन की शह पर ‘रेडलाइट एरिया’ बना बस्ती: रसूखदार नेता के आगे नतमस्तक हुए जिले के आला अधिकारी।
  • साहब! शर्म करो: ‘कैरेक्टरलेस’ होटलों को किसका संरक्षण? जनता की सुरक्षा से खिलवाड़ क्यों?
  • एडीएम दफ्तर बना ‘फाइलों का कब्रिस्तान’: नेताजी के होटल पर कार्रवाई रोकने के लिए चली गई बड़ी चाल।
  • बस्ती पुलिस का खुलासा, प्रशासन का पर्दाफाश: सबूत मिलने के बाद भी आखिर क्यों नहीं सील हुआ वो होटल?
  • बस्ती में ‘सब कुछ’ मिलता है: बस ‘नेताजी’ का होटल होना चाहिए और प्रशासन की मेहरबानी!
  • साहब की ‘सुस्ती’ या नेताजी की ‘भक्ति’? जांच रिपोर्ट आई चार महीने बीते, पर कुर्सी से नहीं हिले जिम्मेदार।
  • ईमानदारी का ढोंग और पाप का साथ: बस्ती मंडल के अफसरों की कार्यशैली पर खड़े हुए बड़े सवाल।

बस्ती। सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ भ्रष्टाचार और अपराध पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करते हैं, लेकिन बस्ती जिले के आला अधिकारी उनके इन दावों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। शहर के बीचों-बीच, रोडवेज के पास स्थित एक रसूखदार ‘वीआईपी नेताजी’ के होटल में वो सब कुछ हो रहा है, जो अमूमन किसी रेडलाइट एरिया में होता है। चौंकाने वाली बात यह है कि सीओ सिटी की जांच रिपोर्ट में सब कुछ साफ होने के बाद भी ‘कार्रवाई’ की फाइल एडीएम दफ्तर की धूल फांक रही है।

जांच रिपोर्ट में खुलासा: घंटों के हिसाब से बुक होते हैं कमरे

करीब तीन-चार महीने पहले सीओ सदर ने शहर के संदिग्ध होटलों पर छापेमारी की थी। इस जांच में जो तथ्य सामने आए, वे रोंगटे खड़े करने वाले थे। रिपोर्ट के मुताबिक:

  • होटल के कमरों को घंटों के हिसाब से अनैतिक कार्यों के लिए बुक किया जा रहा था।
  • बिना किसी पहचान पत्र और मिलान के जोड़ो को रूम दिए जा रहे थे।
  • होटल परिसर का उपयोग पूरी तरह से गैर-कानूनी और अनैतिक गतिविधियों के लिए हो रहा था।
  • पुलिस को कई ठोस और डिजिटल सबूत भी मिले थे।

फाइल दबाए बैठे ‘साहब’, आखिर क्या है मजबूरी?

सीओ की रिपोर्ट के बाद डीएम ने सख्त लहजे में कार्रवाई के आदेश दिए थे, लेकिन मामला एडीएम कार्यालय पर आकर अटक गया है। चर्चा आम है कि होटल मालिक एक रसूखदार नेता है, जिसके चलते प्रशासन के हाथ-पांव फूल रहे हैं। जब भी कार्रवाई की बात होती है, तो ‘कारण बताओ नोटिस’ का पुराना खेल शुरू कर दिया जाता है। आखिर प्रशासन को और कितने सबूत चाहिए? क्या किसी बड़ी घटना का इंतजार किया जा रहा है?

जनता की सुरक्षा से खिलवाड़: ‘कैरेक्टरलेस’ होटलों का सच छुपा रहा प्रशासन

आम जनता अपने परिवार के साथ जिन होटलों में ठहरती है, उन्हें पता ही नहीं कि बगल के कमरे में क्या ‘गंदा धंधा’ चल रहा है। प्रशासन बदनाम होटलों की सूची सार्वजनिक क्यों नहीं करता? क्या आम आदमी को यह जानने का हक नहीं है कि कौन सा होटल सुरक्षित है और कौन सा ‘अय्याशी का अड्डा’?

अधिकारियों की ‘बहरापन’ और सरकार की बदनामी

विडंबना देखिए कि जिले में खुद को ईमानदार कहने वाले अफसरों की भरमार है, लेकिन नतीजा सिफर है। कमिश्नर, डीएम और सीडीओ के आदेशों का पालन केवल 15-20 प्रतिशत ही हो पाता है। अधिकारियों की इसी कार्यप्रणाली के कारण जनता का गुस्सा स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सरकार पर फूटता है।

बड़ा सवाल: क्या बस्ती का प्रशासन इन ‘सफेदपोश’ गुनहगारों के सामने घुटने टेक चुका है? या फिर एडीएम दफ्तर में दफन हो चुकी फाइल कभी बाहर निकलेगी और इन ‘पाप के अड्डों’ पर बाबा का बुलडोजर चलेगा?

बस्ती की जनता जवाब मांग रही है!

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