
अजीत मिश्रा (खोजी)
🛟सत्ता की हनक या वर्दी का जुल्म? बस्ती जिला कारागार में लहूलुहान हुई इंसानियत!🛟
- बस्ती जिला जेल में तानाशाही: प्लास्टिक पाइप से पिटाई और आंखों में वार, क्या यही है सुधार गृह?
- रक्षक बने भक्षक: क्या बस्ती जेल प्रशासन कानून से ऊपर है?
- अंधेरगर्दी: पति की आंखों की रोशनी पर संकट, पत्नी को मुलाकात से भी रोका!
- लोकतंत्र की हत्या: जेल की चारदीवारी के पीछे दम तोड़ती इंसानियत और सिसकते अधिकार।
बस्ती मंडल | 07 अप्रैल 2026
बस्ती। कहने को तो जेल ‘सुधार गृह’ होते हैं, लेकिन बस्ती जिला कारागार से जो खबर निकलकर सामने आ रही है, वह सुधार के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है। लालगंज थाना क्षेत्र के शोभनपार निवासी बंदी सूरज चौधरी के साथ जेल प्रशासन द्वारा की गई कथित बर्बरता ने न केवल मानवाधिकारों का गला घोंटा है, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता को भी नंगा कर दिया है।
🎯भूख की आवाज पर मिली ‘लाठियों की मार’
आरोप है कि बीती 1 अप्रैल को सूरज चौधरी ने सिर्फ इतना कहा था कि उसे भोजन कम मिल रहा है और उसका पेट नहीं भर रहा। क्या एक बंदी को अपनी भूख जाहिर करने का भी हक नहीं? पत्नी अंजनी द्वारा जिलाधिकारी को दिए गए शिकायती पत्र के अनुसार, भूख की गुहार लगाने के बदले जेल अधीक्षक शिव प्रताप मिश्र, डिप्टी जेलर त्रिलोकी नाथ, वन्दना त्रिपाठी, रोशन आरा और सिपाही प्रदीप कुमार समेत 20 अज्ञात सिपाहियों ने सूरज को प्लास्टिक के पाइप और जूतों से इस कदर पीटा कि वह मरणासन्न स्थिति में पहुंच गया।
🎯अंधेरगर्दी: आंखों की रोशनी पर खतरा, मुलाकात पर पहरा
जुल्म की पराकाष्ठा देखिए कि बंदी की आंखों पर भी वार किया गया, जिससे उसकी आंखों में खून उतर आया है और रोशनी जाने का खतरा मंडरा रहा है। प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा संदेह तब खड़ा होता है जब पीड़ित की पत्नी को अपने पति से मिलने से रोक दिया जाता है। आखिर जेल प्रशासन क्या छुपाना चाहता है? मुलाकात बंद करना और सरकारी फोन बंद कर देना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
🎯’हिरासत में हिंसा’ सभ्य समाज पर कलंक
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है, चाहे वह जेल में ही क्यों न हो। बस्ती जेल की यह घटना ‘कस्टोडियल टॉर्चर’ (हिरासत में प्रताड़ना) का निकृष्ट उदाहरण है। यदि जेल के भीतर ही कैदी सुरक्षित नहीं हैं और अधिकारियों की तानाशाही इस कदर हावी है कि वे कानून को अपने हाथ में लेकर किसी को अंधा करने की हद तक पीट सकते हैं, तो फिर कानून के शासन का क्या अर्थ रह जाता है?
⭐सवाल और मांग:
जिला प्रशासन और उच्च अधिकारियों को अब कुंभकर्णी नींद से जागना होगा। हमारी मांगें स्पष्ट और न्यायसंगत हैं:
👉स्वतंत्र चिकित्सा जांच: बंदी सूरज चौधरी का तत्काल किसी उच्च स्तरीय प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराया जाए ताकि उसकी आंखों की रोशनी बचाई जा सके।
👉दोषियों पर तत्काल एफआईआर: आरोपी जेल अधिकारियों और कर्मचारियों पर नामजद मुकदमा दर्ज कर उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए।
🔔पारदर्शिता: पीड़ित परिवार को तुरंत मुलाकात की अनुमति दी जाए। सच को दबाने की कोशिशें बंद हों।
बस्ती जिलाधिकारी महोदय को इस मामले में निष्पक्ष जांच कर नजीर पेश करनी चाहिए। यदि रक्षक ही भक्षक बनेंगे, तो जनता का विश्वास इस लोकतंत्र से उठ जाएगा। सूरज चौधरी को लगी हर चोट शासन की साख पर एक गहरा जख्म है। क्या बस्ती का प्रशासन न्याय करेगा या फाइलें दबा दी जाएंगी? जनता जवाब मांग रही है।
- बस्ती जेल कांड: भूख मांगना पड़ा भारी, सलाखों के पीछे बर्बरता।
- इंसाफ की गुहार: जिलाधिकारी की चौखट पर न्याय मांगती बेबस पत्नी।
- खाकी पर दाग: जेल अधिकारियों की गुंडागर्दी ने बस्ती को किया शर्मसार।
– विशेष संवाददाता, बस्ती।





















