
सागर। वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़ रिपोर्टर सुशील द्विवेदी*8225072664*
भारत विविधताओं का राष्ट्र है, जहाँ प्रत्येक त्योहार अपने आप में एक विशेष संदेश और भावना लेकर आता है। इन्हीं त्योहारों में से सबसे प्रमुख एवं श्रेष्ठ पर्व है दीपावली जिसे हम ष्अंधकार पर प्रकाश की विजयष् के रूप में मनाते हैं। दीपावली को ष्प्रकाश का पर्वष् कहा जाता है और इसका सबसे प्रमुख एवं पावन प्रतीक है ष्दिया। दियों के बिना दीपावली की कल्पना ही अधूरी है। दीपावली का त्यौहार न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी बहुत महत्वपूर्ण है। दीप जलाकर हम केवल अपने घर को रोशन नहीं करते, बल्कि अपने जीवन में भी सकारात्मकता और आत्मिक प्रकाश का अनुभव करते हैं।
दीपावली एक महान ऐतिहासिक एवं धार्मिक पर्व है, जो आज वैश्विक स्तर पर भी मनाया जाता है। दीपावली में दिये जलाने की परम्परा त्रेता युग से जुड़ी हुई है। यह वह समय था जब भगवान श्रीराम, माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्षों का वनवास समाप्त करके अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत के लिए अयोध्यावासियों ने पूरे नगर को दियों से सजा दिया था। तभी से दीपावली पर दिये जलाने की परम्परा आरंभ हुई, जो आज भी बड़े श्रद्धा एवं उल्लास के साथ निभाई जाती है। इस दिन माता लक्ष्मी, जो धन, वैभव और समृद्धि की देवी मानी जाती हैं, की पूजा की जाती है। यह मान्यता है कि लक्ष्मी जी उन्हीं घरों में प्रवेश करती हैं, जहाँ साफ-सफाई होती है, और दीपों की रोशनी से वातावरण पवित्र होता है। अतः दीप जलाकर हम देवी लक्ष्मी का स्वागत करते हैं और उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं।
दीपावली का त्योहार पाँच दिनों का धार्मिक, सांस्कृतिक एवं पारम्परिक मान्यताओं का महान पर्व है। प्रथम दिवस कार्तिक कृष्ण पक्ष की द्वादशी को गौवत्स द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन का सम्बन्ध विशेष रूप से गौमाता (गाय) और उसके बछड़े (वत्स) से होता है। वसु का अर्थ है संपत्ति और धन। यह दिन गृहस्थ जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि गौमाता को भारतीय संस्कृति में माता के समान पूज्यनीय माना जाता है। इस दिन सबसे पहले गौशाला में एवं तुलसी के समक्ष दिये जलाकर दीपावली पर्व का शुभारंभ किया जाता हैं। कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन धनतेरस का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान धनवन्तरि जो आयुर्वेद के देवता और चिकित्सकों के इष्ट माने जाते हैं, समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इस दिन धन, समृद्धि और स्वास्थ की कामना की जाती है। धनतेरस में तेरस याने तेरह का संकेत है, इसलिए इस दिन तेरह दिये जलाए जाते हैं। दिये घर के अंदर, मुख्य द्वार, तुलसी के पास, रसोई में और बाहर सभी दिशा में जलाये जाते हैं। यह संख्या शुभ मानी जाती है एवं घर में सुख समृद्धि लाने वाली मानी जाती है। धनतेरस के दिन धन के देवी लक्ष्मी जी का स्वागत करने के लिए घर के प्रत्येक कोने को दीपों से सजाया जाता है। यमराज के लिए एक दीपक घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर जलाया जाता है, यह यमराज को समर्पित होता है, जिससे अकाल मृत्यु टलती है।अगले दिन रूप चौदस या नरक चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध करके कन्याओं को मुक्त कराया था, इसलिए इसे नरक चतुर्दशी कहा जाता है। साथ ही यह दिन रूप, सौन्दर्य एवं आत्मशुद्धि का प्रतीक है। इस दिन चौदह दिये घर के चारों तरफ सजाये जाते हैं, और स्वास्थ के लिए विशेष पूजा की जाती है। दीपावली का मुख्य दिवस कार्तिक अमावस्या के दिन लक्ष्मी पूजन के रूप में मनाया जाता है। भगवान श्रीराम के 14 वर्षों के बाद अयोध्या लौटने की खुशी में दीप जलाये गये थे, उसी स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन माँ लक्ष्मी, धन की देवी, भगवान गणेश, जो बुद्धि और शुभ कार्यों के देवता हैं, और कुबेर (धन के रक्षक) की पूजा की जाती है। शाम को घरों में लक्ष्मी-गणेश पूजन के साथ दीप जलाकर रंगोली, फूलों और वंदनवारों के साथ घर को सजाया जाता है। पटाखे जलाकर व मिठाईयाँ बाँटकर परिवारों के साथ पूजा करके समय बिताया जाता है। लक्ष्मी पूजन के समय एक मुख्य दिया जलाकर पूजा की जाती है, जो रात भर अखंड जलता रहता है। यह मिट्टी का दिया तेल से भरकर जलाया जाता है, जिससे वातावरण पवित्र एवं शुद्ध हो जाता है। घरों