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बस्ती में ‘गैस’ का काला खेल: रसूखदारों के आगे नतमस्तक प्रशासन!

साहब! हॉकर तो मोहरा है, असली 'खिलाड़ी' तो कुर्सियों पर बैठे हैं।

अजीत मिश्रा (खोजी)

ब्यूरो रिपोर्ट: रसूखदारों की ‘गैस’ और रेंगता विभाग

  • आपूर्ति फुल, फिर भी चूल्हे ठंडे: आखिर कहाँ ‘उड़’ रहे हैं हजारों सिलेंडर?
  • विभागीय सुस्ती या मिलीभगत? रसूखदारों की फाइलों में दबी कार्रवाई की हिम्मत।
  • पर्दाफाश: गोदाम से नहीं, ‘सेटिंग’ से मिल रहा सिलेंडर; ₹2000 में बिक रहा जनता का हक।

​ बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश | दिनांक: 06 अप्रैल, 2026

बस्ती। जिले में रसोई गैस की कालाबाजारी का खेल अब कोई ‘खुफिया’ राज नहीं रहा। मड़वानगर टोल प्लाजा के पास तीन हॉकरों की गिरफ्तारी ने उस पर्दे को उठा दिया है जिसके पीछे गैस एजेंसियों के रसूखदार मालिक और विभाग की ‘मेहरबानी’ छिपी थी। हैरान करने वाली बात यह है कि जहाँ आम जनता एक-एक सिलेंडर के लिए तपती धूप में घंटों कतारों में खड़ी है, वहीं वही सिलेंडर ₹1600 से ₹2000 के बीच ऊंचे दामों पर बेधड़क बेचे जा रहे हैं।

विभागीय सुस्ती या मिलीभगत?

कतरन चीख-चीख कर कह रही है कि पूर्ति विभाग कार्रवाई करने में ‘हांफ’ रहा है। जब तेल कंपनियां रोजाना 10 से 12 हजार सिलेंडरों की आपूर्ति का दावा कर रही हैं, तो फिर उपभोक्ताओं के घरों तक डिलीवरी क्यों नहीं पहुंच रही? ओटीपी आने के बावजूद सिलेंडर का न मिलना और गोदामों से 5-7 किमी दूर वितरण कराना, विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या अफसरों की फाइलें इन रसूखदार मालिकों के रसूख के नीचे दबी हुई हैं?

कड़वा सच: एक तरफ जिला पूर्ति अधिकारी (DSO) आपूर्ति सुचारू होने का दावा करते हैं, तो दूसरी तरफ ‘सन इंडेन गैस एजेंसी’ जैसी बड़ी कड़ियों के नाम सामने आने के बाद भी सीधी कार्रवाई के बजाय फाइलों का खेल खेला जा रहा है। हॉकरों की गिरफ्तारी तो सिर्फ ‘मोहरा’ है, असली ‘शतरंज के खिलाड़ी’ तो वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर चांदी काट रहे हैं।

सामाजिक लेख: जनता की रसोई पर ‘सिस्टम’ का पहरा

​आज बस्ती के मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के लिए रसोई गैस का सिलेंडर महज ईंधन नहीं, बल्कि एक मानसिक प्रताड़ना का कारण बन गया है। जिस सिलेंडर को सहजता से घर की दहलीज पर होना चाहिए था, उसे पाने के लिए सरकारी कर्मचारी अपनी छुट्टी कुर्बान कर रहे हैं और महिलाएं चूल्हों पर धुआं निगलने को मजबूर हैं।

रसूख और भ्रष्टाचार का गठजोड़

समाज के लिए यह शर्मनाक है कि आपदा और किल्लत के समय में भी ‘कालाबाजारी के गिद्ध’ सक्रिय हैं। रसूखदार लोग अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर आपूर्ति को डाइवर्ट करवा रहे हैं। जब आम आदमी लाइन में लगता है, तो उसे ‘गाड़ी नहीं आई’ का बोर्ड दिखा दिया जाता है, लेकिन उसी समय अंधेरे के साये में ₹2000 में सिलेंडर ‘सेटिंग’ से उपलब्ध हो जाता है।

अंधेरे में प्रशासन

प्रशासन का यह कहना कि ‘लोग जमाखोरी कर रहे हैं’, अपनी विफलताओं को जनता के सिर मढ़ने जैसा है। यदि सिस्टम पारदर्शी होता और होम डिलीवरी अनिवार्य होती, तो किसी को भी 5 किमी दूर गोदाम तक दौड़ने की जरूरत नहीं पड़ती। यह महज एक वितरण की समस्या नहीं है, यह एक सामाजिक अन्याय है जहाँ प्रभावशाली लोग गरीब के हक का निवाला (और गैस) छीन रहे हैं।

निष्कर्ष: बस्ती की जनता अब खोखले आश्वासनों से ऊब चुकी है। यदि विभाग वास्तव में गंभीर है, तो उसे केवल ‘हॉकरों’ पर नहीं, बल्कि उन ‘सफेदपोश’ चेहरों पर नकेल कसनी होगी जो इस पूरे नेक्सस को संरक्षण दे रहे हैं। वरना, ‘उज्ज्वला’ के सपने इन काले धंधों के धुएं में ही खो जाएंगे।

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