
अजीत मिश्रा (खोजी)
जनता की जान से ‘खून का धंधा’: आखिर कब तक मौत बांटेंगे ये अवैध पैथोलॉजी सेंटर?
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश
- झोलाछाप पैथोलॉजी का आतंक: ताला तोड़कर घुसा प्रशासन, बेनकाब हुआ ‘अवैध’ कारोबार।
- बिना डॉक्टर, बिना लैब टेक्नीशियन: सिद्धार्थनगर में ‘राम भरोसे’ चल रहे पैथोलॉजी सेंटर!
- स्वास्थ्य विभाग की बड़ी कार्रवाई: क्या अब थमेगा अवैध पैथोलॉजी सेंटरों का खूनी खेल?
- बढ़नी में छापेमारी: अवैध संचालकों में हड़कंप, पर सवाल वही—आखिर कब तक चलेगा जान से समझौता?
- सिस्टम की नाक के नीचे फल-फूल रहे मौत के केंद्र; सिद्धार्थनगर में दो पैथोलॉजी पर गिसी गाज।
सिद्धार्थनगर के बढ़नी कस्बे में हाल ही में स्वास्थ्य विभाग की छापेमारी ने उस कड़वे सच को एक बार फिर उजागर कर दिया है, जिसे व्यवस्था अक्सर नजरअंदाज कर देती है। श्याम पैथोलॉजी और गीता डायग्नोस्टिक सेंटर पर हुई कार्रवाई केवल दो अवैध दुकानों का सील होना नहीं है, बल्कि उस मकड़जाल की एक छोटी सी झलक है जो मासूम मरीजों की रगों से निकलने वाले खून पर अपनी तिजोरी भर रहा है।
मौत की लैब: न डिग्री, न डॉक्टर, बस कमीशन का खेल
सोचिए, आप अपनी सेहत का हाल जानने के लिए खून का नमूना देते हैं और उसकी जांच एक ऐसा व्यक्ति कर रहा है जिसके पास न लैब टेक्नीशियन की डिग्री है और न ही कोई मेडिकल समझ। गीता डायग्नोस्टिक सेंटर में एक बीए डिग्रीधारक का रक्त जांच करना मेडिकल साइंस का मजाक नहीं तो और क्या है?
जब पैथोलॉजी में न पंजीकृत चिकित्सक हो और न प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ, तो रिपोर्ट क्या होगी? वह महज कागज का एक टुकड़ा होगी, जो या तो किसी स्वस्थ व्यक्ति को बीमार बता देगी या किसी गंभीर मरीज को ‘सब ठीक है’ का भ्रम देकर मौत के मुंह में धकेल देगी।
चूहे-बिल्ली का खेल और सिस्टम की सुस्ती
छापेमारी के दौरान श्याम पैथोलॉजी के संचालक का फरार होना और कमरे में ताला लगा देना यह दर्शाता है कि इन ‘झोलाछाप केंद्रों’ को कानून का कोई खौफ नहीं है। हालांकि प्रशासन ने ताला तोड़कर साक्ष्य जुटाए, लेकिन सवाल यह उठता है कि:
- ये अवैध केंद्र महीनों-सालों से किसकी शह पर फल-फूल रहे थे?
- क्या स्वास्थ्य विभाग को तब तक भनक नहीं लगती जब तक मामला ‘आउट ऑफ कंट्रोल’ न हो जाए?
- पंजीकरण के बिना बिजली, दुकान और प्रचार-प्रसार के बड़े-बड़े बोर्ड कैसे लग जाते हैं?
कब रुकेगा ‘इलाज’ के नाम पर यह खिलवाड़?
नोडल अधिकारी डॉ. एमएम त्रिपाठी का यह कहना सही है कि यह “मरीजों की जान के साथ खिलवाड़” है, लेकिन केवल सील करना और मुकदमा दर्ज करना काफी नहीं है। उत्तर प्रदेश के बस्ती मंडल सहित सिद्धार्थनगर के सीमावर्ती इलाकों में ऐसे सैकड़ों केंद्र आज भी गलियों में चल रहे हैं।
कड़वे सवाल:
- कमीशन खोरी: क्या इन अवैध सेंटमौत की लैब: सिद्धार्थनगर में खून के सौदागरों पर चला प्रशासन का हंटर!
रों को स्थानीय निजी क्लीनिकों और कुछ सरकारी कर्मचारियों का मौन समर्थन प्राप्त है?- समीक्षा: केवल बढ़नी कस्बे में ही क्यों? क्या पूरे जिले के हर ब्लॉक में सघन जांच अभियान नहीं चलना चाहिए?
- कठोर दंड: क्या इन संचालकों पर ऐसी कार्रवाई होगी जो नजीर बने, या कुछ समय बाद ये फिर किसी नए नाम से दुकान सजा लेंगे?
निष्कर्ष
प्रशासन की यह कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन यह ‘वन-डे शो’ नहीं होना चाहिए। स्वास्थ्य विभाग को कागजों से बाहर निकलकर धरातल पर उन ‘मौत के सौदागरों’ को ढूंढना होगा जो जनता के भरोसे का कत्ल कर रहे हैं। अगर आज सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो अगली गलत रिपोर्ट किसी के घर का चिराग बुझा सकती है।
वक्त आ गया है कि इन अवैध पैथोलॉजी सेंटरों के रसूख का ताला भी उसी तरह तोड़ा जाए, जैसे मजिस्ट्रेट ने श्याम पैथोलॉजी का ताला तोड़ा है।
रों को स्थानीय निजी क्लीनिकों और कुछ सरकारी कर्मचारियों का मौन समर्थन प्राप्त है?






















