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PWD टेंडर घोटाला: ‘साहब’ छुट्टी पर, फिर भी टेंडर बाबू की कुर्सी पर काबिज; वसूली का खेल जारी!

PWD में शर्मनाक खेल: छुट्टी पर बाबू, फिर भी टेंडर पर काबू! भ्रष्टाचार का 'प्रांतीय' मॉडल: पॉलिटेक्निक की पढ़ाई और टेंडर की मलाई, संतोष बाबू का डबल रोल!

अजीत मिश्रा (खोजी)

महाघोटाला: PWD के गलियारों में ‘भ्रष्टाचार का फूल’ और ‘वसूली का फल’, क्या सो रहा है शासन? छुट्टी पर बाबू, फिर भी टेंडर पर काबू! रसूखदार बाबुओं ने PWD को बनाया निजी जागीर; करोड़ों के वारा-न्यारा का खेल उजागर।

ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।

  • सिस्टम को दीमक की तरह चाट रहे ‘खास’ बाबू, SC की छत्रछाया में वसूली का साम्राज्य! साहब छुट्टी पर हैं… लेकिन वसूली जारी है! PWD में नियमों का जनाजा।
  • नेपाल तबादला भी नहीं तोड़ पाया प्रेमचंद का मोह, दोबारा बस्ती में आकर शुरू किया टेंडर का ‘खेला’। पर्दे के पीछे का खेल: कागजों पर चार्ज किसी और का, गद्दी पर कब्जा वसूली करने वालों का!
  • PWD बस्ती: जहाँ ‘सुविधा शुल्क’ तय करता है ठेकेदारों की किस्मत!
  • PWD का टेंडर घोटाला: बाबू, ठेकेदार और ‘माननीयों’ का गठजोड़ उजागर! भ्रष्ट बाबुओं की ‘करमवीर’ गाथा: PWD में लूट की खुली छूट।
  • PWD बाबू का जलवा: 9 साल का राज, तबादला फेल, वसूली सुपरहिट!

बस्ती। उत्तर प्रदेश के लोक निर्माण विभाग (PWD) में भ्रष्टाचार किस कदर हावी है, इसकी एक बानगी बस्ती जिले में देखने को मिल रही है। यहाँ नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए ‘सुविधा शुल्क’ का एक ऐसा सिंडिकेट चल रहा है, जिसके तार सीधे शासन और सत्ता की दहलीज तक जुड़े होने की चर्चा है। विभाग में बाबुओं का आलम यह है कि वे तबादलों को जेब में लेकर घूमते हैं और छुट्टी पर रहने के बावजूद टेंडर की फाइलों का निपटारा ‘सेट’ ठेकेदारों के पक्ष में करते हैं।लोक निर्माण विभाग (PWD) के प्रांतीय खंड में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ नियम-कानून ताक पर रखकर ‘सुविधा शुल्क’ का खुला खेल चल रहा है। ताज़ा खुलासे ने विभाग के भीतर मचे उस सिंडिकेट की पोल खोल दी है, जहाँ छुट्टी पर चल रहे कर्मचारी टेंडर मैनेज कर रहे हैं और मलाई ऊपर तक पहुँचाई जा रही है।

पॉलिटेक्निक की पढ़ाई और टेंडर की मलाई: संतोष सिंह का ‘डबल रोल’

प्रांतीय खंड में टेंडर बाबू का प्रभार कागजों में फूलबदन सिंह के नाम है, लेकिन पर्दे के पीछे के असली खिलाड़ी संतोष सिंह हैं। आश्चर्य की बात यह है कि संतोष सिंह वर्तमान में विभागीय अवकाश (Leave) पर हैं और पॉलिटेक्निक की पढ़ाई कर रहे हैं। नियमतः, छुट्टी पर रहने वाला कर्मचारी सरकारी कार्यालय की कुर्सी पर नहीं बैठ सकता, लेकिन यहाँ ‘सुविधा शुल्क’ का दबाव नियमों से ऊपर है।प्रांतीय खंड में टेंडर बाबू का प्रभार कागजों में फूलबदन सिंह के पास है, लेकिन हकीकत की जमीन पर खेल कोई और ही खेल रहा है। वर्तमान में विभागीय अवकाश पर चल रहे बाबू संतोष सिंह, जो कि पॉलिटेक्निक की शिक्षा ले रहे हैं, अवकाश के बावजूद टेंडर का पूरा कार्यभार अनधिकृत रूप से संभाल रहे हैं। चर्चा है कि संतोष सिंह का मुख्य काम ठेकेदारों से ‘सुविधा शुल्क’ वसूलना और उसे उच्चाधिकारियों से लेकर ‘माननीयों’ की चौखट तक सुरक्षित पहुँचाना है। सवाल यह है कि एक कर्मचारी छुट्टी पर होकर भी सरकारी फाइलों और टेंडर प्रक्रिया को कैसे छू सकता है?

