खाकी के साये में ‘मिशन शक्ति’ तार-तार: बिना महिला पुलिसकर्मी के महिला को थाने ले जाने का वीडियो वायरल, पीड़ित पर ही दर्ज हुआ मुकदमा

अजीत मिश्रा (खोजी)
खाकी के साये में सवालों से घिरती कार्यशैली: मिशन शक्ति के दावों को ठेंगा दिखाता नगर थाना
- बस्ती: नगर थानेदार की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल, सड़क हादसे के पीड़ितों को न्याय की जगह मिली प्रताड़ना
- दावे बड़े-वादे झूठे: जमीन पर दम तोड़ रहा ‘मिशन शक्ति’, नगर पुलिस की मनमानी से सहमा पीड़ित परिवार
- मिशन शक्ति पर भारी नगर थानेदार की दबंगई!
- सड़क हादसे के बाद बदसलूकी और फिर पीड़ित पर ही मुकदमा; आखिर किसे बचा रही है नगर पुलिस?
- बिना महिला आरक्षी के थाने खींच लाई पुलिस, सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो
- खाकी की मनमानी: एक तरफ तेज रफ्तार का कहर, दूसरी तरफ पुलिसिया तंत्र का पहरा
बस्ती।। उत्तर प्रदेश सरकार का बहुप्रचारित ‘मिशन शक्ति’ अभियान महिलाओं को सुरक्षा, सम्मान और स्वावलंबन देने का दम भरता है। इसके तहत पुलिस महकमा चौपालों और रैलियों में महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करता है। लेकिन, जमीनी हकीकत इन दावों की कलई खोलने के लिए काफी है। ताजा मामला बस्ती जनपद के नगर थाने से सामने आया है, जहां थानेदार की कार्यशैली ने न सिर्फ महिला सुरक्षा के दावों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं, बल्कि पुलिसिया तंत्र की पारदार्शिता को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।
सड़क हादसे की आग और बदसलूकी का बवंडर
यह पूरा मामला बेलवाड़ी-भरवटिया मार्ग का है, जहां एक तेज रफ्तार स्विफ्ट कार ने ई-रिक्शा को जोरदार टक्कर मार दी थी। इस दर्दनाक हादसे में ई-रिक्शा पर सवार एक महिला और चालक प्रदीप चौधरी गंभीर रूप से घायल हो गए।
नियम और इंसानियत दोनों यह मांग करते थे कि हादसे के बाद घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया जाता और दोषी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होती। लेकिन आरोप है कि टक्कर मारने के बाद कार चालक रघुवेंद्र चमाटे ने मौके पर हद पार करते हुए घायल पक्ष के साथ खुलेआम बदसलूकी की। पीड़ित पक्ष ने गंभीर रूप से धमकाने और अभद्रता करने के गंभीर आरोप लगाए हैं।
नियम-कानून ताक पर: बिना महिला पुलिसकर्मी के थाने ले जाने का आरोप
मामले का सबसे गंभीर और निंदनीय पहलू यह रहा कि जब विवाद बढ़ा, तो नगर पुलिस ने मौके पर त्वरित न्याय करने के बजाय मनमानी का परिचय दिया।
सबसे बड़ा सवाल: सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि किसी भी महिला को बिना महिला पुलिसकर्मी के न तो थाने लाया जा सकता है और न ही पूछताछ के लिए हिरासत में रखा जा सकता है।
लेकिन इस प्रकरण में बिना महिला आरक्षी के ही एक महिला को जबरन गाड़ी में बैठाकर थाने ले जाने का आरोप है। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जो खाकी की कार्यशैली पर सीधा तमाचा है। वायरल वीडियो ने साफ कर दिया है कि महकमे के भीतर नियमों की किस तरह धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
पीड़ित पर ही मुकदमा: न्याय की आस पर फिरा पानी
हद तो तब हो गई जब न्याय मांगने पहुंचे पीड़ित पक्ष को ही पुलिस ने आरोपी के कटघरे में खड़ा कर दिया। प्राथमिक जांच या निष्पक्ष पड़ताल करने के बजाय, नगर पुलिस ने उल्टे पीड़ित पक्ष पर ही मुकदमा दर्ज कर दिया।
यह कार्रवाई स्थानीय पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करती है:
- क्या रसूखदारों के दबाव में आकर खाकी ने निष्पक्षता का चोला उतार फेंका है?
- क्या थानों में तैनात जिम्मेदार अधिकारी शासन के ‘मिशन शक्ति’ को सिर्फ कागजी जुमला मानते हैं?
- क्या सड़क हादसों के पीड़ितों को अब न्याय पाने के लिए भी थानों में प्रताड़ना का सामना करना पड़ेगा?
उच्चाधिकारियों से निष्पक्ष जांच की दरकार
नगर थानेदार की इस मनमानी और संदिग्ध कार्यशैली को लेकर पूरे क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं गर्म हैं। एक तरफ जहां सरकार महिलाओं को सुरक्षित माहौल देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं कुछ लापरवाह और बेलगाम अधिकारी अपनी कार्यप्रणाली से सरकार की छवि को धूमिल कर रहे हैं।
समय आ गया है कि जनपद के उच्चाधिकारी इस मामले का स्वतः संज्ञान लें। वायरल वीडियो की सत्यता की जांच हो, महिला को बिना महिला पुलिसकर्मी के ले जाने के मामले में जवाबदेही तय हो और सड़क हादसे की निष्पक्ष जांच कराकर पीड़ित को वास्तविक न्याय दिलाया जाए, ताकि जनता का खाकी से भरोसा न उठे।
क्या इस मामले में स्थानीय पुलिस अधिकारियों द्वारा कोई निष्पक्ष जांच या अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए?
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