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वर्दी का रसूख या कानून का मखौल? बस्ती CO सिटी पर पद के दुरुपयोग का गंभीर आरोप

खाकी की दबंगई: क्या बस्ती में कोर्ट के फैसलों से ऊपर है CO सिटी का आदेश?

अजीत मिश्रा (खोजी)

🚨खाकी की चौखट पर न्याय का ‘दमघोंटू’ पहरा: क्या बस्ती में CO सिटी कानून से ऊपर हैं?🚨

  • न्याय के रक्षक ही बने भक्षक? अधिवक्ता के टीन शेड पर CO सिटी ने क्यों चलाया ‘पावर’ का बुलडोजर?
  • बस्ती पुलिस का ‘अजीब’ न्याय: सुलहनामा किनारे, फिर भी CO सिटी को दखल देने की खुजली क्यों?
  • सालों से एक ही कुर्सी पर जमे CO सिटी: क्या लंबे कार्यकाल ने बना दिया है निरंकुश?
  • SP साहब जवाब दें! क्या अब दीवानी मामलों का फैसला चौकी से होगा या अदालत से?
  • CO सिटी के खिलाफ वकीलों ने खोला मोर्चा; SP को पत्र सौंपकर निष्पक्षता पर उठाए सवाल।
  • अधिवक्ता अजय चन्द्रा का आरोप: “पड़ोसियों के इशारे पर पद का दुरुपयोग कर रहे हैं CO सदर”।
  • सिविल बार एसोसिएशन की चेतावनी: CO सिटी की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार, निष्पक्ष जांच की मांग।

ब्यूरो, बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

बस्ती। क्या पुलिस का काम कानून की रक्षा करना है या दीवानी अदालतों के फैसलों में दखल देकर अपनी ‘सल्तनत’ चलाना? यह सवाल आज बस्ती के गलियारों में गूंज रहा है। मामला जनपद के CO सिटी सत्येन्द्र भूषण तिवारी से जुड़ा है, जिन पर वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने पद के दुरुपयोग और खुलेआम पक्षपात के गंभीर आरोप लगाए हैं। शनिवार को सिविल बार एसोसिएशन के दिग्गज पदाधिकारियों ने पुलिस अधीक्षक (SP) से मिलकर साफ कह दिया—”साहब, आपके मातहत न्याय की नहीं, रसूख की भाषा बोल रहे हैं।”

सुलहनामा किनारे, CO का ‘हुक्म’ सर्वोपरि?

मामला वरिष्ठ अधिवक्ता अजय चन्द्रा का है। रौता चौकी के पास उनके और उनके पड़ोसियों के बीच साल 2014 से दीवानी वाद (संख्या 544/2014) चल रहा है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों पक्षों में पहले ही सुलह हो चुकी है। समझौते के तहत चबूतरा बनाने और दुकान पर टीन शेड डालने की स्पष्ट अनुमति है। लेकिन आरोप है कि CO सिटी को शायद यह कानूनी सुलह रास नहीं आई।

3 अप्रैल को जब अधिवक्ता चन्द्रा अपनी दुकान पर नियमानुसार टीन शेड लगवा रहे थे, तब आरोप है कि CO सिटी ने अपनी शक्तियों का बेजा इस्तेमाल करते हुए रौता चौकी इंचार्ज को फोन घुमाया और काम रुकवा दिया। इतना ही नहीं, वकील के खिलाफ ‘वैधानिक कार्यवाही’ का मौखिक आदेश भी दे डाला।

सवाल: जो जवाब मांगते हैं?

👉अदालत बड़ी या वर्दी का रौब? जब मामला सिविल कोर्ट में लंबित है और पक्षों के बीच लिखित सुलह है, तो एक पुलिस क्षेत्राधिकारी को बीच में ‘पार्षद’ या ‘जज’ बनने की क्या आवश्यकता आन पड़ी?

👉सालों से एक ही कुर्सी पर ‘अंगद का पैर’: लेख में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया है कि CO सदर पिछले कई वर्षों से इसी जनपद में इसी पद पर जमे हुए हैं। क्या लंबे समय तक एक ही जगह टिके रहना इस ‘निरंकुशता’ की मुख्य वजह है?

👉चौकी इंचार्ज पर दबाव क्यों? क्या पुलिस प्रशासन अब सिविल विवादों में भू-माफियाओं या रसूखदारों के दबाव में काम कर रहा है?

वकीलों ने खोला मोर्चा, अब SP की बारी

सिविल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रमाशंकर पाण्डेय और महामंत्री राजेश सिंह के नेतृत्व में अधिवक्ताओं ने दो टूक शब्दों में कहा है कि CO सदर का यह कृत्य पद की गरिमा के विरुद्ध है। वकीलों के प्रतिनिधिमंडल ने मांग की है कि इस मामले का स्वतः संज्ञान लेकर तुरंत निस्तारण किया जाए।

बड़ा सवाल: अगर एक वरिष्ठ अधिवक्ता के साथ खाकी का यह बर्ताव है, तो आम जनता की सुनवाई कैसे होती होगी? क्या बस्ती पुलिस अब अदालतों के अधिकार क्षेत्र में भी हस्तक्षेप करेगी? जिले के कप्तान को अब तय करना है कि वे अपनी फोर्स की छवि बचाएंगे या न्याय की मर्यादा।

मुख्य बिंदु:

  • सुलहनामे का उल्लंघन: टीन शेड की अनुमति होने के बावजूद काम रुकवाना।
  • अतीत का साया: पहले भी एक तत्कालीन CO (संजय सिंह) द्वारा छज्जा कटवाए जाने का जिक्र, जो रसूख के दुरुपयोग की निरंतरता दिखाता है।
  • सीधी चुनौती: वकीलों का एकजुट होकर SP से शिकायत करना प्रशासन के लिए खतरे की घंटी है।
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