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।। “कागजों में मालिक, हकीकत में ‘भूत’: गणपति फार्मा ने उधेड़ी सरकारी दावों की बखिया”।।

।। "ऑनलाइन सत्यापन या अंधा विश्वास? कैसे एक फर्जी पैन कार्ड ने ड्रग विभाग को घुटनों पर ला दिया"।।

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। सिस्टम की ‘नींद’ और जालसाजी का ‘नशा’: गणपति फार्मा के खेल ने उड़ाईं विभागों की धज्जियाँ।।

बुधवार 21 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। जब रक्षक ही सो रहे हों, तो भक्षक का काम आसान हो जाता है। बस्ती जिले में ‘गणपति फार्मा’ के नाम पर जो खेल खेला गया, वह न केवल पुलिस और ड्रग विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी बताता है कि कागजों की दुनिया में एक ‘अदृश्य’ आदमी कैसे 1.72 लाख शीशी नशीली कफ सिरप का काला साम्राज्य खड़ा कर सकता है।

💫कागजों का तिलिस्म और सरकारी लापरवाही

हैरानी की बात यह है कि जिस ‘पंकज कुमार’ को गणपति फार्मा का मालिक बताया गया, वह हकीकत में है ही नहीं। एक मास्टरमाइंड ने फर्जी आधार और पैन कार्ड के जरिए पहले दवा का थोक लाइसेंस हासिल किया और फिर उसी के दम पर GST रजिस्ट्रेशन भी करा लिया। तीखा सवाल यह है कि क्या सरकारी विभाग सिर्फ ‘ऑनलाइन सबमिशन’ को ही परम सत्य मान लेते हैं?

🔥ड्रग विभाग की चूक: बिना भौतिक सत्यापन (Physical Verification) के थोक लाइसेंस कैसे जारी हो गया?

GST विभाग का ढुलमुल रवैया: विभाग का कहना है कि वे ऑनलाइन डेटा पर भरोसा करते हैं। लेकिन क्या एक संकरी गली में चल रही फर्म, जो करोड़ों का टर्नओवर दिखा रही थी, कभी जांच के दायरे में नहीं आनी चाहिए थी?

💫1.72 लाख शीशी ‘मौत’ का सौदा

जांच में खुलासा हुआ है कि इस फर्जी फर्म ने अकेले दम पर 1.72 लाख शीशी कोडीनयुक्त कफ सिरप की खरीद-फरोख्त की। यह आंकड़ा डराने वाला है। यह सिर्फ एक टैक्स चोरी का मामला नहीं है, बल्कि युवा पीढ़ी को नशे की गर्त में धकेलने का एक सुनियोजित षड्यंत्र है। फर्जी मालिक ने एक साल तक नियमित GST जमा करके विभाग की आंखों में धूल झोंकी, ताकि किसी को शक न हो। यह उसकी ‘शातिर’ सोच का प्रमाण है।

💫जिम्मेदार कौन?

अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, विभागीय स्तर पर कार्रवाई अभी भी ‘लंबित’ है। पुलिस अपनी जांच कर रही है, लेकिन वे अधिकारी अब भी अपनी कुर्सी पर सुरक्षित हैं जिन्होंने बंद कमरों में बैठकर इन फर्जी दस्तावेजों को हरी झंडी दिखाई थी।

बड़ा सवाल: क्या केवल ‘पंकज कुमार’ जैसे काल्पनिक नामों पर FIR दर्ज कर लेना काफी है? उन असली चेहरों का क्या, जो पर्दे के पीछे बैठकर इस सिंडिकेट को फाइनेंस कर रहे थे?

💫प्रशासन से सीधे और तीखे सवाल:-

👉ड्रग इंस्पेक्टर से सवाल: जब थोक दवा लाइसेंस जारी किया गया, तो क्या उस ‘संकरी गली’ वाली दुकान का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) सिर्फ कागजों पर हुआ था? अगर नहीं, तो एक अयोग्य जगह को लाइसेंस कैसे मिला?

👉GST विभाग से सवाल: विभाग का कहना है कि ऑनलाइन आवेदन को सही मान लिया गया। क्या करोड़ों के संदिग्ध लेन-देन और कोडीनयुक्त कफ सिरप जैसी संवेदनशील वस्तुओं के व्यापार पर ‘इंटेलिजेंस’ विंग सो रही थी?

👉पुलिस प्रशासन से सवाल: मुख्य आरोपी ‘पंकज कुमार’ का नाम-पता फर्जी निकला, इसका मतलब असली मास्टरमाइंड अभी भी पुलिस की पहुंच से दूर है। क्या इस मामले की जड़ें किसी बड़े राजनीतिक या प्रशासनिक रसूख से जुड़ी हैं?

👉खाद्य सुरक्षा विभाग से सवाल: नशीली दवाओं का इतना बड़ा स्टॉक बस्ती में खपाया गया या यहाँ से सप्लाई हुआ? क्या विभाग के पास जिले में आने वाली दवाओं के स्टॉक का कोई वास्तविक मिलान तंत्र (Reconciliation) है?

👉सिस्टम से सवाल: क्या ‘डिजिटल इंडिया’ का अर्थ केवल प्रक्रिया को ऑनलाइन करना है? जवाबदेही तय करने के लिए क्या कोई ऐसा तंत्र है जो फर्जी आधार और पैन की तत्काल पहचान कर सके।

🔥”वाह रे सिस्टम!”

“साहब कहते हैं कि आवेदन ऑनलाइन था, इसलिए हमने मान लिया। कल को कोई ‘गब्बर सिंह’ के नाम पर लाइसेंस मांग ले, तो क्या विभाग उसे भी घर बैठे व्यापार करने की छूट दे देगा? आखिर ‘सत्यापन’ की जिम्मेदारी किसकी थी—कम्प्यूटर की या कुर्सी पर बैठे अधिकारियों की?”

गणपति फार्मा का यह प्रकरण एक ‘वेक-अप कॉल’ है। यदि ऑनलाइन पंजीकरण की प्रक्रिया इतनी खोखली है कि कोई भी फर्जी नाम-पते पर ड्रग लाइसेंस ले ले, तो जनता की सुरक्षा भगवान भरोसे है। प्रशासन को चाहिए कि वह केवल कागजों की जांच न करे, बल्कि जमीन पर उतरकर इन ‘भूतिया’ फर्मों का पर्दाफाश करे।

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