
अजीत मिश्रा (खोजी)
💷पूर्वांचल में जाली नोटों का जाल: पुलिस की फाइलें गर्म, पर धंधेबाज अब भी ‘सफेद’। ‘खाकी’ के रडार पर ‘काली’ छपाई: बस्ती मंडल में नकली नोटों के सिंडिकेट का भंडाफोड़, क्या सिर्फ प्यादे फंस रहे हैं या ‘शहंशाह’ अभी बाकी?💷
- नोट असली, नीयत जाली: ग्रामीणों की गाढ़ी कमाई पर ‘टकसाल’ वाले डकैतों का वार!
- छह साल, तीन गिरोह, पर वही पुराना खेल: आखिर क्यों खत्म नहीं हो रहा जाली नोटों का यह ‘कैंसर’?
- नेपाल बॉर्डर से बस्ती की गलियों तक: जाली नोटों के सिंडिकेट का वो कच्चा चिट्ठा जिसे जानना आपके लिए जरूरी है।
- पकड़े गए नेपाली जालसाज, पर सवाल बरकरार: क्या पूर्वांचल बन रहा है अंतरराष्ट्रीय जाली करेंसी का ‘सॉफ्ट टारगेट’?
- सावधान बस्ती! आपकी जेब में मौजूद 500 का नोट ‘कागज’ तो नहीं? जानिए जालसाजों का नया मोडस ऑपरेंडी।
- रकम दोगुनी करने का झांसा या जिंदगी भर की कमाई का घाटा? बस्ती मंडल के भोले ग्रामीणों को निगल रहा है जाली नोट गिरोह।
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश
तारीख: 13 अप्रैल, 2026
बस्ती।। पूर्वांचल की शांत आबोहवा में ‘नकली मुस्कान’ यानी जाली नोटों का जहर घोलने वाले गिरोहों ने अपनी जड़ें कितनी गहरी जमा ली हैं, इसका अंदाजा हालिया पुलिसिया कार्रवाई से लगाया जा सकता है। बस्ती, सिद्धार्थनगर, संतकबीरनगर और गोंडा जैसे जिलों को जाली नोटों की मंडी बनाने की साजिश रचने वाले जालसाज अब पुलिस की रडार पर तो हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इस नासूर को जड़ से मिटा पाएंगे?
💫ग्रामीणों की सादगी पर ‘जालसाजी’ का वार
इन अपराधियों का काम करने का तरीका जितना पुराना है, उतना ही शातिर भी। ये गिरोह शहर के शोर-शराबे और बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से बचकर ‘ग्रामीण भारत’ को निशाना बना रहे हैं। बैंक के बाहर भोले-भाले ग्रामीणों को ‘रकम दोगुनी’ करने का झांसा देना या असली नोटों की गड्डियों के बीच शातिर तरीके से जाली नोट खपा देना, इनके बाएं हाथ का खेल बन चुका है।
✍️कड़वा सच: जिस ग्रामीण इलाके में एक किसान अपनी पूरी फसल बेचकर चंद हजार रुपये लाता है, वहां ये दरिंदे अपनी जाली करेंसी थमाकर उसकी पूरी मेहनत पर पानी फेर रहे हैं।
📝छह साल, तीन बड़े गिरोह: पर खेल वही पुराना
पिछले छह सालों में तीन बड़े गिरोह धरे गए हैं:
- फरवरी 2020: कलवारी थाने के पास पकड़ा गया गिरोह जो बाकायदा मशीन लगाकर नोट छाप रहा था।
- सितंबर 2025: 15 लाख के जाली नोटों के साथ चार गुर्गों की गिरफ्तारी, जिनके पास से फर्जी नंबर प्लेट वाली कारें बरामद हुईं।
- अप्रैल 2026: मौजूदा कार्रवाई, जिसमें नेपाली नागरिकों समेत पांच शातिर गिरफ्तार किए गए हैं।
यह आंकड़े चीख-चीख कर कह रहे हैं कि जाली नोटों का यह धंधा कोई छिटपुट घटना नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित ‘इंडस्ट्री’ बन चुका है।
⚓नेपाल कनेक्शन और सरहद की चुनौती
हालिया गिरफ्तारी में नेपाली नागरिकों की संलिप्तता ने मामले को और गंभीर बना दिया है। क्या पूर्वांचल के रास्ते अंतरराष्ट्रीय जाली नोट नेटवर्क भारत की अर्थव्यवस्था को खोखला करने की कोशिश कर रहा है? पुलिस की जांच में यह साफ हुआ है कि ये गिरोह जिले दर जिले अपनी लोकेशन बदलते रहते हैं और फर्जी नंबर प्लेटों का सहारा लेकर पुलिस की आँखों में धूल झोंकते हैं।
⚓क्या सिर्फ गिरफ्तारियां काफी हैं?
पुलिस ने हाल ही में सक्रियता दिखाई है, इसके लिए ‘खाकी’ बधाई की पात्र है। लेकिन, समीक्षात्मक दृष्टिकोण से देखें तो कुछ सवाल अनुत्तरित हैं:
- मास्टरमाइंड कौन? गिरफ्तार होने वाले अक्सर ‘कैरियर’ (माल ढोने वाले) होते हैं। असली वित्तपोषक (Financiers) जो इन मशीनों और कागजों के लिए पैसा लगाते हैं, वे अब भी सुरक्षित क्यों हैं?
- जागरूकता का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग असली और नकली नोट का फर्क नहीं जानते। क्या प्रशासन ने इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाए हैं?
- खुफिया तंत्र की सुस्ती: जब एक गिरोह सालों से एक ही क्षेत्र में सक्रिय रहता है, तो स्थानीय एलआईयू (Local Intelligence Unit) को इसकी भनक क्यों नहीं लगती?
