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सिस्टम की मिलीभगत और मरीजों की मौत: ‘जुगाड़’ से चल रहे अस्पतालों के खिलाफ एसपी ने छेड़ा अभियान।

अब नहीं चलेगा 'सेटलमेंट' का खेल: मरीज माफियाओं की कुंडली खंगालने में जुटी पुलिस की विशेष टीम।

अजीत मिश्रा (खोजी)

स्वास्थ्य के ‘कसाई’ और रक्षक पुलिस: क्या अब वाकई टूटेगी ‘मरीज माफिया’ की कमर?

संपादकीय टिप्पणी

बस्ती जैसे शहरों में स्वास्थ्य सेवा के नाम पर चल रहा “जुगाड़ का धंधा” अब अपने चरम पर है। हाल ही में सामने आई रिपोर्ट यह दर्शाती है कि शहर की गलियों में बिना डिग्री, बिना लाइसेंस और बिना किसी नैतिकता के अस्पताल कैसे फल-फूल रहे हैं। पुलिस कप्तान डॉ. यशवीर सिंह की पहल पर अब इन ‘मरीज माफियाओं’ पर शिकंजा कसने की तैयारी है, लेकिन यह सवाल अहम है कि क्या यह महज एक खानापूर्ति होगी या स्वास्थ्य व्यवस्था में वास्तविक सुधार की शुरुआत?

‘मरीज माफिया’ का काला जाल

अखबार की रिपोर्ट उन भयावह वास्तविकताओं को उजागर करती है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। बीएमएस या सामान्य परामर्श की डिग्री लेकर सर्जन, गायनोलॉजिस्ट और फिजिशियन बनने का ढोंग रचना न केवल धोखाधड़ी है, बल्कि यह सीधे तौर पर आम आदमी की जिंदगी से खिलवाड़ है।

मिलीभगत का खेल: सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये अस्पताल न केवल बिना डिग्री के चलते हैं, बल्कि अक्सर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से अपना लाइसेंस तक मैनेज कर लेते हैं।

दलालों का नेटवर्क: सरकारी अस्पतालों से मरीजों को बहला-फुसलाकर निजी अस्पतालों में ले जाने वाले ‘एजेंटों’ का सक्रिय होना इस बात का प्रमाण है कि यह एक संगठित अपराध (Organized Crime) बन चुका है।

मौत का सौदा और ‘सेटलमेंट’: केस 1 और केस 2 स्पष्ट करते हैं कि जब किसी मरीज की मौत होती है, तो अस्पताल संचालक पहले पुलिस और परिजनों को ‘मैनेज’ करने की कोशिश करते हैं। यह ‘मैनेजमेंट’ शब्द न्याय व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है।

समीक्षा: पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी

पुलिस की सक्रियता स्वागत योग्य है, लेकिन इसे केवल ‘घटना के बाद की कार्रवाई’ तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

जवाबदेही का अभाव: जब तक इन फर्जी अस्पतालों के संचालक और उन्हें संरक्षण देने वाले भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई (जैसे रासुका या गंभीर आपराधिक मामले) नहीं होगी, तब तक इनका हौसला कम नहीं होगा।

दबाव में सिस्टम: रिपोर्ट में उल्लेख है कि अक्सर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है। इस ‘रफा-दफा’ करने वाले तत्वों की पहचान करना पुलिस की सबसे बड़ी चुनौती होनी चाहिए।

जागरूकता: जनता को भी यह समझने की जरूरत है कि सस्ती और त्वरित सेवा के चक्कर में वे अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं।

निष्कर्ष

‘मरीज माफिया’ का खात्मा केवल पुलिस के डंडे से संभव नहीं है। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग को अपनी आंतरिक सफाई करनी होगी। यदि डॉक्टर की डिग्री और अस्पताल का लाइसेंस पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक रूप से ऑनलाइन उपलब्ध नहीं होता, तो ये फर्जीवाड़ा करने वाले फिर से किसी दूसरे नाम से दुकान खोल लेंगे।

यह अभियान तब तक अधूरा है जब तक कि हर उस अधिकारी पर गाज न गिरे जिसने अपनी जेब भरने के लिए इन ‘मौत के सौदागरों’ को खुली छूट दी। अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं को ‘व्यापार’ के चश्मे से देखना बंद किया जाए।

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