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भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती सांसें: बस्ती में ‘कमीशन’ के खेल ने उजाड़ी माताओं की गोद!

रक्षक ही भक्षक: मुर्दों को 'जिंदा' दिखाकर जेबें भर रहे अस्पताल और डायग्नोस्टिक सेंटर, जांच के नाम पर सिर्फ 'सेटिंग' का खेल!

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती में ‘मौत’ का सौदागर बना स्वास्थ्य महकमा: 50% कमीशन के लिए बुझ रहे माताओं की गोद के चिराग! बस्ती में स्वास्थ्य माफिया और कमीशनखोरी का ‘खूनी’ गठजोड़

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती सांसें: कुदरहा PHC के MOIC और ANM पर गंभीर आरोप, अवैध अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर मेहरबान अफसर!
  • ‘साहब! मेरा बच्चा मर गया और ये कमीशन खाते रहे’— बस्ती के स्वास्थ्य सिंडिकेट के खिलाफ फूटा जनता का आक्रोश, आंदोलन की चेतावनी।
  • कमीशनखोरी का ‘खूनी’ खेल: अवैध सेंटरों को ‘साहब’ का संरक्षण, मासूमों की जान से खिलवाड़!

बस्ती। उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद अंतर्गत कुदरहा क्षेत्र से मानवता को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। यहाँ स्वास्थ्य विभाग के कुछ जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी ‘सफेद चोले’ में मौत के सौदागर बन चुके हैं। पीएचसी कुदरहा के एमओआईसी डॉ. अश्वनी यादव और एएनएम विनोदा सिंह पर स्थानीय जनता ने बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोप है कि ये लोग चंद रुपयों के कमीशन के लिए गरीब गर्भवती महिलाओं के जीवन और उनके अजन्मे बच्चों की सांसों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।जनपद के स्वास्थ्य महकमे में ‘सफेदपोश’ गिद्धों का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि अब मासूमों की जान की कीमत महज 50 फीसदी कमीशन रह गई है। पीएचसी कुदरहा के एमओआईसी डॉ. अश्वनी यादव और एएनएम विनोदा सिंह पर लगे संगीन आरोप मानवता को शर्मसार करने वाले हैं। क्षेत्र की जनता चीख-चीख कर कह रही है कि इन ‘यमदूतों’ की मिलीभगत से न केवल सरकारी खजाना लूटा जा रहा है, बल्कि गरीब गर्भवती महिलाओं और उनके गर्भ में पल रहे बच्चों को मौत के मुंह में धकेला जा रहा है।

कमीशन का गणित और ‘जिंदा’ मौत का खेल

क्षेत्र के ग्रामीणों और पीड़ित परिवारों का आरोप है कि एएनएम विनोदा सिंह और संबंधित स्वास्थ्य केंद्र का पूरा सिंडिकेट 50 फीसदी कमीशन पर चल रहा है। इस भ्रष्टाचार की सबसे वीभत्स तस्वीर तब सामने आती है जब अवैध रूप से संचालित ‘सिटी लाइफ डायग्नोस्टिक सेंटर’ और ‘आकृति डायग्नोस्टिक सेंटर’ की भूमिका उजागर होती है।हैरानी की बात यह है कि लालच की अंधी दौड़ में सिटी लाइफ डायग्नोस्टिक सेंटर जैसे अवैध संस्थान बिना डिग्री के अल्ट्रासाउंड कर रहे हैं। आरोप है कि दस दिन पहले मर चुके बच्चे को भी ये सेंटर ‘जिंदा’ बता देते हैं ताकि बार-बार अल्ट्रासाउंड के नाम पर कमीशन की मलाई काटी जा सके। जब पीड़ित कैली (बस्ती मेडिकल कॉलेज) रेफर होता है, तब वहां ऑपरेशन के बाद सच्चाई सामने आती है कि बच्चा तो हफ़्तों पहले दम तोड़ चुका था। सवाल यह है कि विनोदा सिंह जैसी एएनएम, जो खुलेआम कमीशनखोरी के लिए बदनाम हैं, उन्हें ‘डिलीवरी पॉइंट’ की जिम्मेदारी किसने और क्यों दी?

क्षेत्रीय लोगों का दावा है कि ये डायग्नोस्टिक सेंटर बिना किसी योग्य डिग्रीधारी डॉक्टर के संचालित हो रहे हैं। यहाँ अप्रशिक्षित लोग अल्ट्रासाउंड करते हैं। भ्रष्टाचार की इंतहा यह है कि यदि गर्भ में बच्चे की मृत्यु हो चुकी होती है, तब भी ये सेंटर कमीशन के लालच में उसे ‘जिंदा’ बताते रहते हैं ताकि मरीज से बार-बार पैसे ऐंठे जा सकें। सच्चाई तब पता चलती है जब मरीज की हालत बिगड़ने पर उसे बस्ती मेडिकल कॉलेज (कैली) रेफर किया जाता है, जहाँ डॉक्टर बताते हैं कि बच्चा तो 10 दिन पहले ही मर चुका था।

जांच के नाम पर ‘लीपापोती’ की साजिश?

