
अजीत मिश्रा (खोजी)
✍️विशेष रिपोर्ट: बस्ती की प्यास पर सिस्टम का ‘रक्तबीज’, करोड़ों स्वाहा, बूंद-बूंद को तरसती जनता🎯🔥
- विकास की अधूरी ‘टंकी’: बस्ती में कागजों पर दौड़ रहा पानी, हकीकत में हैंडपंपों पर कतारें।”
- “नगर पालिका की लापरवाही ने बनाया ‘बस्ती को रेगिस्तान’, करोड़ों के प्रोजेक्ट्स बने सफेद हाथी।”
- “साहब! प्यास वादों से नहीं बुझती: नगर पालिका की सुस्ती और जल निगम की ‘तकनीकी’ धोखाधड़ी उजागर।”
- “इंजीनियरों की सेटिंग या जनता की मुसीबत? पैसा पूरा खर्च, फिर भी आधी-अधूरी प्यास!”
- “बस्ती में ‘डिजिटल जल’: नल में पानी आए न आए, विभागीय वेबसाइट पर प्रोजेक्ट 100% सफल!”
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश। 06 अप्रैल, 2026
बस्ती। सरकारी तंत्र जब संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पार कर ले, तो विकास ‘विनाश’ जैसा दिखने लगता है। बस्ती मंडल में 91.48 करोड़ रुपये की चार बड़ी पेयजल परियोजनाओं का हाल कुछ ऐसा ही है। फाइलों में पाइपलाइन बिछ चुकी है, टंकियाँ बनकर तैयार हैं, लेकिन धरातल पर नगर पालिका की लापरवाही ने इन करोड़ों के प्रोजेक्ट्स को ‘सफेद हाथी’ बना दिया है।
🎯नगर पालिका: भ्रष्टाचार और कामचोरी का ‘अड्डा’
नगर पालिका परिषद बस्ती और संबंधित नगर पंचायतों की भूमिका इस पूरे संकट में सबसे संदिग्ध है। जल निगम पाइपलाइन बिछाकर निकल जाता है, लेकिन उसके बाद की देखरेख, कनेक्शन वितरण और लीकेज की मरम्मत की जिम्मेदारी नगर पालिका की होती है।
🪣लीकेज का नरक: शहर के कई वार्डों में नई पाइपलाइन बिछाते समय पुरानी पाइपलाइनों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। परिणामस्वरुप, कीमती साफ पानी सड़कों पर बह रहा है और जनता के नलों में नालियों का गंदा पानी पहुँच रहा है।
🪣कनेक्शन के नाम पर उगाही: 50 हजार नए कनेक्शन का लक्ष्य तो रखा गया है, लेकिन स्थानीय निवासियों का आरोप है कि नगर पालिका के बाबू और बिचौलिए ‘मुफ्त कनेक्शन’ के नाम पर अवैध वसूली कर रहे हैं। बिना ‘सुविधा शुल्क’ के फाइल आगे नहीं बढ़ रही।
🪣रखरखाव का अभाव: करोड़ों की लागत से बने ओवरहेड टैंक (जैसे रुधौली में 28.76 करोड़ का प्रोजेक्ट) अभी से उपेक्षा का शिकार हैं। वाल्व खराब हैं और संचालन के लिए प्रशिक्षित स्टाफ की कमी है।
🎯आंकड़ों का मकड़जाल: बभनान और रुधौली की ‘अधूरी’ कहानी
सरकारी रिपोर्ट कहती है कि बभनान में 24.86 करोड़ की योजना पर 10.22 करोड़ खर्च हो चुके हैं और काम “लंबित” है। सवाल यह है कि 31 मार्च 2026 की डेडलाइन खत्म होने के बाद भी ‘तकनीकी कारणों’ का रोना क्यों रोया जा रहा है? रुधौली में भी 13.52 करोड़ रुपये अवमुक्त होने के बाद भी 77 प्रतिशत प्रगति ही क्यों है? क्या अधिकारी इस इंतजार में हैं कि अगली गर्मी आए और वे आपदा के नाम पर फिर से नया बजट पास करा सकें?
🎯आवास विकास कॉलोनी: 24 घंटे पानी का ‘झूठा’ सपना
सबसे हास्यास्पद स्थिति आवास विकास कॉलोनी की है। यहाँ 100% बजट (6.90 करोड़) खर्च दिखाया जा रहा है। यदि पैसा पूरा खर्च हो गया, तो कार्य पूर्णता की तिथि 30 मई 2026 तक क्यों खिंच गई? क्या यह धन का बंदरबांट नहीं है? जब पैसा ही नहीं बचा, तो अगले दो महीनों में काम कैसे पूरा होगा?
सरकारी कागजों पर विकास की रफ्तार इतनी तेज है कि शायद ‘बुलेट ट्रेन’ भी शरमा जाए, लेकिन धरातल पर हकीकत यह है कि जून-जुलाई की तपती गर्मी से पहले बस्ती की जनता एक-एक बूंद पानी के लिए तरसने को मजबूर है। नगर विकास विभाग और जल निगम (नगरीय) के दावों के बीच 91.48 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट ‘पाइपलाइन’ में कहीं खो गया है।
🎯डेडलाइन का ‘मजाक’ और फाइलों का ‘जाल’
अखबारी सुर्खियों में दावा किया जा रहा है कि काम “अंतिम चरण” में है। लेकिन सवाल यह है कि यह ‘अंतिम चरण’ खत्म कब होगा? जिन परियोजनाओं को 31 जनवरी 2026 तक पूरा हो जाना चाहिए था, वे अप्रैल की चिलचिलाती धूप तक अधूरी क्यों हैं?
