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कुर्सी की हवस और ‘पति-राज’: कब तक ठगी जाएगी बस्ती की जनता?

बस्ती नगर पालिका: विकास की अर्थी पर भ्रष्टाचार का तांडव! ईमानदारी का मुखौटा, बेईमानी का चेहरा: पालिका के 'अशोक' से अब तक का काला सफर।

अजीत मिश्रा (खोजी)

विशेष संपादकीय: बस्ती नगर पालिका—भ्रष्टाचार की ‘चेयर’ या सेवा का संकल्प?

  • महल जैसे सपने, बदहाल गलियाँ: क्या सीमा खरे बदल पातीं पालिका की तकदीर?
  • तिजोरी तो भरी पर इज्जत गंवाई: जब चपरासी भी सलाम करना भूल जाए!
  • आरक्षण का तमाशा: महिला के नाम पर वोट, पति के हाथ में रिमोट।
  • भाजपा का गढ़ और हार का कलंक: बस्ती ने नकारा नेतृत्व या नीयत?
  • चेयरमैनी का ‘शाप’: पाँच साल की मलाई और उम्र भर की रुसवाई।
  • नगर पालिका बस्ती: जहाँ ‘ईमानदार’ की तलाश में जनता को हर बार मिला ‘धोखा’।

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश दिनांक: 13 अप्रैल 2026

बस्ती की राजनीति में इन दिनों एक ही सवाल हवा में तैर रहा है— “अगर सीमा खरे चेयरपर्सन होतीं, तो क्या होता?” लेकिन यह सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जो पिछले कई दशकों से ‘ईमानदारी’ का चोला पहनकर ‘बेईमानी’ की फसल काट रही है। बस्ती नगर पालिका का इतिहास गवाह है कि यहाँ जिसे जनता ने सिर-आंखों पर बिठाया, उसी ने विकास की फाइलों को दीमक की तरह चाटा है।

कुर्सी मिलते ही बदल जाती है फितरत

लेख में कड़वा सच उजागर किया गया है कि बस्ती की जनता ने अक्सर जिसे ‘ईमानदार’ समझकर अध्यक्ष चुना, वही सबसे बड़ा ‘बेईमान’ साबित हुआ। अशोक गुप्त और अशोक कुमार श्रीवास्तव जैसे नामों का उदाहरण आज भी चर्चा में है। यहाँ के राजनैतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि चेयरपर्सन की शपथ लेने के पहले दिन से ही ‘मलाई’ बांटने का खेल शुरू हो जाता है। कुछ ने बीच में बेईमानी की, तो कुछ ने अंत तक कोई कसर नहीं छोड़ी।

महिला आरक्षण का मजाक और ‘पति शासन’

बस्ती के मतदाताओं के साथ सबसे बड़ा धोखा ‘महिला आरक्षण’ के नाम पर हुआ है। जनता ने यह सोचकर वोट दिया कि शायद एक महिला के हाथ में पालिका की बागडोर आने से संवेदनशीलता और पारदर्शिता बढ़ेगी। लेकिन हकीकत यह है कि बागडोर महिलाओं के पास नहीं, बल्कि उनके ‘पतियों’ के पास रही। यह बस्ती का दुर्भाग्य है कि यहाँ नीतियां घर के ड्राइंग रूम में तय होती हैं, पालिका के दफ्तर में नहीं।

विकास की ‘उधारी’ और खोखले दावे

तस्वीर में दी गई रिपोर्ट साफ इशारा करती है कि अगर सही नेतृत्व होता, तो आज पालिका की देनदारी समाप्त हो चुकी होती और शहर में विकास के बड़े काम (जैसे होटल और स्कूल) नजर आते। लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि:

  • आर्थिक स्थिति जर्जर है: पैसा विकास के बजाय जेबों में जा रहा है।
  • जनता का अविश्वास: अब लोग यह मान चुके हैं कि उन्हें कभी ‘आइडियल’ अध्यक्ष नहीं मिलेगा।
  • साख पर बट्टा: भाजपा जैसे संगठित दल के प्रत्याशी (सीमा खरे) की हार यह बताती है कि जनता अब पार्टी की छवि से ऊपर उठकर भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्सा जाहिर कर रही है।

बस्ती नगर पालिका की राजनीति आज उस मुहाने पर खड़ी है जहाँ ‘विश्वास’ शब्द अपनी परिभाषा ढूंढ रहा है। शहर के चौराहों पर चर्चा गरम है— “अगर सीमा खरे चेयरपर्सन होतीं, तो क्या होता?” यह सवाल महज एक व्यक्ति की हार-जीत का विश्लेषण नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर करारा प्रहार है जिसने बस्ती को विकास के बजाय विनाश के कगार पर ला खड़ा किया है।

