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कुर्सी बड़ी मासुम नजर आती है

व्यंग्य कुर्सी
सागर। वंदे भारत लाईव टीवी न्यूज रिपोर्टर सुशील द्विवेदी,8225073664-
कुर्सी बड़ी मासूम नज़र आती है। लकड़ी, लोहे, प्लास्टिक—किसी भी रूप में खामोश खड़ी रहती है। लेकिन राजनीति और ऑफिस की दुनिया में यह कुर्सी किसी भूत से कम नहीं। जिस पर बैठा, उसी का व्यक्तित्व बदल गया।
घर में रखी कुर्सी पर बैठकर आदमी आराम करता है, पर सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही वही आदमी आराम हराम कर देता है। उसे लगता है अब वह भगवान से कम नहीं—क्योंकि भक्तों की भीड़ अब उसकी कुर्सी के इर्द-गिर्द चक्कर काटती है। कुर्सी की खासियत देखिए—यह खुद कभी नहीं चलती, मगर इंसानों को नचाती जरूर है। लोग दिन-रात इसी के पीछे भागते हैं। कोई लात मारकर हटाता है, तो कोई चरण छूकर। कोई तो कुर्सी के नीचे कालीन बन जाता है, ताकि साहब आराम से बैठ सकें। कुर्सी की वफादारी भी अद्भुत है। जिस्म बदल जाते हैं, नेताबदल जाते हैं, अफसर बदल जाते हैं, मगर कुर्सी वही रहती है। कल जिस पर बैठकर भाषण हो रहा था, आज उसी पर बैठकर भ्रष्टाचार की फाइलें साइन हो रही हैं। सकते हैं, कुर्सी इंसान को पहचानने की मशीन है। जिसको भी यह नसीब हो जाए, उसकी असली औक़ात दुनिया को तुरत समझ आ जाती है।
असल में कुर्सी सिर्फ लकड़ी और लोहे की नहीं होती—यह आदमी के दिमाग़ पर बैठी लालसा की भी कुर्सी है। और जो इस पर बैठता है, अक्सर उतरना ही भूल जाता है।

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