- रुधौली में 28.76 करोड़ खर्च होने के बावजूद प्रगति मात्र 77 प्रतिशत है।
- बभनान में 2023 से शुरू हुआ काम अब भी ‘लंबित’ की श्रेणी में है।
- कप्तानगंज में 30 करोड़ से अधिक के बजट के बाद भी जनता वैकल्पिक साधनों (हैंडपंपों) के भरोसे है।
✍️क्या विभाग केवल तारीखें बढ़ाकर अपनी विफलताओं को ढंकने का प्रयास कर रहा है?
😇24 घंटे जलापूर्ति: हकीकत या चुनावी जुमला?
आवास विकास कॉलोनी में 24 घंटे जलापूर्ति का सब्जबाग दिखाया गया था। मई 2026 तक कार्य पूर्ण करने का नया ‘लॉलीपॉप’ थमाया गया है। हैरानी की बात यह है कि बजट का शत-प्रतिशत उपयोग (₹6.90 करोड़) दिखाया जा रहा है, लेकिन पाइपलाइन और नलकूपों की स्थापना की प्रक्रिया अब भी कछुआ चाल से चल रही है। जब पैसा पूरा खर्च हो चुका है, तो काम अधूरा क्यों? यह भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है या फिर प्रशासनिक अक्षमता की ओर?
😇पुराने संसाधनों पर टिका ‘स्मार्ट’ शहर
एक तरफ हम डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी की बात करते हैं, वहीं बस्ती के 50 हजार से अधिक घरों के लिए बिछाई गई 200 किलोमीटर की पाइपलाइन अब भी सूखी पड़ी है। नागरिक आज भी उन्हीं दशकों पुरानी जर्जर टंकियों के भरोसे हैं जो कभी भी बड़े हादसे को दावत दे सकती हैं।
क्षेत्रीय निवासी कहते हैं: “अखबारों में पढ़कर लगता है कि गंगा हमारे घर के नल में उतर आई है, पर हकीकत में बाल्टी लेकर दूसरे मोहल्ले जाने की मजबूरी आज भी कायम है।”
🙊जिम्मेदारों की ‘तकनीकी’ चुप्पी
एक्सईएन जल निगम, प्रमोद कुमार का कहना है कि “तकनीकी कारणों” से देरी हो रही है। यह ‘तकनीकी कारण’ सरकारी तंत्र का वो पसंदीदा ढाल है, जिसके पीछे हर लेटलतीफी और कमीशनखोरी को छुपा लिया जाता है।
🔥बड़ा सवाल?
91 करोड़ रुपये की लागत वाली ये परियोजनाएं क्या सच में जनता की प्यास बुझाने के लिए हैं, या फिर ठेकेदारों और अधिकारियों की जेबें भरने का जरिया? अगर जून-जुलाई तक घर-घर पानी नहीं पहुंचा, तो इस भारी-भरकम बजट का ऑडिट कौन करेगा? बस्ती की जनता अब वादों से नहीं, नलों से निकलने वाले पानी से प्रशासन का आकलन करेगी। बस्ती की आधी से ज्यादा आबादी आज भी हैंडपंपों के भरोसे है, जिनमें से अधिकांश ‘रीबोर’ की मांग कर रहे हैं। नगर पालिका के अधिकारी एयर-कंडीशंड कमरों में बैठकर ‘सब चंगा है’ की रिपोर्ट भेज रहे हैं, जबकि हकीकत में गृहणियाँ आधी रात को पानी भरने के लिए जगने को मजबूर हैं।
“नगर पालिका की लापरवाही ने बस्ती को प्यास के ऐसे रेगिस्तान में झोंक दिया है, जहाँ पैसा तो पानी की तरह बह रहा है, पर प्यास बुझाने के लिए पानी नहीं है।”
🎯 जवाबदेही की मांग
यह लेख सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन के लिए चेतावनी है। यदि जून-जुलाई की गर्मी से पहले इन चारों निकायों में सुचारू जलापूर्ति शुरू नहीं हुई, तो यह न केवल वित्तीय अनियमितता का मामला होगा, बल्कि मानवाधिकारों का भी उल्लंघन होगा।
🎯डीएम बस्ती और शासन को चाहिए कि:
- नगर पालिका के उन अधिकारियों की सूची बने जिन्होंने फाइलों पर ‘झूठी प्रगति’ दिखाई।
- जल निगम और नगर पालिका के बीच समन्वय की कमी को दूर किया जाए।
- रुपये के खर्च और धरातल पर हुए काम का थर्ड-पार्टी ऑडिट कराया जाए।
- बस्ती की जनता अब और इंतज़ार नहीं करेगी। साहिब, फाइलें नहीं, नल से पानी चाहिए!





