1. बेईमानी का ‘विरासत’ चक्र: अशोक से अब तक

बस्ती का राजनैतिक इतिहास गवाह है कि यहाँ जिसे भी जनता ने अपनी ‘ईमानदारी’ की कसौटी पर परखकर सत्ता सौंपी, उसने अंततः धोखे की इबारत ही लिखी। लेख में स्पष्ट उल्लेख है कि जब अशोक गुप्त और अशोक कुमार श्रीवास्तव जैसे कथित ‘ईमानदार’ चेहरे बेईमान साबित हो सकते हैं, तो फिर भरोसा किस पर किया जाए?

यहाँ के चेयरपर्सनों ने पालिका को सेवा का माध्यम नहीं, बल्कि धन उगाही का ‘एटीएम’ बना लिया है। कोई शुरू से बेईमान रहा, तो किसी ने सत्ता के बीच में अपनी नैतिकता बेच दी। परिणाम यह हुआ कि आज बस्ती की जनता यह मान चुकी है कि यहाँ ‘आइडियल’ अध्यक्ष मिलना असंभव है।

2. महिला आरक्षण की आड़ में ‘रिमोट कंट्रोल’ की सरकार

बस्ती की राजनीति का सबसे स्याह पक्ष ‘पति शासन’ है। जनता ने महिला प्रत्याशी को वोट दिया ताकि घर और शहर दोनों की सफाई हो सके, लेकिन हकीकत में पालिका की बागडोर महिलाओं के हाथों में कभी रही ही नहीं।

  • सत्ता का केंद्र: निर्णय लेने वाली महिला चेयरपर्सन नहीं, बल्कि उनके पति होते हैं।
  • परिणाम: यही कारण है कि आज तक कोई भी चेयरपर्सन दोबारा नहीं चुना जा सका। जनता एक बार ठगी जाती है, बार-बार नहीं।

3. भाजपा का किला और सीमा खरे की हार: एक सबक

बीजेपी का परंपरागत वोट बैंक होने के बावजूद सीमा खरे की हार यह साबित करती है कि जनता अब केवल ‘पार्टी’ या ‘बड़े नेताओं’ के रसूख पर वोट नहीं देगी।

  • सांसद की ताकत भी नाकाम: जब सांसद अपनी पूरी ताकत झोंक दें और फिर भी प्रत्याशी हार जाए, तो समझ लेना चाहिए कि जनता नेतृत्व की छवि से नाराज है।
  • अवसर की बर्बादी: लेख का तर्क सटीक है—यदि सही नेतृत्व होता, तो आज पालिका कर्जमुक्त होती, नगर में कई नए स्कूल और होटल खुले होते, और आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत होती कि बस्ती की गिनती प्रदेश के विकसित नगरों में होती।

4. कुर्सी और सम्मान का गणित: चपरासी भी नहीं करता सलाम

सत्ता में बैठे लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि पैसा कमाया जा सकता है, लेकिन इज्जत कमाई नहीं जाती, अर्जित की जाती है।

“पाँच साल की बेईमानी आपको पैसा तो दे सकती है, लेकिन जब आप कुर्सी से उतरते हैं, तो नगर पालिका का चपरासी भी आपको सलाम करना जरूरी नहीं समझता।”

यह पंक्ति उन सभी वर्तमान और भावी नेताओं के लिए चेतावनी है जो जनता के टैक्स के पैसे को अपनी जागीर समझते हैं। भ्रष्टाचार का अंत केवल हार नहीं, बल्कि सामाजिक तिरस्कार भी है।

सम्मान या तिरस्कार?

सत्ता का नशा 5 साल में उतर जाता है, लेकिन किए गए पापों की गूँज ताउम्र रहती है। लेख का सबसे तीखा हिस्सा यह है कि— “जो लोग 5 साल बेईमानी करते हैं, उन्हें पैसा तो मिल जाता है पर इज्जत नहीं।” कुर्सी से उतरने के बाद अगर पालिका का चपरासी भी आपको सलाम न करे, तो समझ लीजिए कि आपका कार्यकाल एक कलंक था।

बस्ती की जनता अब जाग रही है। उसे अब ‘अगले बेईमान’ का इंतजार नहीं, बल्कि उस बदलाव की तलाश है जो कागजों पर नहीं, सड़कों और नालियों में दिखे।

बस्ती की आवाज: क्या हम फिर से किसी नए ‘चेहरे’ के पीछे छिपी पुरानी ‘बेईमानी’ को चुनने के लिए तैयार हैं?

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