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मजहबी व्यवस्था देश के लिए आत्मघाती। — जातीयता के बजाय भारतीयता की आवश्यकता।

मजहबी व्यवस्था देश के लिए आत्मघाती। --- जातीयता के बजाय भारतीयता की आवश्यकता।

भारत वर्ष में सरकारों और राजनीतिक दलों में सुधार की आवश्यकता

— जातिवादी, मजहबी व्यवस्था देश के लिए आत्मघाती।
— जातीयता के बजाय भारतीयता की आवश्यकता।

प्रयागराज। वरिष्ठ समाजसेवी अधिवक्ता आर के पाण्डेय ने भारत वर्ष में बढ़ रहे जातिवाद, वर्गवाद, मजहबवाद पर गंभीर चिंतन के साथ भारत वर्ष के सरकार और राजनीतिक दलों को आगाह करते हुए बताया कि इस वक्त देश में केवल सरकारों और राजनीतिक दलों में सुधार की आवश्यकता है।
उपरोक्त के संदर्भ में बात करते हुए आर के पाण्डेय एडवोकेट ने कहा कि देश में आम जनमानस को सुधारने के बजाय केवल सरकार और राजनीतिक दलों को स्वयं में सुधरने की जरूरत क्योंकि वर्तमान में सरकार और राजनीतिक दलों की जातिवादी व मजहबी सोच व कार्य व्यवस्था इस देश को विभाजन, असमानता व आत्मघाती विनाश के तरफ ले जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विचित्र स्थिति है कि एक तरफ हमारा संविधान समानता की बात करता है तो दूसरी तरफ तहसील से जाति प्रमाण पत्र जारी होते हैं और इन्हीं जाति प्रमाण पत्र के आधार पर लोग नौकरी व तमाम सुविधाएं लेते हैं और दूसरी तरफ जाति के नाम पर यहां आपराधिक मुकदमे दर्ज होते हैं और तमाम निर्दोष लोग जेल में ठूंसे जाते हैं। आर के पाण्डेय एडवोकेट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति या परिवार जो कि निर्धन बेसहारा व जरूरतमंद है तो उसकी मदद होनी चाहिए। केवल जाति व धर्म के आधार पर रेवड़ी बांटना गलत है। आर के पाण्डेय ने कहा कि इस देश में सरकार व राजनैतिक दलों को खुद में सुधार करके जातीयता के बजाय भारतीयता को अपनाना चाहिए। हालिया बांग्लादेश के घटना का उदाहरण देते हुए आर के पाण्डेय ने कहा कि जिस तरह से आरक्षण विरोधियों ने आज बांग्लादेश में तख्ता पलट किया और अराजकता बढ़ी है ऐसी स्थिति भारत वर्ष में न होने पाए। इसके लिए सरकार और राजनीतिक दलों को सोचना ही होगा और उन्हें सर्वकल्याणकारी, जनहितकारी कार्ययोजना बनाना होगा। हमारी व्यवस्था इस प्रकार हो जिसमें प्रत्येक भारतीय का कल्याण हो भले ही वह किसी भी जाति, धर्म का क्यों न हो? आर के पाण्डेय ने आग्रह किया कि विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व सामाजिक संगठन इस मुहिम में सामने आएं और देश में जातीयता के बजाय भारतीयता के आधार पर व्यवस्था बनाएं।

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