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“PWD का नया खेल: साहब की कुर्सी पर बाबू का ‘रिमोट कंट्रोल’, जनता बेहाल!”

"विकास की बलि चढ़ा 'कमीशन तंत्र': बस्ती पीडब्ल्यूडी में नियमों की खुली डकैती।"

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। सिस्टम को दीमक की तरह चाटता PWD का ‘कमीशन तंत्र’: जब रक्षक ही बन जाएं भक्षक।।

⭐”फाइलों में सड़क, जेब में करोड़ों: आखिर कब तक चलेगा बाबू-साहब का ये खूनी खेल?”

⭐”टेंडर की शर्तों में ‘घोटाले’ का तड़का: अपनों को रेवड़ी, गैरों को तकनीकी अड़चन।”

⭐”PWD की सड़कों पर भ्रष्टाचार का गड्ढा: क्या प्रमुख सचिव की ‘चाबुक’ चलेगी?”

बस्ती। सरकारी दफ्तरों में एक पुरानी कहावत है— “साहब से बड़ा बाबू।” बस्ती पीडब्ल्यूडी (PWD) में यह कहावत आज पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। यहाँ फाइलों के पहिए विकास के लिए नहीं, बल्कि निजी तिजोरियों को भरने के लिए घूम रहे हैं। ताजा मामला टेंडर प्रक्रिया में की गई खुल्लम-खुल्ला धांधली का है, जिसने यह साबित कर दिया है कि विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं।

💫नियमों की बलि और ‘सेटिंग’ का खेल

लोक निर्माण विभाग में विकास कार्यों के लिए जो टेंडर निकाले जाते हैं, उनका मकसद पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना होता है। लेकिन बस्ती वृत्त में मामला इसके उलट है। यहाँ ₹30 लाख से ₹3 करोड़ तक के कार्यों में जानबूझकर ऐसी ‘कठिन शर्तें’ थोपी जा रही हैं, जो शासनादेश के बिल्कुल विपरीत हैं।

सरकारी नियम कहते हैं कि कंक्रीट मिक्स प्लांट की शर्त केवल बड़े कार्यों के लिए होनी चाहिए, लेकिन यहाँ छोटे कार्यों में भी इसे अनिवार्य कर दिया गया। आखिर क्यों? जवाब साफ है— ताकि आम ठेकेदार रेस से बाहर हो जाएं और बाबू के ‘खास’ ठेकेदार, जिनके पास कागजी सेटिंग है, वे मैदान मार सकें।

💫’बाबू’ का रसूख और ‘साहब’ की खामोश रजामंदी

हैरानी की बात यह है कि इस पूरे खेल के मास्टरमाइंड वे बाबू (लिपिक) हैं, जिनकी पहुँच साहब की मेज तक सीधी है। लेख में जैसा वर्णित है, अभिषेक कुमार श्रीवास्तव और प्रभात कुमार उर्फ पट्‌टू जैसे नाम चर्चा में हैं, जो कथित तौर पर टेंडर की शर्तों को मरोड़ने में माहिर हो चुके हैं।

“जब भ्रष्टाचार की फाइलें साहब की रजामंदी से बाबू तैयार करने लगे, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? यह सिर्फ कमीशन का खेल नहीं, बल्कि जनता के टैक्स के पैसे की डकैती है।”

💫गठजोड़ का त्रिकोण: अधिकारी, बाबू और ‘माननीय’

पीडब्ल्यूडी में भ्रष्टाचार का यह ढांचा एक ‘त्रिकोण’ पर टिका है। इसमें शामिल हैं:

⭐अधिकारी: जो कार्रवाई करने के बजाय आश्वासन का झुनझुना थमाते हैं।

⭐बाबू: जो कागजों में हेराफेरी कर अवैध वसूली का रास्ता साफ करते हैं।

⭐माननीय (रसूखदार नेता): जिनके वरदहस्त के बिना इतने बड़े घोटाले मुमकिन नहीं।

इस गठजोड़ ने ईमानदार ठेकेदारों की कमर तोड़ दी है। आलम यह है कि जो ठेकेदार कमीशन नहीं दे सकता, उसे तकनीकी खामियों का बहाना बनाकर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

💫गुणवत्ता से समझौता, जनता को धोखा

जब ठेकेदार को टेंडर पाने के लिए अपनी जेब का 10% हिस्सा पहले ही ‘नकद वसूली’ के रूप में बाबुओं को देना पड़े, तो वह सड़क निर्माण में ईमानदारी कैसे बरतेगा? यही कारण है कि बस्ती की सड़कें बनने के कुछ महीनों बाद ही गड्ढों में तब्दील हो जाती हैं। भ्रष्टाचार की यह भेंट सीधे तौर पर आम जनता की सुरक्षा और सुविधा से खिलवाड़ है।

💫सवाल जो जवाब मांगते हैं:

1. ₹30 लाख के काम में ₹3 करोड़ वाली शर्तें क्यों थोपी गईं?

2. क्या अधिकारियों की नाक के नीचे चल रहे इस खेल में उनकी मौन सहमति है?

3. शिकायत के बाद भी दागी बाबुओं पर कार्रवाई करने से कौन रोक रहा है?

💫भ्रष्टाचार का गणित: जब टेंडर मिलने से पहले ही 10% नकद वसूली हो जाएगी, तो सड़क की गिट्टी और तारकोल में कितनी मिलावट होगी, इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं।

💫अब आर-पार की लड़ाई जरूरी

बृजनंदन पांडेय जैसे ठेकेदारों द्वारा उठाई गई आवाज केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि उस सड़े हुए सिस्टम के खिलाफ विद्रोह है जिसे सुधारने की तत्काल आवश्यकता है। यदि प्रमुख सचिव स्तर पर इस पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई और दोषी बाबुओं को सलाखों के पीछे नहीं भेजा गया, तो ‘पारदर्शिता’ शब्द केवल फाइलों की शोभा बनकर रह जाएगा।

वक्त आ गया है कि जनता और प्रशासन मिलकर इस ‘कमीशन खोरी’ के दीमक को खत्म करें, वरना सड़कें तो कागजों पर बनती रहेंगी, पर धरातल पर केवल भ्रष्टाचार का कीचड़ दिखेगा।

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