में लोग कम से कम 21 दिये जलाकर चारों तरफ सजाकर रखते हैं। पाँचों दिन अनेक प्रकार के दीपक जलाकर खुशी का पर्व दीपावली मनाया जाता है। दीपावली के दियों का आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक महत्व अधिक है। दिया केवल मिट्टी का एक छोटा सा पात्र नहीं होता, यह प्रकाश, ज्ञान और आशा का प्रतीक है। दिया और आत्मा का सम्बन्ध ऐसा है जैसे एक दिया अंधकार को मिटा देता है, वैसे ही मनुष्य की आत्मा भी अगर ज्ञान और सच्चाई से ओतप्रोत हो, तो वह जीवन के अंधकार को दूर कर सकती है। बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक, दीपावली के दिये यह संदेश देते हैं कि, चाहे जीवन में कितना भी अंधकार क्यों न हो, एक छोटा सा प्रकाश भी उसे दूर कर सकता है। एक दीपक जलाने से आत्मिक जागृति, आत्मा के भीतर छिपे अज्ञान को मिटाकर ज्ञान और विवेक के प्रकाश से जीवन को भरने का संकेत है।
दीपावली के दीपों का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। दीपावली पर दीप जलाने की परम्परा ने हमें सांस्कृतिक एकता एवं सामूहिक उत्सव की भावना सिखाई है। जब पूरा शहर, गाँव एक साथ दीपों से जगमगाता है तो एक विशेष प्रकार की सामूहिक ऊर्जा और सौहार्द का वातावरण बनता है। मिट्टी के दिये से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार होता है, जो कुम्हारों द्वारा बनाये जाते हैं। दीपावली के अवसर पर मिट्टी के दियों की माँग बढ़ने से उन्हें रोजगार मिलता है और स्थानीय कारीगरी को प्रोत्साहन मिलता है। पर्यावरण के अनुकूल, दिये प्रदूषण रहित होते है और पर्यावरण को हानि नहीं पहुँचाते, जबकि पटाखे ध्वनि और वायु प्रदूषण फैलाते हैं। इसलिए आज के समय में मिट्टी के दियों का महत्व और भी बढ़ गया है।वैज्ञानिक दृष्टिकोण से दियों का भी अधिक लाभ होता है। दीपावली पर जब हम घरों में तेल के दिये जलाते हैं, तो उससे निकलने वाली लौ और गर्मी से वातावरण की हानिकारिक जीवाणु नष्ट होते हैं। सरसों के तेल या घी से जलाये गये दियों से वातावरण शुद्ध होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है। साथ ही, दियों की रोशनी मन को शांत करती है एवं तनाव को कम करने में सहायक होती है।आज के आधुनिक डिजिटल युग में कृत्रिम रोशनी, मिट्टी के दियों की संवेदनात्मक और आध्यात्मिक सुंदरता की जगह नहीं ले सकते। इलेक्ट्रॉनिक लाईट्स अस्थायी होती हैं, लेकिन मिट्टी के दियों की जो संस्कारिक और पारम्परिक गरिमा है, वह दीपावली को विशेष बनाती है। आज जब हम आधुनिकता की दौड़ में अपने मूल्यों और परम्पराओं से दूर होते जा रहे हैं, तो ऐसे समय में दीप जलाकर हम अपनी संस्कृति और जड़ों से जुड़ने का प्रयास करते हैं। आधुनिकता की चकाचौंध से हमारे प्राचीन रीति-रिवाज पीछे छूट रहे हैं। दीपावली पर भले ही कितने ही इलेक्ट्रॉनिक उपकरण खरीद लें, मगर मिट्टी के दिये का महत्व कभी कम नहीं हो सकता।
प्रकाश का यह पर्व हमें सीख देता है कि केवल बाहरी जगमगाहट नहीं, हमें अपने मन के भीतर ही प्रकाश उत्पन्न करना आवश्यक है। इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना पंचतत्वों से हुई है, जिसमें जल, वायु, आकाश, अग्नि और भूमि का मेल है। मिट्टी की दीपक भी इन पाँच तत्वों का प्रतिनिधित्व करता है। मिट्टी का दीपक वर्तमान का प्रतीक माना गया है, जबकि उसमें जलने वाली लौ भूतकाल का प्रतीक है। जब हम रुई की बाती तेल में डालकर दीप प्रज्जवलित करते हैं, तो वह आकाश, स्वर्ग और भविष्यकाल का संकेत देती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मिट्टी को मंगल ग्रह का प्रतीक माना गया है, वहीं मंगल को साहस व पराक्रम का प्रतीक माना जाता है। तेल, शनिदेव को अर्पित किया जाता है, और शनि को न्याय व भाग्य का देवता माना जाता है। इसलिए दीपक जलाने से मंगल व शनि ग्रह की अनुकूल दृष्टि बनी रहती है, जिससे जीवन में यश, सुख एवं सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
दीपावली के दिये केवल रोशनी फैलाने का साधन नहीं है, ये हमारे जीवन के अंधकार को मिटाकर आशा, विश्वास, प्रेम और समृद्धि का उजाला लाते हैं। दीपक की रोशनी शांति का प्रतीक है, इसलिए दीप जलाने से घर में शांति बनी रहती है। वे हमें यह याद दिलाते हैं कि जीवन में कितनी भी निराशा हो, एक छोटा सा प्रयास भी बड़ा परिवर्तन ला सकता है। इस दीपावली पर आईये मिट्टी के दिये जलायें, दिलों में प्रेम जगायें और संसार को रोशन बनायें। एक दीप जलाएं, जगमगाती रोशनी, खुशी के पल अंधकार में भी आशा की लौ जगायें।