सूत्र बताते हैं कि संतोष सिंह का मुख्य काम ठेकेदारों के साथ मिलकर टेंडर की सेटिंग करना और एकत्रित की गई मोटी रकम को उच्चाधिकारियों व ‘माननीयों’ तक पहुँचाना है। विभाग में चर्चा है कि संतोष सिंह की अनुपस्थिति में भी टेंडर की चाबी उन्हीं के पास रहती है, जो व्यवस्था पर एक बड़ा तमाचा है।

तबादला भी नहीं हिला सका ‘बाबू प्रेमचंद’ का साम्राज्य

यही हाल सर्किल ऑफिस का है। यहाँ टेंडर बाबू का चार्ज जयहिंद के पास है, मगर सत्ता की चाबी बाबू प्रेमचंद के हाथों में है। प्रेमचंद का इतिहास खुद उनके रसूख की गवाही देता है। वरिष्ठ क्लर्क प्रेमचंद लगातार 9 वर्षों तक बस्ती में एक ही पद पर जमे रहे। शिकायतें हुईं, जाँच हुई और तबादला ‘गोरखपुर-इंडो-नेपाल’ बॉर्डर के लिए कर दिया गया। लेकिन, रसूख ऐसा कि नियम बौने साबित हुए और उन्होंने दोबारा उसी स्थान पर वापसी कर ली।भ्रष्टाचार की इस चेन की दूसरी अहम कड़ी सर्किल ऑफिस के बाबू प्रेमचंद हैं। यहाँ का चार्ज कागजी तौर पर ‘जयहिंद’ के पास है, लेकिन वास्तविकता में प्रेमचंद का एकाधिकार है। प्रेमचंद का इतिहास बताता है कि वह सिस्टम से भी बड़े हो चुके हैं।

  • 9 साल का अटूट राज: एक ही पद पर 9 वर्षों तक जमे रहने के बाद जब शिकायत हुई, तो उन्हें बस्ती से हटाकर ‘गोरखपुर-इंडो-नेपाल’ भेजा गया।
  • वर्चस्व की वापसी: चंद ही दिनों में अपने सियासी रसूख और आर्थिक दबदबे के दम पर प्रेमचंद फिर से बस्ती में उसी सीट पर काबिज हो गए।

SC करमवीर सिंह की ‘छत्रछाया’ में अवैध वसूली

सबसे गंभीर आरोप SC करमवीर सिंह पर लग रहे हैं। कहा जा रहा है कि बाबू प्रेमचंद को उनका पूर्ण संरक्षण प्राप्त है। इस ‘छत्रछाया’ में प्रेमचंद न केवल ठेकेदारों से अवैध वसूली कर रहे हैं, बल्कि अपने पसंदीदा ठेकेदारों को नियम विरुद्ध टेंडर दिलाने के लिए पूरी मशीनरी का इस्तेमाल कर रहे हैं। विभाग अब ‘लोक निर्माण’ के बजाय ‘स्व-निर्माण’ का अड्डा बन चुका है, जहाँ विकास कार्यों की गुणवत्ता से ज्यादा ‘सुविधा शुल्क’ के प्रतिशत पर चर्चा होती है।सूत्रों की मानें तो बाबू प्रेमचंद को SC करमवीर सिंह का वरदहस्त प्राप्त है। इसी ‘छत्रछाया’ के दम पर प्रेमचंद अपने चिन्हित ठेकेदारों को मनमुताबिक टेंडर दिलाने और विभाग में अवैध वसूली का सिंडिकेट चला रहे हैं। विभागीय गलियारों में यह चर्चा आम है कि बिना इन ‘खास’ बाबुओं की मर्जी और सुविधा शुल्क के, ईमानदार ठेकेदार के लिए काम पाना नामुमकिन है।

तीखे सवाल: जवाब कौन देगा?

  • क्या विभाग के मुखिया को यह नहीं दिखता कि छुट्टी पर गया बाबू कार्यालय में बैठकर टेंडर मैनेज कर रहा है?
  • 9 साल तक एक ही जगह जमे बाबू का तबादला रद्द होना क्या किसी बड़े भ्रष्टाचार की ओर इशारा नहीं करता?
  • क्या ‘माननीयों’ तक पहुँचने वाले ‘सुविधा शुल्क’ की वजह से ही इन भ्रष्ट कर्मचारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही?

कड़वा सवाल: क्या PWD के उच्चाधिकारी इस बंदरबाँट से अनजान हैं? या फिर ‘सुविधा शुल्क’ का हिस्सा ऊपर तक पहुँचने के कारण ही इन दागी और अनधिकृत बाबुओं को टेंडर जैसे महत्वपूर्ण कार्यों की कमान सौंप दी गई है? PWD बस्ती में टेंडर प्रक्रिया एक मजाक बनकर रह गई है। यदि शासन स्तर से इसकी उच्चस्तरीय जाँच नहीं हुई, तो राजस्व को करोड़ों का चूना लगना तय है। अब देखना यह है कि योगी सरकार का ‘जीरो टॉलरेंस’ का चाबुक इन सफेदपोश भ्रष्टाचारियों पर कब चलता है।

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