इस पूरे गोरखधंधे के खिलाफ भारतीय किसान यूनियन (भानु) के जिला उपाध्यक्ष उमेश गोस्वामी ने मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने जिलाधिकारी (DM) को सौंपे शिकायती पत्र में सनसनीखेज आरोप लगाया है कि इन अवैध सेंटरों को नोडल डिप्टी सीएमओ डॉ. ए.के. चौधरी का संरक्षण प्राप्त है।भ्रष्टाचार की इस लंका में आग तब लगी जब जांच टीम के गठन पर सवाल उठे। भारतीय किसान यूनियन (भानु) के जिला उपाध्यक्ष उमेश गोस्वामी ने सीधे तौर पर डिप्टी सीएमओ डॉ. ए.के. चौधरी पर इन अवैध केंद्रों को संरक्षण देने का आरोप लगाया है। विडंबना देखिए, जिस अधिकारी पर संरक्षण का आरोप है, उसी को जांच टीम का अध्यक्ष बना दिया गया है। यह “चोर को ही पहरेदारी” सौंपने जैसा है। क्या सीएमओ बस्ती इस ‘सेटिंग’ से वाकिफ नहीं हैं?

आश्चर्य की बात यह है कि जब इस मामले की शिकायत हुई, तो सीएमओ ने जांच टीम का अध्यक्ष भी उसी डॉ. ए.के. चौधरी को बना दिया, जिन पर संरक्षण देने के आरोप हैं। उमेश गोस्वामी ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा, “जिस अधिकारी पर रक्षक के बजाय भक्षक होने का आरोप है, वही निष्पक्ष जांच कैसे कर सकता है?” उन्होंने तत्काल जांच टीम से डॉ. ए.के. चौधरी को हटाने की मांग की है।

प्रमुख बिंदु: जो व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं

  • बाहरी दवाओं का नेटवर्क: एमओआईसी और एएनएम पर आरोप है कि वे सरकारी अस्पताल की दवाओं के बजाय बाहर की महंगी दवाइयां लिखने के लिए मेडिकल स्टोर से भारी कमीशन लेते हैं।
  • अयोग्य स्टाफ: अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर बिना किसी विशेषज्ञ (Radiologist) के जांच की जा रही है, जो सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है।
  • अधिकारियों की चुप्पी: ब्लॉक प्रमुख अनिल दुबे द्वारा मामले को उठाए जाने पर केवल आश्वासन का खेल चल रहा है, धरातल पर कार्रवाई शून्य है।
  • अवैध सेंटर: बिना डिग्री और रजिस्ट्रेशन के फल-फूल रहे सिटी लाइफ और आकृति डायग्नोस्टिक सेंटर को तत्काल सील करने की मांग।
  • दवाइयों का सिंडिकेट: सरकारी अस्पताल की जगह 50% कमीशन के चक्कर में बाहर की दवाइयां लिखने का घिनौना खेल।
  • संगठन का अल्टीमेटम: भाकियू (भानु) ने स्पष्ट किया है कि यदि दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई और अवैध सेंटरों को बंद नहीं किया गया, तो वे बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।

आंदोलन की चेतावनी

कुदरहा के ब्लॉक प्रमुख अनिल दुबे ने भी मामले की गंभीरता को देखते हुए बैठक बुलाने की बात कही है। लेकिन बड़ा सवाल वही है—क्या गरीब की कोख उजाड़ने वाले ये ‘कमीशनखोर’ सलाखों के पीछे जाएंगे, या जांच के नाम पर एक और फाइल धूल फांकने के लिए दबा दी जाएगी?

भाकियू (भानु) और स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन को अल्टीमेटम दिया है कि यदि दोषी एमओआईसी, एएनएम और अवैध डायग्नोस्टिक सेंटरों के संचालकों पर कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं हुई और इन केंद्रों को सील नहीं किया गया, तो बस्ती जनपद में एक बड़ा जन-आंदोलन छेड़ा जाएगा।

निष्कर्ष: बस्ती का यह मामला सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि ‘क्रिमिनल नेग्लिजेंस’ (आपराधिक लापरवाही) का है। जहाँ एक तरफ सरकार बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के दावे करती है, वहीं कुदरहा जैसे इलाकों में ‘कमीशन’ की भेंट चढ़ती मासूमों की जान इन दावों की धज्जियाँ उड़ा रही है। अब देखना यह है कि प्रशासन इन रसूखदार ‘सफेदपोशों’ पर नकेल कसता है या गरीब जनता यूँ ही पिसती रहेगी।

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