1. गिरोह का ‘मोडस ऑपरेंडी’: झांसा, जाल और जालसाजी
रिपोर्टों का विश्लेषण करें तो यह गिरोह किसी कॉर्पोरेट कंपनी की तरह काम कर रहा है। इनकी कार्यप्रणाली के तीन मुख्य स्तंभ हैं:
- टारगेट (ग्रामीण भारत): ये गिरोह जानते हैं कि शहरों में मशीनों द्वारा नोटों की जांच होती है, इसलिए इनका मुख्य निशाना साप्ताहिक बाजार (पैठ), छोटे दुकानदार और कम पढ़े-लिखे किसान हैं।
- लालच का दांव: “1 लाख के असली नोट दो, 3 लाख के नए नोट लो” – यह वह जुमला है जिससे ये लोगों को फंसाते हैं। पहली बार में ये कुछ असली नोट देकर विश्वास जीतते हैं, और फिर बड़ी रकम मिलने पर जाली नोटों की गड्डियां थमाकर रफूचक्कर हो जाते हैं।
- फिजिकल सिक्योरिटी: गिरोह फर्जी नंबर प्लेट वाली कारों का इस्तेमाल करता है और नेपाल सीमा के करीब होने का फायदा उठाकर एक जिले से दूसरे जिले में ‘शिफ्ट’ होता रहता है।
2. मशीनरी और नेटवर्क: घर-घर में ‘टकसाल’?
फरवरी 2020 में कलवारी क्षेत्र में मिली नोट छापने की मशीन ने यह साबित कर दिया था कि यह धंधा केवल सीमा पार से नहीं आ रहा, बल्कि ‘मेक इन पूर्वांचल’ के तहत स्थानीय स्तर पर भी फल-फूल रहा है।
- कच्चा माल: अर्धनिर्मित नोट, विशेष कागज और इंक की बरामदगी यह बताती है कि इनके पास सप्लाई चेन की कोई कमी नहीं है।
- खपत का बाजार: बस्ती से छपे नोट अंबेडकर नगर, आजमगढ़ और गोंडा के खुदरा बाजारों में इतनी सफाई से खपाए जा रहे हैं कि आम आदमी पहचान ही नहीं पाता।
3. तीखी समीक्षा: कहां चूक रहा है तंत्र?
गिरफ्तारियां होती हैं, खबरें छपती हैं, और फिर मामला शांत हो जाता है। लेकिन कुछ कड़वे सवाल प्रशासन के सामने खड़े हैं:
- कड़ी सजा का अभाव: क्या ये अपराधी जेल से छूटने के बाद फिर उसी धंधे में नहीं लग जाते? क्या इनके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट और एनएसए (NSA) जैसी कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित है?
- खुफिया विफलता: स्थानीय पुलिस को तब पता चलता है जब गिरोह कोई बड़ी घटना कर चुका होता है। क्या बीट कांस्टेबलों और सूचना तंत्र को इन ‘अदृश्य’ अपराधियों की भनक नहीं लगनी चाहिए?
- सीमा सुरक्षा: नेपाल सीमा का खुला होना इन अपराधियों के लिए ‘एग्जिट गेट’ का काम करता है। क्या वहां चेकिंग केवल नाममात्र की है?
🎯अब ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की जरूरत है
पुलिस को अब केवल ‘पकड़ने’ की नीति छोड़नी होगी। इन गिरोहों की आर्थिक रीढ़ पर हमला करना होगा। इनकी संपत्तियां कुर्क की जानी चाहिए और उन ‘सफेदपोशों’ के चेहरे बेनकाब होने चाहिए जो पर्दे के पीछे बैठकर इन जाहिलों को संरक्षण देते हैं। अगर आज बस्ती मंडल के बाजारों में 500 का नोट लेने से पहले गरीब आदमी कांप रहा है, तो इसकी जिम्मेदारी प्रशासन को लेनी होगी।
👉अगले कदम जो जरूरी हैं:
- जन-जागरूकता अभियान: बैंकों और पुलिस को मिलकर हर गांव में ‘असली बनाम नकली’ की पहचान के कैंप लगाने चाहिए।
- डिजिटल निगरानी: मंडियों और पेट्रोल पंपों पर हाई-डेफिनिशन सीसीटीवी (CCTV) अनिवार्य हों ताकि संदिग्ध कारों की पहचान हो सके।
- स्पेशल टास्क फोर्स: बस्ती मंडल के लिए एक समर्पित ‘एंटी-काउंटरफीट सेल’ का गठन हो, जो केवल इसी नेटवर्क को ट्रैक करे। जनता सावधान रहे, क्योंकि आपकी एक छोटी सी लालच देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।
🚨अब आर-पार की जंग जरूरी
एसपी बस्ती के अनुसार, पुलिस नेटवर्क के खात्मे के लिए जुटी है। लेकिन यह जंग सिर्फ पुलिस की नहीं है। यह जंग हर उस नागरिक की है जिसकी मेहनत की कमाई को ये जालसाज रद्दी के टुकड़े में बदलना चाहते हैं।
अगर अब भी इस सिंडिकेट की कमर नहीं तोड़ी गई, तो पूर्वांचल के बाजार जाली नोटों के ऐसे दलदल में फंस जाएंगे, जहाँ से निकलना नामुमकिन होगा। प्रशासन को चाहिए कि वह न केवल इन प्यादों को जेल भेजे, बल्कि उस ‘प्रेस’ तक पहुंचे जहां ये नोट छापे जा रहे हैं।






















