

निवेदक आदित्य नारायण , निवासी गाँव- बरातफ़रीक़ /तहसील- सिराथू, जिला कौशांबी, यह पत्र आपके संज्ञान में लाना चाहता है कि कुछ राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से, पूर्व में उप जिलाधिकारी (SDM) द्वारा निरस्त किए गए एक अवैध भूमि विनिमय को पुनः स्वीकृत कराने का प्रयास किया जा रहा है। यह कार्य न केवल उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता एवं भूमि प्रबंधन अधिनियम का घोर उल्लंघन है, बल्कि सरकारी एवं बंजर भूमि पर कब्जा जमाने की साजिश का भी स्पष्ट संकेत देता है।
प्रकरण का संक्षिप्त विवरण:
- निजी विद्यालय द्वारा सरकारी भूमि पर अवैध निर्माण एवं धोखाधड़ी
🔹 ग्राम बरातफ़रीक़ में स्थित एक निजी विद्यालय श्री बाबू लाल शुक्ल इण्टर कॉलेज ने सरकारी भूमि (गाटा संख्या 643) पर अवैध रूप से भवन का निर्माण कर लिया है, जबकि जिस भूमि पर उसकी मान्यता प्राप्त है (गाटा संख्या 117), वहाँ कोई विद्यालय भवन निर्मित नहीं किया गया है।
🔹 विद्यालय प्रबंधन ने अधिकारियों की मिलीभगत से सरकारी भूमि पर कब्जा कर लिया है और अब उसे विनिमय के माध्यम से वैध कराने का प्रयास किया जा रहा है।
🔹 यह कार्य शिक्षा विभाग, राजस्व विभाग, एवं स्थानीय प्रशासन की लापरवाही और भ्रष्टाचार को उजागर करता है।
- धारा 67(5) और विनिमय आवेदन के माध्यम से प्रशासन को गुमराह करने का प्रयास
🔸 विद्यालय प्रशासन ने DM कार्यालय में धारा 67(5) के तहत वाद-938 और 937/2024 झूठा आवेदन दिया है कि उसने कोई अवैध कब्जा नहीं किया है, जबकि दूसरी ओर उसी भूमि का विनिमय आवेदन दायर किया गया है।
🔸 यदि विद्यालय ने कब्जा नहीं किया, तो वह विनिमय की माँग क्यों कर रहा है? यह स्पष्ट रूप से प्रशासन को गुमराह करने एवं भूमि हड़पने की साजिश है।
🔸 यह धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार का मामला है, जिसमें राजस्व अधिकारियों की संलिप्तता की जाँच आवश्यक है।
- अवैध भूमि विनिमय एवं उसका निरस्तीकरण
🔹 ग्राम बरातफ़रीक़ स्थित गाटा संख्या [643और645] (सरकारी भूमि और बंजर भूमि) एवं गाटा संख्या [117] (निजी भूमि) का विनिमय प्रस्तावित किया गया था।
🔹 उक्त भूमि में बंजर भूमि एवं सार्वजनिक उपयोग की सरकारी भूमि (सुरक्षित भूखंड) सम्मिलित थी, जिसे उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950 एवं उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत विनिमय के लिए अयोग्य घोषित किया गया था।
🔹 इस कारण उप जिलाधिकारी (SDM) द्वारा उक्त विनिमय को दिनांक [07-06-2022] को निरस्त कर दिया गया।
- पुनः अवैध रूप से मामला दर्ज करने का प्रयास एवं पुनर्विचार याचिका का दुरुपयोग
🔸 वर्तमान में नव नियुक्त उप जिलाधिकारी (SDM) द्वारा पुनः उसी भूमि के विनिमय का प्रस्ताव राजस्व न्यायालय में दायर किया गया है।
🔸 विद्यालय प्रशासन ने पहले विनिमय आवेदन निरस्त होने के बाद पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दायर की, जो कि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
🔸 पुनर्विचार याचिका का उद्देश्य सिर्फ़ मामले को लंबा खींचना और अवैध कब्जे को बनाए रखना है, जबकि पहले ही यह स्पष्ट किया जा चुका है कि विनिमय अवैध है।
🔸 यह कार्य पूर्व में दिए गए न्यायिक आदेशों की अवमानना एवं राजस्व संहिता की धारा 101 एवं 104 का उल्लंघन है।
🔸 इस प्रकार की हरकतों से स्पष्ट होता है कि राजस्व अधिकारी मिलीभगत कर अवैध रूप से सरकारी भूमि को निजी हितों के लिए हस्तांतरित करने का प्रयास कर रहे हैं।
कानूनी बिंदु एवं धारा
✅ उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 101 – सरकारी भूमि (बंजर, चारागाह, तालाब आदि) का निजी भूमि के साथ विनिमय नहीं किया जा सकता।
✅ धारा 104 – यदि कोई विनिमय राजस्व न्यायालय द्वारा निरस्त किया गया हो, तो बिना उच्च न्यायालय की स्वीकृति के उसे पुनः विचारणीय नहीं माना जा सकता।
✅ उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950 की धारा 132 – ग्रामसभा की भूमि का कोई भी विनिमय या हस्तांतरण निषिद्ध एवं अवैध है।
✅ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 166A – लोक सेवकों द्वारा न्यायिक आदेशों की अवहेलना अपराध की श्रेणी में आता है।
✅ धारा 217 – सरकारी अधिकारी यदि अवैध रूप से भूमि विवाद को पुनः न्यायालय में प्रस्तुत करते हैं, तो यह प्रशासनिक कर्तव्य का उल्लंघन माना जाएगा।
✅ धारा 120B (आपराधिक षड्यंत्र) – यदि कई अधिकारी मिलकर सरकारी भूमि के अवैध विनिमय को पुनः स्वीकृत कराने की कोशिश करते हैं, तो यह आपराधिक षड्यंत्र की श्रेणी में आएगा।
मेरा निवेदन:
📌 उक्त अवैध भूमि विनिमय पर तत्काल रोक लगाई जाए एवं दोषी अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय जांच कराई जाए।
📌 राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत की उच्च स्तरीय जाँच हेतु सतर्कता विभाग एवं लोकायुक्त को संस्तुति भेजी जाए।
📌 यदि सरकारी भूमि का पुनः विनिमय करने का प्रयास जारी रहता है, तो राजस्व अधिकारियों के विरुद्ध न्यायालय की अवमानना याचिका (Contempt of Court) दायर की जाए।
📌 इस मामले की विस्तृत रिपोर्ट उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद एवं मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजी जाए।
यदि इस विषय पर उचित कार्रवाई नहीं की जाती, तो निवेदक माननीय उच्च न्यायालय, प्रयागराज में जनहित याचिका (PIL) दाखिल करने के लिए बाध्य होगा।














